<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065</id><updated>2011-09-08T12:45:26.691-07:00</updated><title type='text'>कुछ दिल की</title><subtitle type='html'>एक ब्लॉग दिल से दिल के लिए</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>23</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-8224469310943454390</id><published>2011-04-21T11:03:00.001-07:00</published><updated>2011-04-21T11:03:55.203-07:00</updated><title type='text'>हम कितने भ्रष्ट?</title><content type='html'>भ्रष्टाचार यानी वह व्यवहार, आचरण, जो सही न हो. अगर मैं ठीकठाक समझ पा रहा हूं, तो यही मतलब है भ्रष्टाचार का. यानी सामाजिक ताने-बाने में बुने नियमों को तोड़ने-मरोड़ने की प्रक्रिया को भ्रष्टाचार माना जा सकता है. ऐसे में हमें आत्ममंथन की जरूरत है. मंथन इस बात का कि क्या हम दैनिक जीवन में भ्रष्टाचार में लिप्त तो नहीं हैं? हां, बहुत ऊपर जाने की जरूरत नहीं. दरवाजे की घंटी बजी. बाप ने बेटे से कहा, कोई भी होकह देना मैं घर पर नहीं हूं. क्या यह भ्रष्टाचार नहीं? तो फिर आत्ममंथन शुरू किया जाये. देखें, हम कितने भ्रष्ट हैं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-8224469310943454390?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/8224469310943454390/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=8224469310943454390' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/8224469310943454390'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/8224469310943454390'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='हम कितने भ्रष्ट?'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-4253645069001319980</id><published>2010-09-20T00:26:00.000-07:00</published><updated>2010-09-20T00:27:17.834-07:00</updated><title type='text'>तेरी, मेरी, उसकी...आखिर किसकी अयोध्या</title><content type='html'>...बचपन से ही घर में सुबह-सुबह उनींदी आंखो¨ के बीच मधुर स्वर में गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस की चौपाई...अवध पुरी मम पुरी सुहावन, उत्तर दिस सरजू बह पावन...सुनता आ रहा हूं. बड़के भइया (बड़े पापा के लड़के या यूं कहें बड़की अम्मा के भइया और हम सबके बड़के भइया) स्कूल में पढ़ाते हैं. सुबह उठ कर स्नान ध्यान करते थे. इसमें दादी का उन्हें पूरा सहयोग मिलता था. दोनो¨ में से कोई भी नहाता अवध पुरी... की स्वर लहरी घर में जरूर गूंजती. उस समय अवध पुरी (अयोध्या) की एक निराली ही छटा मन में बसी थी, जो आज भी कायम है. सालो¨ साल यह सिलसिला चलता रहा...आज भी जारी है. दादी के जाने और बड़े भइया के सामने बने नये मकान में चले जाने के बाद भी. भइया आज भी स्कूल जाने से पहले नहाते समय उसी सुर में अवध पुरी मम पुरी...गाते हैं. हालांकि अब उम्र और तबियत साथ नहीं देते, पर उनकी वाणी में किसी भी प्रकार की कमी नहीं झलकती, वह भी तब जब रामचरित मानस में से कुछ गा रहे हो¨. स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद बाबा भोलेनाथ की नगरी बनारस के बीएचयू से स्नातक करने का मौका मिला. अब तो आये दिन अयोध्या के दर्शन होने लगे. अयोध्या होकर ही बनारस आना-जाना होता था. हालांकि इसके पहले भी अयोध्या आना-जाना लगातार लगा रहता था. पर, कभी भी धार्मिक पूजा-पाठ या मंदिरो¨ में दर्शन या सरयू में स्नान के लिए नहीं, बल्कि पिताजी के बनारस और बड़े भइया के कोलकाता में रहने के कारण. दोनो¨ अयोध्या होकर ही आते-जाते थे. गांव से करीब 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अयोध्या स्टेशन का रोयां-रोयां (अगर होता है, तो) शायद अब तक हमारी गंध से हमें पहचान लेता होगा. हम भी अयोध्या को उसी तरह से पहचानते हैं, जानते हैं. पर, जब भाजपा ने भगवान राम की जन्मभूमि को राजनीतिक मुद्दा बनाया, तब लगा था कि अयोध्या में कोई और ही हवा बहेगी, पर वैसा हुआ नहीं. सारी आशंका निर्मूल साबित हुई. अयोध्या के लोग, अयोध्या के बंदर, अयोध्या की गायें, अयोध्या की गलियां, अयोध्या की गंदगी, कुछ भी तो नहीं बदला. तब भी इनमें कोई बदलाव नहीं आया, जब तत्कालीन मुख्‌यमंत्री मुलायम सिंह ने कार सेवको¨ पर गोलियां चलवायीं और तब भी नहीं, जब विवादित ढांचा गिराये जाने के बाद पूरा देश दहशत और अलगाव की आग में जल रहा था. अयोध्या की फिजां में नफरत नहीं घुल पायी. आज भी नहीं घुली है और ईश्वर ने चाहा, तो पुरुषोत्तम राम की नगरी, कई शायरो¨ की जन्मस्थली, नवाबो¨ का नगर और मंदिरो¨ का शहर अयोध्या में 24 सितंबर के फैसले के बाद भी किसी तरह की बाहरी आबोहवा इसे विचलित कर पायेगी. हां, बीच-बीच में कुछ बाहरी उन्मादियो¨ ने अयोध्या के लोगो¨ के पेट पर जम कर लात जरूर मारी है. जब भी हमारी अयोध्या (ध्यान रहे अवध के नवाबो¨ की भाषा हैः कभी मैं का प्रयोग नहीं होगा अवध में. पढ़े-लिखे लोग भी मैं की जगह हम का ही प्रयोग करते हैं) पर कोई आफत आयी है, तो आम लोग ही उसमें फंसे हैं. देश-दुनिया से आये सैलानियो¨ को अयोध्या घुमानेवालो¨ में ज्‌यादातर गैर हिंदू मिलेंगी. सेंदुर (सिंदूर), बिंदी, माला, रामचरितमानस, गीता, पीढ़ा-बेलन और खड़ाऊं बेचनेवाले भी सभी हिंदू नहीं हैं. मंदिरो¨ के लिए पत्थर तैयार करनेवाले भी हिंदू नहीं हैं. पर, कभी भी अयोध्या को इनसे शिकायत नहीं हुई. फिर अयोध्या से बाहर के लोग इतने बेचैन हैं, आखिर क्‌यूं...? क्‌यूं 24 सितंबर के फैसले के बाद उन्माद फैलने की आशंका को हवा दी जा रही, जबकि अयोध्या के लोग शांत हैं? फिर जब भगवान कण-कण में बसे हैं, तो एक अयोध्या को ही निशाना क्‌यूं बनाया जा रहा है...और जब निशाना बनाया ही जा रहा है, तो अयोध्या के नाम पर राजनीति की रोटियां सेंकनेवालो¨ को वहां की गंदगी क्‌यो¨ नहीं दिखती. विश्व के नक्‌शे में स्थान रखनेवाली अयोध्या के रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद से ही नाक में घुसनेवाली बदबू क्‌या कभी इन रहनुमाओं ने महसूस नहीं की? अयोध्या स्टेशन के यात्रियो¨ के लिए पेयजल और बाथरूम की समुचित व्‌यवस्था नहीं होने की जिम्मेदारी कौन लेगा...अयोध्या के लोगो¨ के मुंह से निवाला छीनने का कोपभाजन कौन बनेगा...? बाबा कल्‌याण सिंह राजनीति की नैया डुबाने के बाद अब फिर से अयोध्या की ओर क्‌यो¨ झांक रहे हैं. राम के इतने ही बड़े भक्त थे, तो उन्हीं मुलायम सिंह का हाथ क्‌यो¨ थाम लिया था, जिन्हो¨ने कारसेवको¨ पर गोलियां चलवायी थीं. और बाबा मुलायम सिंह अब अयोध्या के लोगो¨ को बचाने के लिए आपके पास क्‌या हथियार है? और तो और हे कांग्रेस के पुरोधा...आपको क्‌या लगता है...अखबारो¨ में विज्ञापन छाप कर आप शांति फैला रहे हैं? अरे जाइये...जाकर अयोध्या हो आइये..वातानूकूलित कमरो¨ से निकल...देखिये...अयोध्या को रोटी की जरूरत है, काम की जरूरत है, शिक्षा की जरूरत है, गंदगी से मुक्ति की डरूरत है..अखबारो¨ में विज्ञापन छाप कर उन्माद भड़काने की नहीं. राम जिसके थे, उसके हैं और रहेंगे. पर, अवध की शामो¨ की रोशनी छीनने की कोशिश मत कीजिए. अयोध्या के स्थानीय पत्रकार मित्रो¨ से फोन पर बातचीत में अकसर उनका दर्द उभर आता है. वह कहते हैं ः क्‌या भाई क्‌या बतायें...पता नहीं कैसे बाहर से आये इलेक्‌ट्रॉनिक और प्रिंट के साथियो¨ को अयोध्या में उन्माद दिख रहा है. बल्कि इन लोगो¨ की खबरो¨ के प्रसारण-प्रकाशन के बाद हम लोगो¨ को डांट पड़ती है कि अयोध्या में इतना कुछ हो रहा है और तुम सो रहे हो. पत्रकार मित्र बड़े कातर स्वर में कहते हैं, भइया आप ही बताइये, जब अयोध्या में कुछ हो ही नहीं रहा, तो भला हम का लिख कर भेज दें. झूठ-मूठ का हमसे नहीं लिखा जायेगा. हां, इतना जरूर है कि अयोध्या में बाहरी पत्रकार मित्रो¨ की बदौलत खौफ जरूर फैलने लगा है. रही-सही कसर सरकार ने बड़ी संख्‌या में सुरक्षा बल के जवानो¨ को तैनात कर पूरी कर दी है. बाहरी पत्रकार मित्र अयोध्या में हालात बिगड़ने की खबर छापते-प्रसारित करते हैं और उनके इस शाश्वत सत्य की पुष्टि सरकार अगले दिन जवानो¨ की संख्‌या बढ़ा कर कर देती है. इसके कारण हमारी अयोध्या खौफजदा है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-4253645069001319980?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/4253645069001319980/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=4253645069001319980' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/4253645069001319980'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/4253645069001319980'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='तेरी, मेरी, उसकी...आखिर किसकी अयोध्या'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-4612155942623492948</id><published>2010-05-03T11:51:00.000-07:00</published><updated>2010-05-03T11:56:16.021-07:00</updated><title type='text'>किस इज्जत की भेंट चढ़ी निरुपमा ?</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;आज सुबह की ही बात है. घर में बैठा था. दो साल की बेटी खेल रही थी. कभी मूंछें खींच रही थी, तो कभी कस कर गाल पर थप्पड़ जड़ रही थी, क्योंकि मैं पत्नी से बातचीत में मशगूल था और उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहा था. अचानक पत्नी ने बेटी को डांट दिया, कस कर, कि पापा को कोई मारता है. बेटी रोने लगी. मेरे और पत्नी के बीच ठन गयी. कुछ देर बोलचाल भी बंद रही. थोड़ी ही देर बाद बेटी को चोट लगी, तो पत्नी दौड़ कर मलहम उठाने दौड़ीं. हमारे बीच फिर से बेटी को लेकर बातचीत शुरू हो गयी. उसी बीच अचानक निरुपमा का जिक्र आ गया. पत्रकार निरुपमा पाठक का. मैंने पत्नी को सारी कहानी बतायी. साथ में यह भी कि शायद किसी करीबी ने उसकी हत्या कर दी. क्योंकि तब तक इस मामले में किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया था. सारा मामला जानने के बाद पत्नी बोलीं – आखिर क्यों मारा गया निरुपमा को...सिर्फ इसलिए कि वह विजातीय शादी करना चाहती थी. तब (विजातीय शादी करने से) जो इज्जत जाती घर वालों की, क्या अब वह बची रही. किस इज्जत की दुहाई दे रहे होंगे उसके परिवारवाले. अब जब जमाना बेटी का हत्यारा कह कर पुकारेगा. अब जब निरुपमा के पिता व भाई थाने के चक्कर लगा रहे हैं, तो किस इज्जत की दुहाई दे रहे हैं. पुलिस की गिरफ्त में अपनी मां को देख कर कहीं से देख रही होगी निरुपमा की आत्मा जार-जार रो रही होगी. और पुलिस की हिरासत में उसकी मां आखिर अब कौन सी इज्जत बचायेगी. सच में, बड़ा सवाल है. क्या है इज्जत. आखिर किसके कारण निरुपमा को जान गंवानी पड़ी. यह समाज और इसके बनाये वसूल क्यों किसी की जान के दुश्मन बन जाते हैं. और फिर वह बेटी, जिसके लिए कभी निरुपमा की मां भी मलहम लेकर दौड़ी होगी, उसके पिता ने भी बेटी के बचपन में उसका थप्पड़ सहा होगा, फिर उसी बेटी की जान कैसे ले ली. सिर्फ इज्जत के लिए. यह इज्जत क्या बला है, कोई समझाएगा. कोई बताएगा कि क्यों तमाम निरुपमाएं इस इज्जत की भेंट चढ़ जाती हैं. क्यों नहीं बंद होता इज्जत का यह ढकोसला. क्यों लोगों को जीने की आजादी नहीं दी जाती. कम से कम अब तो जीने का अधिकार दे दो. &lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-4612155942623492948?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/4612155942623492948/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=4612155942623492948' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/4612155942623492948'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/4612155942623492948'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='किस इज्जत की भेंट चढ़ी निरुपमा ?'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-3479715300278167248</id><published>2009-07-21T22:20:00.000-07:00</published><updated>2009-07-21T22:23:16.470-07:00</updated><title type='text'>सिटी ऑफ ज्वॉय पर भीड़ की ममता, शक्ति प्रदर्शन का साधन बना शहीद दिवस</title><content type='html'>शहीद दिवस के नाम हर साल कोलकाता समेत पूरे राज्य में कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. पर ये कार्यक्रम हैं किसलिए, लोगों को परेशान करने, सिटी ऑफ ज्वाय की ऐसी-तैसी करने और किसलिए...राइटर्स अभियान के दौरान मारे गये कार्यकर्ताओं की याद में शहीद दिवस को इस बार दीदी ने ताकत प्रदर्शन का साधन बना दिया. इस मौके पर शहीदों को श्रद्धांजलि कम दी गयी, २०११ में होनेवाले बंगाल विधानसभा चुनाव के बारे में अधिक चर्चा की गयी. यही नहीं ममता दीदी ने तो २०११ विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल की जीत पक्की मान ली है. उन्होंने राइटर्स में बैठी तृणमूल सरकार की प्राथमिकताएं तक गिना डालीं. दूसरी ओर, बेचारी कोलकाता की निरीह जनता, उपनगरों से कोलकाता आनेवाले दैनिक यात्रियों की दुर्दशा पर दीदी ने केवल माफी मांग कर काम चला लिया. मंगलवार को कोलकाता की सड़कों व मेट्रो स्टेशन-ट्रेनों के साथ-साथ सभी दर्शनीय स्थलों पर दीदी की बातें सुनने राज्य भर से आये लोगों का कब्जा था. घर से दफ्तर पहुंचने में मुझे भी लगभग ३.५ घंटे लग गये, वह भी तब, जब मुख्य शहर में रहता हूं. फिर भी बस छोड़ कर लगभग तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, सड़क पर नहीं, सड़क के किनारे कीचड़ में. मजाल थी कि कोई भी सड़क पर कदम रखने की हिमाकत कर दे. हालात बिल्कुल वैसे ही, जैसे वाम मोरचा या माकपा की ब्रिगेड की किसी रैली का दृश्य.हालांकि मेरे समझ में अब भी यह नहीं आ रहा था कि दीदी को ताकत को प्रदर्शन करना ही था, तो शहीद दिवस ही क्यों??? वाम मोरचा और तृणमूल-कांग्रेस की इस ल‍ड़ाई से जनता को बाहर रखने के लिए छुट्टी वाला भी तो कोई दिन चुना जा सकता था. ऐसे में कम से कम दैनिक जनजीवन पर तो आफत नहीं आती, क्यों दीदी...है न...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-3479715300278167248?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/3479715300278167248/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=3479715300278167248' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/3479715300278167248'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/3479715300278167248'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='सिटी ऑफ ज्वॉय पर भीड़ की ममता, शक्ति प्रदर्शन का साधन बना शहीद दिवस'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-18306472396058344</id><published>2009-04-08T23:12:00.000-07:00</published><updated>2009-04-08T23:13:35.046-07:00</updated><title type='text'>मुद्दों से भटकते हम</title><content type='html'>भई आजकल जूतों का बाजार गर्म है. ईराकी पत्रकार जैदी ने विश्व के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति पर जूता फेंका, तब से जूतों का भाव ही बढ़ गया है. फिर जूता फेंकने की कई और घटनाएं हुईं. और हालिया घटना हुई गृहमंत्री पी चिदंबरम की प्रेस कांफ्रेंस में. एक समय था जब किसी राज्य की विधानसभा में जूता-चप्पल फेंकने पर मीडिया के लोग (मैं भी) खूब हो-हल्ला मचाते थे. स्थिति कमोबेश आज भी कुछ वैसी ही है. हो-हल्ला खूब मचा. किसी ने जरनैल सिंह (बहुत ही वरिष्ठ हैं मुझसे) के पक्ष में, तो किसी ने उनके तरीके की खिलाफत की. मैं यहां न तो उनके पक्ष में और न ही खिलाफत में कुछ कहना चाहता हूं. मैं तो आत्ममंथन करना चाहता हूं, अपनी दशा और दिशा का. आज-कल कहीं न कहीं हम जैसे लोग ही पत्रकारिता की दशा और दिशा तय करते हैं. ऐसे में आत्ममंथन बहुत ही जरूरी हो जाता है. शुरुआत शुरू से करते हैं. पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए कोई जाता है, तो पहले दिन उसे सिखाया जाता है, कुत्ते ने आदमी को काटा, तो कोई खबर नहीं. आदमी ने कुत्ते को काटा, तो खबर बनती है. पर यहां एक सवाल उठता है कि अगर रोज-रोज आदमी कुत्ते को काटने लगे, तो कितनी बार खबर बनेगी. दूसरी बात मुद्दे की. जरनैल सिंह ने जूता फेंका, तो हर अखबार के पहले पन्ने पर, हर न्यूज चैनल पर २४ घंटे वही खबर चली. असल मुद्दा तो लोग भूल ही गये. श्री सिंह ने जूता नहीं फेंका होता, तो शायद उस दिन खबर कुछ और होती. कांग्रेस की शान में गृहमंत्री ने पढ़े कसीदे. या प्रेस कांफ्रेंस में चिदंबरम ने की यूपीए सरकार की वकालत...या ऐसे ही बहुत कुछ. पर बीच में आ गया जूता. और मौके पर उपस्थित हर पत्रकार, देश भर में टीवी से चिपके पत्रकार, शाम को अखबारों का पहला पन्ना बनानेवाले पत्रकार, सभी असल मुद्दे को भूल गये. गृहमंत्री ने क्या कहा, क्या नहीं...इस विषय से सब दूर हो गये. मौके पर लगायी गयी टीवी चैनलों की ओवी के कैमरे का रुख जरनैल सिंह की ओर हो गया. उन्हें थाने ले जाया गया, उससे पहले ही चैनलों और अखबारों के क्राइम बीट के संवाददाता थाने पहुंच गये. अटकलें लगाने लगे. एंकर और संवाददाताओं के बीच बातचीत में जरनैल सिंह की पीढ़ियों की कहानी का जिक्र होने लगा. चिदंबरम को लोग भूल गये. यह हुआ एक नमूना.दूसरा नमूना...हालांकि दूसरे नमूने से पहले हमें इस बात पर भी चिंतन करना चाहिए कि हमारी स्टोरी (न्यूज) का एंगल क्या होगा, इसका अंदाजा दूसरे लोग (जो मीडिया के नहीं हैं) कैसे लगा लेते हैं. अब आप पूछेंगे कैसे, तो बात जरा विस्तार में करते हैं. फिल्म प्रोड्यूसरों और मल्टीप्लेक्स मालिकों के बीच मुनाफे के बंटवारे को लेकर तनातनी चल रही है. प्रोड्यूसरों ने मल्टीप्लेक्स में फिल्में रिलीज करने से मना कर दिया है. इसी मुद्दे पर प्रोड्यूसरों ने प्रेस कांफ्रेंस बुलायी. उसमें शाहरूख और आमिर खान भी पहुंचे. बस हम भटक गये मुद्दे से. न हमें मल्टीप्लेक्स याद रहे. न ही याद रहीं फिल्में. मौके पर मौजूद अन्य प्रोड्यूसरों को भी हम भूल गये. उनकी बातों से कोई मतलब नहीं रहा. छुट्टियों के इस सीजन में फिल्में न रिलीज करने के प्रोड्यूसरों के फैसले के पीछे के कारणों को भी हम भूल गये. याद रहे, तो सिर्फ शाहरूख और आमिर. यानी की हम मुद्दे से भटक गये. हमने यह नहीं सोचा कि छुट्टियों में इस तरह के विवाद खड़े करने का फायदा प्रोड्यूसर इसलिए उठा रहे हैं, क्योंकि आइपीएल और आम चुनाव के चलते शायद ही कोई दर्शक सिनेमा हाल का रुख करेगा. ऐसे में फिल्में रिलीज हुईं, तो भी पिट जायेंगी. तो प्रोड्यूसरों ने (शायद) सोचा कि चलो इसी बहाने कुछ नया करते हैं. यह हुआ एक पहलू. दूसरा पहलू यह कि दूसरे हमारी स्टोरी का एंगल पहले जानते हैं, कैसे ???? ऐसे...शाहरुख ने प्रेस कांफ्रेंस में बार-बार कहा...आप लोग (संवाददाता) शायद मेरे और आमिर के एक मंच पर उपस्थित होने को बड़ी खबर बनायेंगे. हमारी दोस्ती के किस्से कहेंगे. पर हमारे मुद्दे को मत भूलियेगा. हमारे फिल्में न रिलीज करने के कारण को जरूर हाई लाइट कीजियेगा. और माफ कीजियेगा...हम शाहरुख की आशंका पर बिल्कुल खरे उतरे. हमने बड़े-बड़े अक्षरों में शाहरुख और आमिर के एक मंच पर उपस्थित होने की खबरें छापीं. हमने दोनों पर अलग से प्रोग्राम बनाये...पर मुद्दा, मुद्दा तो हम भूल ही गये. हमने वही किया, जिसकी आशंका शाहरूख को पहले से ही थी. यानी कहीं न कहीं, लोग हमारी मानसिकता को जान गये हैं, पहचान गये हैं. तो क्या अब हमें ऐसी मानसिकता को बदलने की जरूरत नहीं...? कुछ ऐसा करने की जरूरत नहीं, जिससे खबरों में रहने वाले लोग दूसरे दिन की हेडलाइन का अंदाजा पहले से न लगा लें...? जरूरत है चिंतन की...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-18306472396058344?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/18306472396058344/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=18306472396058344' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/18306472396058344'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/18306472396058344'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='मुद्दों से भटकते हम'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-6946515400331529868</id><published>2009-01-27T04:46:00.001-08:00</published><updated>2009-01-27T04:46:57.495-08:00</updated><title type='text'>रियलिटी शो या टीवी का इमोशनल अत्याचार</title><content type='html'>अगर आप मुंबई महाराष्ट्र की वैशाली को बनाना चाहते हैं संगीत के विश्वयुद्ध का विजेता, तो उन्हें वोट देने के लिए टाइप करें...कोलकाता वेस्ट बंगाल की तोरषा सरकार को इंडियन आइडल बनाने के लिए वोट दें, टाइप करें...और ऐसे ही न जाने कितनी वोट अपील. अब तो आप लोग समझ ही गये होंगे, बात हो रही है आजकल टीवी पर चल रहे रियलिटी शोज की. इनमें डांस और गानों के शो की भरमार है. एक जमाना था, जब टीवी की दुनिया की बेताज बादशाह सास-बहुओं के माध्यम से लोगों पर इमोशनल अत्याचार कर रही थीं, आजकल ये रियलिटी शोज  कर रहे हैं. और जिस तरह से ये लोग क्षेत्रीयता को बढ़ावा दे रहे हैं, वह राज ठाकरे की क्षेत्रीयता की भावना से कुछ कम नहीं है. यानी टीवी और फिल्मों के गढ़ मुंबई में रहनेवाले इन लोगों पर भी राज ठाकरे का पूरा-पूरा प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहा है.कोई माने या न माने, जिस तरह से वोट के नाम पर ये लोग क्षेत्रीयता को बढ़ावा दे रहे हैं, वह किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता. हाल ही में जी टीवी का सारेगामापा चैलेंज जीतनेवाली वैशाली की कहानी भी कुछ इसी तरह की है. मैं किसी भी तरह से वैशाली के टैलेंट पर कोई प्रश्न नहीं उठा रहा. पर सवाल उठता है कि जिस तरह से बार-बार वैशाली के गुरु हिमेश रेशमिया ने अपनी बातों से लोगों की भावनाएं भड़कायीं, क्या वह उचित था? फिर संगीत जैसे शो पर उसी प्रांत विशेष के नेताओं को लेकर स्थानीय प्रतिभागियों के लिए वोट की अपील करना, कहां तक न्यायसंगत है. जब पूरे देश ही नहीं विदेश की जनता शो देख रही है, तो वोट की अपील केवल महाराष्ट्र और बंगाल के लोगों से ही क्यों? क्यों नहीं कहा जाता कि भारत की वैशाली को जिताने के लिए वोट करें या भारत के सोमेन और तोरषा अच्छा गाते हैं, तो उन्हें जितायें. बार-बार बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब इत्यादि प्रदेशों के नाम लेकर क्या जताने चाहते हैं ये शोज के एंकर. टीआरपी की अंधी दौड़ में ये लोग क्यों भूल जाते हैं कि टीवी देख रही मासूम जनता पर इनकी बातों का कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. क्यों लोगों की भावनाएं भड़काने की बार-बार कोशिश की जाती है. और अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो क्यों न इस तरह के शोज पर प्रतिबंध लगा दिया जाये. जब राज ठाकरे बिहार-उत्तरप्रदेश के लोगों के खिलाफ कुछ बोलते हैं, तो उनके खिलाफ भावनाएं भड़काने का मुकदमा होता है, तो इन शोज के कर्ता-धर्ताओं के खिलाफ क्यों नहीं??? आखिर हम सब राज्य और क्षेत्रीयता की भावना से ऊपर उठ कर कब भारतीय बनेंगे. आजादी के इतने सालों बाद भी हम नहीं चेते, तो अनर्थ निश्चित है. तो अब टीवी के माध्यम से किये जा रहे इमोशनल अत्याचार पर कब लगेगी रोक&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-6946515400331529868?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/6946515400331529868/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=6946515400331529868' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/6946515400331529868'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/6946515400331529868'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2009/01/blog-post_5907.html' title='रियलिटी शो या टीवी का इमोशनल अत्याचार'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-5331461510884272829</id><published>2009-01-14T12:28:00.000-08:00</published><updated>2009-01-14T12:33:52.499-08:00</updated><title type='text'>उदासी</title><content type='html'>जिंदगी चलते-चलते अचानक ठहर सी जाती है,&lt;br /&gt;तब देखता हूं अपनी ही आंखों में उदासी है।&lt;br /&gt;जिन आंखों में डूबकर लिखता था किस्सा मुहब्बत का,&lt;br /&gt;उन आंखों के कतरों की उदासी भी तो प्यासी है।&lt;br /&gt;तेरी शबनम सी आंहों पर बदल बैठा ये दिल मेरा,&lt;br /&gt;तेरे आगोश में रहकर मचल बैठा ये दिल मेरा।&lt;br /&gt;तेरी एक भूख ने बदल दी तस्वीर ये कैसी है,&lt;br /&gt;जलन दिल की तब जैसी थी, ये वैसी थी ये वैसी है.&lt;br /&gt;मैं हंसता हूं, न रोता हूं मेरी तकदीर कैसी है,&lt;br /&gt;झपट कर फाड़ दी हो जैसे ये तसवीर वैसी है।&lt;br /&gt;तेरे मासूम गुनाहों की सजा, किसी को दे नहीं सकता,&lt;br /&gt;मेरे पागल दिल भला मैं तुझको खो नहीं सकता.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-5331461510884272829?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/5331461510884272829/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=5331461510884272829' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/5331461510884272829'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/5331461510884272829'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='उदासी'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-195365034824982546</id><published>2008-12-23T06:01:00.000-08:00</published><updated>2008-12-23T06:03:45.994-08:00</updated><title type='text'>यह कथा है टीवी की, बीवी की, वोटों की नोटों की...</title><content type='html'>टीवी वाले भी जब भी मर्जी कुछ भी दिखाने लगते हैं. हाल के दिनों में टीवी चैनलों के टैलेंट हंट शोज ने मेरी रातों की नींद उड़ा दी है. क्या करें मामला टीवी और बीवी का जो ठहरा. रात में घर पहुंचे और न्यूज चैनल देखने की कोशिश करो, तो बीवी टीवी का रिमोट छीन कर उस चैनल पर लगा देती हैं, जिस पर आ रहा होता है टैलेंट हंट शो. यहां सबकुछ होता है, जो पहले सास-बहू छाप ड्रामों में हुआ करता था. रोना-गाना-नाचना और भी बहुत कुछ. एक प्रतिभागी का दूसरे से चल रहा चक्कर तो एंकर सबके बीच में बना हुआ घनचक्कर. फिर बारी आती है वोट मांगने की. नेताओं की तरह ये प्रतिभागी भी मुझ जैसी निरीह जनता से एसएमएस से वोट मांगते हैं. वे तो मांगते हैं वोट और मेरे मोबाइल के घटते हैं नोट. एक-एक वोट की लागत तीन रुपये से कम तो किसी भी हालत में नहीं होती. अब बीवी को कौन बताये कि मेरे मोबाइल से एक रुपये में एसटीडी कॉल हो सकती है, तो फिर एक एसएमएस के लिए तीन रुपये खर्च करने में जान निकल जाती है. पर क्या करें, जब आज तक बड़े-बड़े दिग्गज बीवी के खिलाफ मुंह नहीं खोल पाये, तो मेरी मजाल ही क्या है. खैर जो भी हो मेरी तो जेब ढीली हो ही रही है. कल मेरे एक मित्र पूछने लगे, आपको टैलेंट हंट शोज के बारे में इतनी जानकारी कैसे रहती है. अब मैं उन्हें क्या बताता कि रात भर टीवी पर यही सब देखना मेरी उन सजाओं में शामिल है, जो बीवी ने मेरे लिए तजबीज की होती है. बात कर रहे थे टैलेंट हंट शोज की. यहां भी किसी भी हालत में टैलेंट का हंट तो दिखायी नहीं देता. कुछ दिखता है, तो केवल नौटंकी. लगातार गिरते स्तर के बीच स्तरीय गायक बाहर होते जा रहे हैं औऱ स्तरहीन लोगों को वोट मिल रहे हैं. जय हो भारत की जनता की. शायद इसे लगता है कि वोटों का अधिकार केवल स्तरहीन लोगों का होता है. आज तक एक भी ईमानदार नेता चुनाव में जीता है, जो एक भी बढ़िया गायक टैलेंट हंट शो में जीत दर्ज करा सके. एक शो आता है इंडियन आइडल-४. पिछले तीन हफ्तों में लगातार तीन लड़कियों बनारस की अनन्या मिश्रा, दिल्ली की तुलिका गांगुली और ग्वालियर की शीनी कलविंत को जनता ने वोट आउट कर उनके शहर लौटा दिया. ठीक है भाई इन लड़कियों में टैलेंट जो था. फिर हम लोगों को टैलेंट की जरूरत थोड़े है. हमें तो नौटंकी की जरूरत है. जो बाकी बचे हैं, उनमें से टैलेंटेड लोग धीरे-धीरे निकलते जायेंगे और नौटंकीबाज की चांदी रहेगी. और अंत में जीतेगा सबसे बड़ा नौटंकीबाज ही. दूसरी बात, इंडियन आइडल के निर्णायकों की एक तमन्ना पिछले चार सालों से पूरी नहीं हो रही है. वे चाहते हैं कि कोई लड़की इंडियन आइडल का खिताब जीते. अब हम आपको क्या बतायें सोनाली जी, अनु जी, कैलाश जी और जावेद साहब. यह हमारा देश है. सोनाली जी ठीक कहती हैं हम अब भी नहीं बदले. भला लड़कियों को हम ऊंचे मुकाम तक कैसे जाने दे सकते हैं. आज तक ऐसा कभी हमने होने दिया है, जो आज होने देंगे. किरण बेदी को हमने दिल्ली का पुलिस कमिश्नर नहीं बनने दिया, भले ही वह टैलेंटेड और सीनियर थीं. तो फिर इन लड़कियों की क्या मजाल जो इंडियन आइडल बन पायें. सो सोनाली जी अपने सपने को सपने में ही पूरा होते देखिये. हकीकत दूर की बात है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-195365034824982546?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/195365034824982546/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=195365034824982546' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/195365034824982546'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/195365034824982546'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/12/blog-post_23.html' title='यह कथा है टीवी की, बीवी की, वोटों की नोटों की...'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-499806206899496256</id><published>2008-12-03T20:27:00.000-08:00</published><updated>2008-12-03T20:46:15.285-08:00</updated><title type='text'>दीज...पॉलिटिशियंस...</title><content type='html'>जी हां, यही वे चंद शब्द हैं, जो २६-११ को मुंबई में हुए आतंकी हमलों के बाद उसी रात साढ़े तीन बजे ताज होटल से निकाले गये एक बुजुर्गवार ने व्यक्त किये. उनका पूरा वाक्य अंगरेजी में था. हिंदी में उसका मतलब निकलता है, हमारे पास अच्छे जवान, अच्छी सेना, बेहतर एनएसजी कमांडोज हैं, पर दीज बॉस्टर्ड पॉलिटिशियंस...कहीं न कहीं बुजुर्गवार के मुंह से निकले ये चंद शब्द भारतीय मानस की पीड़ा को दर्शा जाते हैं. आखिर कब तक भारतीय इसी तरह पिसते रहेंगे. आखिर कब तक लचर लोकतंत्र की कीमत हमें चुकानी पड़ेगी. जवाब ढूंढ़ने के लिए अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं है. जवाब हमारे अपने पास मौजूद है. हम तब तक इसी तरह पिसते रहेंगे, जब युवा शक्ति प्रबंधन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और अन्य क्षेत्रों की तरह राजनीति को भी करियर के रूप में नहीं चुनती. क्योंकि अब तक भारत पर सठियाए लोग ही राज करते रहे हैं. जिस उम्र में संन्यास लिया जाना चाहिए, उस उम्र में हमारे राजनीति दां प्रधानमंत्री बनने की चाह पालना शुरू करते हैं. ऐसा होने का एक कारण और भी है. भारत में कोई व्यक्ति जब राजनीति में कदम रखता है, तो भले ही युवा होता है, लेकिन शिखर पर पहुंचने में उसकी सारी उम्र बीत जाती है. सठियाने की उम्र में शिखर पर पहुंचा व्यक्ति अपने सपनों को पूरा करने में लग जाता है और देश चला जाता है रसातल की ओर. चीन जैसे रूढ़िवादी देश के नेता एक उम्र के बाद रिटायरमेंट की घोषणा कर देते हैं और युवाओं को आगे आने के लिए प्रेरित करते हैं. पड़ोसी के इस कदम की न तो हम सराहना करते हैं और न ही अनुकरण. यह जानते हुए भी कि शायद यह उन कारणों में से एक है, जिसके कारण चीन इतनी तेजी से प्रगति कर रहा है. फिर मुंबई में या देश के अलग-अलग हिस्सों में जो कुछ हो रहा है, उससे निबटने के लिए निष्चित तौर पर जोश और होश दोनों की जरूरत है. युवाओं को आगे लाकर हम जोश दिखा सकते हैं. रही होश की बात, तो उसके लिए नेपथ्य में रह कर बुजुर्ग नेता काम कर सकते हैं. पर उसके लिए जरूरत होगी देशप्रेम की भावना की. अपने सपनों को देश के सपनों के सामने कुर्बान करना होगा. तभी होगा एक सशक्त भारत का निर्माण...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-499806206899496256?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/499806206899496256/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=499806206899496256' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/499806206899496256'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/499806206899496256'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='दीज...पॉलिटिशियंस...'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-8676089312267409702</id><published>2008-07-22T10:49:00.000-07:00</published><updated>2008-07-22T10:54:09.760-07:00</updated><title type='text'>चलो नेता बनें</title><content type='html'>नेता तरह-तरह के होते हैं. कुछ छोटे, कुछ बड़े, तो कुछ सिर्फ नेता होते हैं. वे क्यों होते हैं, क्या करते हैं, इसका कुछ पता नहीं. वे बस होते हैं. कुछ केवल नाम के होते हैं. जैसे हर गांव में (विशेषकर उत्तरप्रदेश और बिहार के गावों में कई सारे थानेदार, जिलेदार, हवलदार, तालुकरदार केवल नाम के होते हैं) वे ही कुछ नेता होते हैं, बस नाम के. मेरे गांव में (उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले के एक गांव, नाम-सिसवा) भी ऐसे तमाम नेता हैं. कुछ की बानगी पेश है ः आग्याराम नेता. इनका काम एक जमाने में सरकार के हर फैसले के खिलाफ गांव से तीन किलोमीटर दूर झिलाही बाजार की रेलवे क्रासिंग के किनारे अनशन पर बैठना था. खुद को विनोबा भावे का शिष्य मानते हैं और अब गांव में एक गौशाला बना लिये हैं. सरकारी और व्यक्तिगत स्तर पर काफी मदद मिली और ३० लाख रुयये लगभग हाथ में आये. अब सरकार के किसी फैसले पर इन्हें ऐतराज नहीं होता. आराम से ५ लाख रुपये से बनी इमारत में रहते हैं. जेनरेटर, मोबाइल, फोन, टीवी और पीने के लिए गायों का दूध व खाने के लिए चारा. अब बात करते हैं आदित्य नेता की. पूरा नाम आदित्य प्रसाद शुक्ल पुत्र स्व तिलकराम शुक्ल. काम ः उत्तरप्रदेश पुलिस में होमगाडॆ. एक जमाने में गालियां देने और लोगों के सुख-दुख में काम आने के लिए (विशेषकर जिस घर में कुछ खूबसूरत लोग हों) मशहूर थे, आजकल लोगों की बुराई करने का ठेका लेते हैं. इधर की उधर करना फुट कर काम है. एक और हैं, जिनका नाम ही नेता है (असली नाम मुझे भी नहीं पता). यह सबसे अच्छे हैं. गांव में कम पाये जाते हैं. लुधियाना के किसी सिनेमा हाल में काम करते हैं और परिवार का भरण-पोषण में लगे हैं. है न अच्छी बात. काम का काम और फिल्मों की फिल्में. किसी तरह की चांय-भांय नहीं. एक हमारे पड़ोसी हैं राममणि नेता. किसी जमाने में रुपया कमाने दिल्ली गये थे. जमींदार के पोते थे, सो चाकरी कैसे करते. गांव लौटे, गन्ना विभाग में साइकिलिस्ट हो गये और आजीवन बने रहे. आजकल रिटायर हैं इसलिए खाली हैं. खाली हैं, तो कुछ करना चाहिए. करते हैं. शाम को बाजार जरूर जाते हैं. वहां अच्छी-अच्छी बातें, राजनीति की बातें, पड़ोस की बातें, गांव की बातें ....चाय और समोसे के साथ ढेर सारी बातें करते हैं. ऐसे कई और नेता हैं मेरे गांव में. पर आज संसद में जो कुछ हुआ, वह देख कर गांव के नेताओं पर अंगुली उठाने की हिम्मत नहीं रही. पता नहीं कब, कौन गांव की जमीन बेच कर रुपया इकट्ठा कर ले और भरे बाजार ले जाकर कहे कि मैंने उसे दिये थे, प्रधान के पक्ष या खिलाफ वोट देने के लिए. तो भैया आज मैं बाल-बाल बचा, जो तीन-चार नेताओं तक ही पहुंचा. हालांकि फायदा बहुत है नेतागीरी में. डॉ रूपेश भैया ने आलोक की एक पोस्ट पर कमेंट दिया है कि भड़ासियों को पॉलिटिकल पार्टी बना लेनी चाहिए. मैं पहले तो सोचता था कि नेता भ्रष्ट होते हैं, पर आज पता चला नहीं उनके पास बहुत पैसा होता है. इतना कि देश की अंतरात्मा संसद तक में लहरा सकें. औऱ शर्म तो इन्हें आती ही नहीं. तो भाई हम भड़ासी भी तो बेशर्म टाइप के लोग हैं. क्यों रोज संपादक जी की झिड़की खायें, अब उठिये, चलिये, एक पोलिटिकल पार्टी बनायें...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-8676089312267409702?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/8676089312267409702/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=8676089312267409702' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/8676089312267409702'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/8676089312267409702'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/07/blog-post_22.html' title='चलो नेता बनें'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-8076304580972407382</id><published>2008-07-20T07:53:00.000-07:00</published><updated>2008-07-20T07:54:57.664-07:00</updated><title type='text'>वे दो रास्ते</title><content type='html'>घर से दफ्तर आने के दो रास्ते हैं. एक रास्ते का प्रयोग रोज करता हूं. दूसरे रास्ते का प्रयोग केवल रविवार को. जिस बस से रोज कार्यालय आता हूं, वह रविवार को बंद रहती है. दूसरी बस दूसरे रास्ते से आती है. आइये पहले पहले रास्ते की बात करें. पहले रास्ते पर एक फ्लाईओवर पड़ता है. फ्लाईओवर के नीचे से बस आती है. फ्लाईओवर के नीचे दूसरी ओर अन्य बड़े शहरों (लोग कहते हैं, पर कलकत्ता बड़ा शहर बन रहा है, अभी नहीं है) की तरह कुछ लोग रहते हैं. प्लास्टिक की चादरें तान कर बड़े बिंदास अंदाज में सोते दिखते हैं उन घरों के अधिकतर पुरुष. शायद निगम के पानी आपूर्ति के समय की बदौलत जिस समय मेरी बस वहां से गुजरती है, उसी समय वहां लगे नल पर बड़ी संख्या में उन प्लास्टिक के घरों में रहनेवाली कुछ महिलाएं और लड़कियां नहा रही होती हैं. हालांकि वे काफी कोशिश करती हैं कि शरीर का अधिकांश हिस्सा ढका रहे, पर ... पहले मेरी दिलचस्पी उन महिलाओं और लड़कियों में हुआ करती थी. आजकल बस के यात्रियों पर नजर रहती है. देखता हूं कि जैसे कभी मैं उन महिलाओं को घूर-घूर कर ताका करता था, वैसे ही बस के अधिकतर पुरुष यात्री ताकते हैं. बस में सवार महिला यात्री एक बार उधर नजर डालती हैं और फिर नाक-भौं सिकोड़ कर कहीं और देखने लगती हैं.आइये अब बात करें दूसरे रास्ते की. जो लोग दिल्ली के रोज गार्डेन के बारे में जानते हैं, उन्हें कलकत्ता के विक्टोरिया मेमोरियल की बाबत बताने की जरूरत नहीं. कभी महारानी विक्टोरिया के स्वागत के लिए बनायी गयी इस इमारत का पार्क अब प्रेमी जोड़ों के मिलन का या यूं कहें थोड़ी-बहुत शारीरिक गरमी (रोज गार्डेन की स्थिति और दयनीय है, विशेषकर शाम को) दूर करने का अड्डा बन गया है. हां, तो रविवार को मेरी बस उसी विक्टोरिया पार्क के किनारे से गुजरती है. आज देखता हूं कि एकदम सड़क के किनारे पार्क में लगे एक वृक्ष और बाउंड्री के बीच एक जोड़ा खड़ा है. लड़का सड़क की ओर देख कर हिचक रहा था और लड़की उससे सटी जा रही थी..........और बहुत कुछ. बस........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-8076304580972407382?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/8076304580972407382/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=8076304580972407382' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/8076304580972407382'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/8076304580972407382'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='वे दो रास्ते'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-5075996571855695881</id><published>2008-06-24T11:33:00.000-07:00</published><updated>2008-06-24T11:35:37.802-07:00</updated><title type='text'>मां रोती क्यों है</title><content type='html'>उत्तरप्रदेश के अधिकांश हिस्सों में एक प्रथा है. शादी के लिए बेटे की बारात बिदा करते समय,हर मां आखिरी बार बेटे को दूध पिलाती है.उस दौरान अधिकतर मांओं को मैंने रोते हुए देखा है. मेरी मां ने भी शादी के समय मुझे दूध पिलाया था. मैंने देखा कि उसकी आंखें नम थीं. इसका कारण आज तक ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा हूं.हर मां अपने बेटे को दूल्हा बने देखना चाहती है. उसकी खुशियां चाहती है. संतान को जरा सी तकलीफ होने पर रोने लगती है. उसकी खुशी के लिए कुछ भी करने के लिए हर समय तैयार रहती है. पर जब बेटा जवान होकर दुल्हनियां लाने चलता है, तो मां रोती क्यों है? क्या इसलिए कि उस दिन उसका बेटा पराया हो जाता है. या फिर इसलिए कि उस दिन मां सबसे अधिक खुश होती है. या फिर इसलिए कि वह यह सोचती है कि जो बेटा कल तक उसकी गोद में खेलता था, कितनी जल्दी बड़ा हो गया. कारण जो भी हो, मां आखिर रोती क्यों है???????????????&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-5075996571855695881?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/5075996571855695881/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=5075996571855695881' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/5075996571855695881'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/5075996571855695881'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/06/blog-post_24.html' title='मां रोती क्यों है'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-1331343257806433614</id><published>2008-06-21T10:24:00.001-07:00</published><updated>2008-06-21T10:24:39.658-07:00</updated><title type='text'>प्रभात खबर के मुख्य संपादक को पहला सप्रे अवार्ड</title><content type='html'>शनिवार को भोपाल में एक कार्यक्रम आयोजित कर प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंशजी को पहले माधवराव सप्रे अवार्ड से सम्मानित किया गया. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें २१ हजार रुपये, श्रीफल व स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया. मौके पर मीडिया के कई दिग्गज व मध्यप्रदेश सरकार के तमाम मंत्री भी उपस्थित थे. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि स्वस्थ आलोचना की भूमिका में मीडिया मित्र है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-1331343257806433614?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/1331343257806433614/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=1331343257806433614' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/1331343257806433614'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/1331343257806433614'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/06/blog-post_21.html' title='प्रभात खबर के मुख्य संपादक को पहला सप्रे अवार्ड'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-2264218841873939909</id><published>2008-06-18T07:11:00.000-07:00</published><updated>2008-06-18T07:13:06.849-07:00</updated><title type='text'>मीडिया आंदोलन नहीं करता</title><content type='html'>इस समय जिस अखबार में मैं काम करता हूं, उसका नारा है अखबार नहीं आंदोलन. सवाल इस नारे पर नहीं है. सवाल मन में भी नहीं है. सवाल उठा था उस दिन जब कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद में एक समारोह के दौरान प्रभात खबर के मुख्य संपादक हरिवंशजी ने कहा कि अखबार आंदोलन नहीं करते. उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया था कि हमारे अखबार का नारा ही अखबार नहीं आंदोलन नहीं है,पर आज अखबार आंदोलन नहीं करते. अधिक गहराई में न जाते हुए उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि अगर दो खबरें हों और आज की तारीख में एक को चुननी हों, तो मन साहित्य या बदलाव की खबर को चुनेगा, लेकिन दिमाग चुनेगा करीना कपूर (या शायद उन्होंने किसी और अभिनेत्री का नाम लिया था) की खबर को. आज अचानक इस विषय पर मन में कुछ भाव जाग्रत हुए, पर क्यों यह पता नहीं. शायद इसलिए कि अनिलजी (अनिल यादव जी, लखनऊ वाले) के ब्लॉग पर एसपी सिंह की बातें पढ़ने को मिलीं इसलिए या शायद तीन-चार सालों से मन में बहुत कुछ चल रहा था, वह सब बाहर आने को तैयार है. पत्रकारिता में आया था, तो धन कमाने की कोई लालसा नहीं थी. कभी धन को लेकर कोई विवाद भी नहीं हुआ. यशवंतजी इस बात के गवाह हैं कि किस तरह एक सब-एडीटर बिना किसी ना-नुकुर के लिए जूनियर सब-एडीटर के रूप में काम करने को तैयार हो जाता है. लालसा केवल एक कि नये जेनरेशन के अखबार में काम करने को मिलेगा. हां, तो बात कर रहा था आंदोलन की. सवाल वही है, क्या अखबार (आज की बात करें, तो मीडिया) आंदोलन कर सकता है. समाज को बदल सकता है. जवाब शायद नहीं ही होगा, पर हम मीडिया से जुड़े लोग इस बात को मानें भी तो कैसे. आखिर समाज को कुछ तो जताना होगा कि हमारा अस्तित्व किस लिए है. नये संस्करणों की आपाधापी, खबरों न छूटने का दबाव, अच्छे से संपादित खबरें, बढ़िया लेआउट, फोटो.............और जाने क्या-क्या. इसी बीच सैलरी...फलाना अखबार बढ़िया सैलरी दे रहा है, कूद पड़ो मैदान में, दूसरा न्यूज एडीटर को लैपटॉप दे रहा है, लपक लो, युवाओं को फलां जगह बेहतर मौके मिल रहे हैं, दौड़ो....इत्यादि.....अब भइया मेरे आंदोलन हो तो कैसे. बुद्धिजीवी तो हम रह नहीं गये...माने बुद्धि की तो खाते ही नहीं. बुद्धि की तब खाते थे, जब खबरें कम, विचार ज्यादा पनपते थे मन में. खबर काटने-छांटने में सारी रात मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी. कुछ पढ़ते-लिखते थे. योग्य होते थे. आज योग्यता के मायने बदल गये हैं. (हिंदी अखबारों में काम कर रहे हैं, तो)हिंदी थोड़ी सी ठीक हो, पेज बनाना (जितनी जल्दी हो सके) जानते हों और सेटिंग आती हो.....तो अब मीडिया वास्तव में एक प्रोफेशन बन गया है???????????????????????????????&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-2264218841873939909?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/2264218841873939909/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=2264218841873939909' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/2264218841873939909'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/2264218841873939909'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='मीडिया आंदोलन नहीं करता'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-2282402582034576278</id><published>2008-05-10T11:53:00.000-07:00</published><updated>2008-05-10T11:54:03.188-07:00</updated><title type='text'>नेकी कर दरिया में डाल</title><content type='html'>&lt;p&gt;क्या कभी आपने अपने पड़ोसी की मदद की है। अगर हां, तो आगे से मत कीजिएगा. चौंक गये होंगे कि कल एक अनजान महिला की मदद ना करने पाने पर परेशान होने वाला शख्स आज अचानक इतना उद्वेलित क्यों है. तो आइये आपको एक सच्ची कहानी सुनाता हूं. लगभग ५२ साल पहले की बात है, मेरे पिता श्री राम प्रसाद शुक्ल आठवीं की पढ़ायी के बाद दिल्ली कमाने चले गये. घर में उनके पिताजी (मेरे दादाजी, बुआ और दादी थीं). जमींदारी खत्म हो गयी थी और घर में कमानेवाला कोई नहीं था. दिल्ली में उन्हें शायद ३० रुपये महीने या १६ रुपये (पिताजी से पूछ कर बताऊंगा)की नौकरी मिल गयी. दिन भर काम करते और रात में पढ़ाई. इस तरह १०वीं तक पढ़ भी लिया. हालांकि अनुभव ने उन्हें इतना सिखाया है कि जिस कंपनी में काम करते हैं, उसका सीए भी उनसे घबराता है. हां, तो पिताजी धीरे-धीरे प्रगति करते गये और हम पांच भाई-बहनों को पढ़ाया-लिखाया और किसी काबिल बनाया. इस बीच उन्होंने गांव और रिश्तेदारी के लगभग ५० लोगों को काम दिलाया. इन्हीं लोगों में एक हैं राममणि शुक्ल, जो मेरे ताऊ लगते हैं. मेरे घर के ठीक सामने इनका घर है. पिताजी ने ताऊ जी को नौकरी दिलायी, नहीं कर पाये. उनके बड़े बेटे अशोक शुक्ल को नौकरी दिलायी, नहीं कर पाये. मंझले बेटे मनोज शुक्ल (अब इस दुनिया में नहीं) को नौकरी दिलायी, नहीं कर पाये. छोटे बेटे रामखेलावन उफॆ हवलदार को नौकरी दिलायी, जो आज भी कर रहा है. उसकी बदौलत ताऊजी का घर बना. घर बनाते समय किसी पंडित ने बताया कि जहां हमारा रास्ता है, वहां उनका घर बनता है. अब वह लगे गिड़गिड़ाने. इस पर एक समझौता हुआ कि घर के पीछे से हमें रास्ता देंगे और सामने वह मकान बनवा लें. उनका मकान बन गया, लेकिन पीछे जो पुराना मकान था, उसका एक कच्चा कमरा अब भी खड़ा है. बार-बार आग्रह और कुछ धन लेने के बावजूद अब तक उन्होंने रास्ता नहीं दिया. १६ अप्रैल को ताऊजी के पोते की शादी थी, जिसके लिए पिताजी हजारों रुपया खचॆ करके पहुंचे, टूर रास्ते में छोड़ कर. चार मई को गांव में रहनेवाले मेरे बड़े भाई विकास ने हवलदार को बुला कर एक बार फिर आग्रह किया कि रास्ते के लिए जगह छोड़ दें. बताते चलें कि मेरे घर तक साइकिल व मोटरसाइकिल जा सकती है, कोई अन्य वाहन नहीं. हां, तो भाई के आग्रह के बाद, पता नहीं किस भावना के वशीभूत होकर (भाई ने किसी तरह की जोरजबदॆस्ती की बात नहीं की) उन लोगों ने स्व. मनोज की पत्नी नीलम देवी के नाम से पुलिस अधीक्षक, गोंडा के यहां लिखित शिकायत कर दी कि विकास ने उन्हें गाली दी है. यहां एक बात और स्पष्ट कर दूं कि विकास भैया को गाली से भारी चिढ़ है. एक बार स्व. मनोज ने उन्हें गाली दी थी, तो उनका सिर फोड़ दिया था. अब आप लोग बतायें कि हम क्या करें. बता दूं कि जिस कंपनी में हवलदार काम करते हैं, पिताजी उसी में बड़े अधिकारी हैं. तो क्या हवलदार को नौकरी से चलता कर देना चाहिए???? यहां यह भी बता दूं कि यह महज एक उदाहरण है. हमने उस परिवार से हजारों गालियां खायी हैं. हमेशा उसने हमारे रास्ते में गड्ढा खोदा है, पर पिताजी की वजह से हमेशा बच गये. पिताजी का एक ही सिद्धांत रहा है कि हमारे कारण कोई दुखी या परेशान न हो. रात-बिरात जब भी जरूरत पड़ी हम उनके साथ रहे. आज उन्होंने ही भाई के खिलाफ एसपी से शिकायत की है. उनके घर में धन आने का एकमात्र रास्त हवलदार की नौकरी है. वहीं बंद करवा दें?????????? न रहेगा बांस, न रहेगी बांसुरी. जो काम आपस में बैठ कर समझ-बूझ कर बिना किसी विवाद के लिए हो सकता है, क्या अब उसके लिए हम अग्रेसिव होकर मुकदमा करें और अपना हक लेते हुए उस परिवार को बरबादी की कगार पर ढकेल दें. आप लोग क्या कहते हैं???????????? यह पोस्ट सिर्फ इसलिए कि आप बतायें, हम क्या करें? अब भी चुप रहें, तो कायरता होगी???????? कदम उठायें, तो एक परिवार बरबाद होता है?????????? फिर पत्रकार होते हुए जिस पुलिस को आज तक घास नहीं डाली, उसके सामने खड़े हों और ताऊजी की खिलाफत करें????????????इस पोस्ट का कतई मतलब नहीं कि मैं पिताजी या अपने परिवार की बड़ाई के लिए कुछ कह रहा हूं. इसका सिर्फ इतना मतलब है कि भड़ास नामक अपने परिवार से मुझे राय चाहिए, स्पष्ट कर दूं, राय चाहिए, मदद नहीं. अन्य के लिए हम काफी हैं. तो क्या है आप लोगों की राय? मामले की गंभीरता को समझते हुए उचित सलाह दें. &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-2282402582034576278?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/2282402582034576278/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=2282402582034576278' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/2282402582034576278'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/2282402582034576278'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/05/blog-post_10.html' title='नेकी कर दरिया में डाल'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-8711932114997997704</id><published>2008-05-08T11:15:00.001-07:00</published><updated>2008-05-08T11:15:29.433-07:00</updated><title type='text'>किस काबिल हूं मैं</title><content type='html'>आज दोपहर में (हमारे लिये सुबह) घर से आफिस के लिए आ रहा था. रास्ते में एक जगह पर देखा कि एक अद्धॆविक्षिप्त सा युवक एक पूरी तरह से नग्न अधेड़ महिला (शायद उसकी मां रही होगी) को फुटपाथ से गोद में उठाने की कोशिश कर रहा था. कुछ सोच पाता इससे पहले नजर घड़ी पर पड़ गयी. दो बज कर बीस मिनट हो रहे थे और आफिस पहुंचने का टाइम दो बजे का है. काडॆ जो पंच करना होता है. बस उनके लिए कुछ करने की कौन कहे, सरपट आफिस के लिए भाग लिया. बस तभी से आत्मग्लानि से भरा हूं. आखिर वे भी तो इंसान थे. क्यों नहीं मैं उनके लिए कुछ कर पाया. भले ही वह महिला पागल रही हो, क्या मैं उसके लिए एक धोती नहीं खरीद सकता है, जबकि पान मसाला पर दिनभर में कम से कम तीस रुपये खचॆ होते हैं. यही सोच रहा हूं और दिल में रो रहा हूं. आखिर में लौटा और उसी स्थान पर गया, पर वे दोनों नहीं मिले. क्या करूं?????????????????????????&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-8711932114997997704?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/8711932114997997704/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=8711932114997997704' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/8711932114997997704'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/8711932114997997704'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='किस काबिल हूं मैं'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-7233087176535756426</id><published>2008-04-13T11:08:00.000-07:00</published><updated>2008-04-13T11:12:37.629-07:00</updated><title type='text'>सपना</title><content type='html'>&lt;p&gt;सपना देखा करता था &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब छोटा था, सच्चा था &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सपना देखा करता था &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब पढ़ता था, बच्चा था&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सपने होते थे अजीबोगरीब&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देश के विकास के &lt;/p&gt;&lt;p&gt;भ्रष्टाचार के विनाश के &lt;/p&gt;&lt;p&gt;नेताओं के सुधार के&lt;/p&gt;&lt;p&gt;और सपने होते थे &lt;/p&gt;&lt;p&gt;गांवों के विकास के &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आजादी के, इतिहास के&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सपने होते थे&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गांधी के अरमानों के &lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगत जैसे कुरबानों के&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सपने होते थे&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रानी झांसी मर्दाना के &lt;/p&gt;&lt;p&gt;और सपने होते थे &lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्यार के, मुहब्बत के &lt;/p&gt;&lt;p&gt;भाईचारे के और और...और...और&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सपने होते थे......&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सारे सपने,  सपने ही रह गये&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भला खुली आंखों से देखा &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सपना भी कभी पूरा हुआ&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-7233087176535756426?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/7233087176535756426/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=7233087176535756426' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/7233087176535756426'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/7233087176535756426'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/04/blog-post_13.html' title='सपना'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-5188250049259062923</id><published>2008-04-10T04:57:00.000-07:00</published><updated>2008-04-10T04:58:21.188-07:00</updated><title type='text'>सपने साकार होंगे</title><content type='html'>धर्मेंद्र भइया ने नया ब्लॉग बनाया, उसके लिए बधाई. नाम भी बड़ा अच्छा रखा है, सपने. बचपन से आज तक इन्होंने कई सपने देखे होंगे. यह उस तरह के लोगों में हैं, जो अपने सपनों को साकार करना जानते हैं. या यूं कहें कि इनमें वह माद्दा है कि अपने सपनों को साकार कर सकें. एक जूनियर के रूप में इनके साथ काम करते हुए बहुत कुछ सीखने का मौका मिला. उनमें एक चीज जो सबसे बढ़िया सीखी, वह यह कि कभी काम और सच के साथ समझौता नहीं करते. शायद यही कारण है कि उनके सपने साकार होते रहते हैं. सुख हो या दुख काम तो काम है. ब्लॉग के माध्यम से हमें और भी बहुत कुछ सिखाते रहेंगे. इसी कामना के साथ अभी बस इतना ही, आगे और भी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-5188250049259062923?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/5188250049259062923/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=5188250049259062923' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/5188250049259062923'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/5188250049259062923'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='सपने साकार होंगे'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-6513345932237414602</id><published>2008-03-06T10:32:00.000-08:00</published><updated>2008-03-06T10:34:13.476-08:00</updated><title type='text'>काम का आदमी</title><content type='html'>मन में बहुत कुछ है, पर लिखूं क्या यही समझ में नहीं आ रहा. दिल कहता है कि जीवन जैसे चल रहा है,चलने दो. दिमाग कहता है कि नहीं, फलाने तुम्हारे बाद इस लाइन में आया और आगे बढ़ गया और तुम वहीं के वहीं बैठे हो. आखिर कब तक समझौते पर समझौता करते जाओगे. और एक हम हैं कि काम से समझौता नहीं करते, करते हैं, तो दाम से. किसी ने कहा हम अभी इतना ही दे पायेंगे, तो सोचा चलो बाद में परफार्मेंस देखने के बाद सबकुछ ठीक हो जायेगा. पर नहीं होता है वही ढाक के तीन पात. कहीं कुछ नहीं. कोई तरक्की नहीं, परफार्मेंस को देखनेवाला कोई नहीं. लोगों (बॉस) को शायद लगता है कि इसके बारे में क्या सोचना, यह तो बेवकूफ है ही, जो भी दोगे ले लेगा और कुछ नहीं बोलेगा. और जब कम पैसे में काबिल (अपने आप को कह रहा हूं, अन्यथा न लें) आदमी मिल जाये, तो अधिक दाम देने की जरूरत ही क्या है. दो बार नौकरी बदली और दोनों बार यही अनुभव हुआ. कहीं सैलरी स्लिप न होने की सजा मिली, तो कहीं संबंधों की भेंट चढ़ गया. ऐसे और कितने दिन बिताओगे शुक्लाजी. बीवी मोबाइल मांग रही है, पर लायें कहां से जेब में तो किराया भी नहीं बचा. महीने का आखिर है, किसी तरह काम चल रहा है. खुद के पास भी एक महीने से मोबाइल नहीं है. एक समय था, जब घर में सबसे नया मोबाइल मेरे पास होता था. मां-बाप के पैसे को निर्दयतापूर्वक उड़ाता था, आज स्थितियां विकट हैं. एक-एक सिक्का खचॆ करने के पहले सोचना पड़ता है. उस पर तुर्रा यह कि अप्रैल के पहले हफ्ते या मई में बाप बननेवाला हूं. अस्पताल का खर्चा, फिर फंक्शन और जाने क्या-क्या. कम से कम ५० हजार रुपये चाहिए. हालांकि घर की बात करें, तो ऐसी कोई परेशानी नहीं है. पर अपना भी तो कुछ फर्ज बनता है. ६५ साल के पिताजी आज भी साल में छह महीने टूर पर रहते हैं, आखिर किसके लिए, हमारे लिए ही तो. और एक हम हैं कि उन्हें आजतक एक मोजा भी अपने पैसे से खरीद कर नहीं दिया. लानत है ऐसी नौकरी और बिना मतलब की ऐंठन पर. जिस तरह से सब नौकरी कर रहे हैं, मैं भी करता तो अब तक सब ठीक होता. मैं भी किसी ऊंची कुर्सी पर बैठ कर लंबा वेतन ऐंठ रहा होता, पर अपनी ही ऐंठन में मारा गया कि काम से समझौता नहीं करूंगा. लड़ जाता हूं, बॉस से सीनियर से या फिर जूनियर से कि अगर कोई काम बेहतर हो सकता था, तो हुआ क्यों नहीं. सब पागल समझते हैं, फिर भी कहते हैं काम का आदमी है. बस, काम का आदमी बन कर रह गया हूं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-6513345932237414602?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/6513345932237414602/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=6513345932237414602' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/6513345932237414602'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/6513345932237414602'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='काम का आदमी'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-747469311046087807</id><published>2008-02-20T02:16:00.000-08:00</published><updated>2008-02-20T02:30:37.586-08:00</updated><title type='text'>भड़ास और गालियाँ</title><content type='html'>भड़ास पर गालियों को लेकर एक बार फिर से बहस शुरू हो गयी है. भड़ास पर गालियां लिखी जायें या नहीं इस पर जम कर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. हम अपनी भड़ास गालियों के माध्यम से निकालें या नहीं यह भले ही बहस का मुद्दा बने, पर आम जीवन में यह बिल्कुल भी अस्वीकायॆ नहीं है. यहां मैं किसी साहित्यकार या रचनाकार का उदाहरण नहीं, बल्कि खुद एक चुटकुला या यूं कहें की लोकोक्ति के बारे में लिखना चाहूंगा, जो मेरे गृह जनपद गोंडा की शान बन गयी है. इसके पहले बताते चलें कि बनारस की तरह गोंडा में भी गालियों के बिना बात करना संभव ही नहीं है. मान लीजिए कोई अच्छा काम करता है, तो कहा जाता हैः वाह सार, बड़ा नीक काम किहिस हो. और अगर कुछ गड़बड़ हो गयी, तब तो ... कुछ इस अंदाज में प्रतिक्रियाएं मिलेंगी, मारो सारवा के.. बेटी...बड़ा ...है इत्यादि. हां तो बात कर रहा था लोकोक्ति की. हुआ कुछ यूं की एक बार एक सज्जन ट्रेन में यात्रा कर रहे थे. सामने वाली सीट पर बैठे सज्जन से बात शुरू हुई तो पता चला कि वह गोंडा के हैं. उन्होंने कहा, भाई साहब सुना है गोंडा के लोग बिना गाली दिये बात ही नहीं कर पाते हैं. इस पर सामने वाले सज्जन का जवाब था, कौन भोंसड़ी वाला मादर... कहता है? अब बताइये जो चीज हमारे दैनिक जीवन में बस गयी हो उससे कैसे बचा जाये. हालांकि लोगों के अपने-अपने विचार हो सकते हैं. और सही भी है, एक सभ्य समाज के लिए. पर हम इससे बच पायेंगे इसमें संदेह है. बिना गाली के भड़ास, तब तो भड़ास रह ही नहीं जाती. सक्षम हुए तो सामने, नहीं तो पीठ पीछे गरियायेंगे जरूर. हालांकि मेरी इस पोस्ट का कतई यह मतलब नहीं है कि मैं पूजा जी या नीलिमा जी या किसी और की खिलाफत कर रहा हूं. ऐसा भी नहीं है कि मैं उनकी नाराजगी के डर से ऐसा कह रहा हूं. पर...यह जो पर, लेकिन, किंतु, परंतु...इत्यादि शब्द हैं, न यह बहुत कुछ कह और समझा जाते हैं. आगे जय भड़ास&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-747469311046087807?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/747469311046087807/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=747469311046087807' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/747469311046087807'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/747469311046087807'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/02/blog-post_20.html' title='भड़ास और गालियाँ'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-2015130751891386247</id><published>2008-02-14T02:44:00.000-08:00</published><updated>2008-02-14T02:51:42.824-08:00</updated><title type='text'>मेरी बीवी</title><content type='html'>मेरी बीवी wonderful&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;मुझको  पीटे hunterful&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;मुझको तोवह रोज़ पीटती&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;जैसे दावा की डोज़ पीटती&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;सुबह पीटती शाम पीटती&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;शाम ढले वह रात पीटती&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;साला आख़िर saala है &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;लेकर usaka नाम पीटती&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;sasura मेरा thanedaar &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;सासु का अरमान पीटती&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;अब बच्चे की बारी है&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;देखें कितने बार पीटती.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-2015130751891386247?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/2015130751891386247/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=2015130751891386247' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/2015130751891386247'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/2015130751891386247'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='मेरी बीवी'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-2179888808570789714</id><published>2008-01-27T07:43:00.000-08:00</published><updated>2008-01-27T07:49:22.985-08:00</updated><title type='text'>तुम सब जानती हो अम्मां</title><content type='html'>तुम  सब जानती हो अम्मां&lt;br /&gt;इसीलिए नानी तुमको हीरा कहती थीं&lt;br /&gt;तुम आठों बहनों में सबसे सीधी थीं ना&lt;br /&gt; अब तुम हम पांचों (भाई बहन) के मन&lt;br /&gt;और मतिश्क की हर बात जान जानती हो न&lt;br /&gt;तुम सब जानती हो अम्मां&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-2179888808570789714?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/2179888808570789714/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=2179888808570789714' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/2179888808570789714'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/2179888808570789714'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2008/01/blog-post.html' title='तुम सब जानती हो अम्मां'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2340063624671142065.post-6916645563115002512</id><published>2007-11-27T10:08:00.000-08:00</published><updated>2007-11-27T10:14:35.218-08:00</updated><title type='text'>सब लीड का खेल है</title><content type='html'>kolkata se kolkata vaya kanpur ludhiyana ke  bahane bahut kuch  likhane kii koshish kayee dino se  kar raha tha, likha bhi par post nahin kar paya. hua kuch is tarah se  bhadasi saathiyon ki aajkal man bada udas hai. ek to kuch hi dinon mein dil mein bas gaye saathiyon ko chodane ka gham (inext kanpur ke 8 mahine), phir kuch gharelu samasya aur yahan (kolkata ) pahuncha to nandigram ne bechain kar diya. kuch kar nahin paa raha hoon. nandigram ki isthiti kaafi vikat hai. pata nahin kitane maare gaye, pata nahin kitni mahilaon ke saath rape hua, par hum kuch nahin kar paaye, kisi ne kabhi kaha tha ki bandook nahin kalam nikalo, akhbar nikalo, kuch aisa hi, yaad nahin aa raha. par bengal mein sab bekar cpim ki dadagiri charam par hai, ngo, crpf aur aam log kuch nahin kar paa rahe hain. kendra ka rawayia bhi dhulmul hi hai, isi bahane nuclear deal ke mamle ko saltane mein lagi hai. khair yeh sab chdiye. pata nahin kahan bhatak raha hoon, man se bhi aur likhane mein bhi. cheejen betarteeb ho rahi hain. nandigram mein jo hua, so hua, tasleema ke bahane kolkata  jaise shahar mein curfew lagana pada, army utarni padi, isase aur chot pahunchi. ek to yeh sochkar ki jab desh jal raha tha un paristhitiyon mein bhi kolkata  ke log nahin bhadake, phir choti si baat par itna gussa kyon. kahin rijwan ka gussa to bahar nahin aa gaya. budhijeeve verg, jo kolkata  aur bengal mein to kam se kam left ka himayati mana jata tha, aaj iske virodh mein khada hai, par sunane wala koi nahin.wahin kal subah-subah ek patrakar mitra ka phone aaya bole yaar kayee din to nikal gaye kayee headline mili, nandigram, lucknow blast, guwahati blast aur jaane kya-kya ginate rahe, aaj kuch nahin hai. front page ki lead kya banegi, yaar kuch batao samajh mein nahin aa raha hai. ab main unhe kya batata, lead to kayee hai, ek sajjan hain kolkata mein jo desh ki azadi ke liye lade 1901 mein paida hue aur aaj bhi sahi salamat logon ki muft chikitsa kar rahe hain unani padhati se, kya wag front page ki lead layak nahin, par nahin kah saka, janata hoon mitra hansenge, chup raha, tab tak tv par khabar aayee assam mein kayye jagah dhamake, mujhe laga mitra ko front page ki lead mil gayee, maine sochana chod diya kyonki ki lead taiyar thi, ab kal ki sochen ki kahan kitane maren aur hum lead banayen, luck mein 16 to guwahati mein 20 aur agali lead....? bas bhayiyon sab lead ka khel hai aur hamari raji-roti, par ab dar lagane laga hai, is khoon sani roti se, aise kaam se jahan kisi ki maut par hum khush hote hain, jitani maut, utani badi lead 2 column, 3 column yaa banner... ab lead ka yah khel nahin khela jaata...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2340063624671142065-6916645563115002512?l=kuchdilkii.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/feeds/6916645563115002512/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2340063624671142065&amp;postID=6916645563115002512' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/6916645563115002512'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2340063624671142065/posts/default/6916645563115002512'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchdilkii.blogspot.com/2007/11/blog-post_27.html' title='सब लीड का खेल है'/><author><name>विशाल शुक्ल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11662575406525353830</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://bp3.blogger.com/_-Iz4My0akow/R7AZoJaRiDI/AAAAAAAAACU/uofqMYdUYg4/S220/vis.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
