मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

जरा याद इन्हें भी कर लोः बाबू केदारनाथ अग्रवाल

अगस्त में भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ के मौके पर हिन्दुस्तान, कानपुर के लिए कानपुर और आस-पास के जिलों के हिन्दी साहित्य के पितृों पर किए गए काम की श्रृंखला प्रकाशित करने की शुरुआत की। किसी कारणवश यह कई महीने रुका रहा। अब फिर से कोशिश...।


अपनों ने ही मिटा दीं बाबू केदारनाथ अग्रवाल की यादें 


राख की मुर्दा तहों के बहुत नीचे,
नींद की काली गुफाओं के अंधेरे में तिरोहित,
मृत्यु के भुज-बंधनों में चेतनाहत
जो अंगारे खो गए थे,
पूर्वी जन-क्रांति के भूकम्प ने उनको उभारा।
बाबू केदारनाथ अग्रवाल ने 1948 में जब यह कविता लिखी थी तब उन्हें क्या पता था कि पीढि़यां उनकी क्रांतिकारी चेतना को इतनी जल्दी भुला देंगी। भले ही उनके जीवन और उनकी कृतियों पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में सैकड़ों शोध किए गए हैं। उनकी रचनाओं को पढ़ने से मन के तार झंकृत हो जाते हों लेकिन बुन्देलखण्ड के कलम के इस जादूगर की यादों को संजोने वाला बांदा में कोई नहीं है। यहां तक कि जिस स्थान पर बैठकर उन्होंने दर्जनों रचनाएं कीं, उस स्थान को भी बेच दिया गया। अब न तो उनके घर का खंडहर बचा और न ही उनसे जुड़ी कोई याद। इस महान व्यक्तित्व की स्मृति में शासन और प्रशासन की ओर से कोई काम नहीं किया गया। केदारनाथ अग्रवाल की बहू चेन्नई में अपने बच्चों के साथ रहती है। वह पेशे से प्रतिष्ठित अधिवक्ता भी थे। हाल ही में उनकी बहू ने केदारनाथ जी के उस घर को बेच दिया जहां वह रहते थे। उनकी स्मृति में रेलवे के एक अधिकारी ने बांदा स्टेशन पर एक शिलापट्ट लिखवाया है। इसी के सहारे उन्हें याद किया जा सकता है। बांदा के जिस इलाके में केदारनाथ अग्रवाल जी रहते थे, उसे अब डीसीडीएफ कॉलोनी के नाम से जाना जाता है। डीसीडीएफ के अध्यक्ष और केदारनाथ अग्रवाल के समर्थक सुधीर सिंह का कहना है कि सरकार की ओर से इस महान विभूति की यादों को संजोने के लिए कोई पहल नहीं की गई। भले ही इनकी कृतियां देश-विदेश में पढ़ी जाती हैं लेकिन सरकारों की उदासीनता की वजह से आज बांदा का नाम चमकाने वाले केदारनाथ अग्रवाल गुमनामी में चले गए। 

कोई टिप्पणी नहीं: