बुधवार, 2 नवंबर 2016

हर शहर में हर बार एक मकां ढूंढ़ता हूं
हमारे गांव में तो कभी ऐसा नहीं होता
वहां हर घर का दरवाजा खुला रहता है
रहने को यहां कोई कमरा नहीं होता
बहुत दिलदार हैं मेरे गांव की गलियां
कोई मोहल्ला वहां उदास नहीं होता
यह शहरों की कैसी रवायत बन गई
कोई भी चेहरा खुशमिजाज नहीं होता
रंग-ओ-बू में लिपटा हुआ इंसा ऐसा
कोई किसी का अपना नहीं होता
याद आता है वह बूढ़ा बरगद अपना
यहां दरख्तों पर कोई परिंदा नहीं होता
मेरी किस्मत मां से दूर भटकता हूं
यहां कोई बोसा लेने वाला नहीं होता

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