बुधवार, 2 नवंबर 2016

बहुत दिनों बाद एक बार फिर से....
ख्वाहिशें बहुत हैं मगर आसमां नहीं है
आसाइशें बहुत हैं मगर यहां मां नहीं है
चांद-सितारों तुम क्या जानो क्या कमी है
रोशनी आये जिससे वह रोशनदां नहीं है
गुल खिलते हैं यहां हर घर के गमले में
अम्मां का खिलाया वह गुलिस्तां नहीं है
पतंगा कितना ही तड़पे जान देने को
जल जाए हवा के झोंके से शमां नहीं है
क्या सुनाऊंगा मुनिया को मैं कहानी
ऐसी तो कोई भी अपनी दास्तां नहीं है
चलो जाओ सूरज अब तुम यहां से
छांव दे तुम्हारे तेज से दरख्तां नहीं है
समा ले गर्मजोशी से अपने आगोश में
कभी होगा अब ऐसा कोई जहां नहीं है
ले चलो दूर हमको इस भरी दुनिया से
इसमें अपने लिए एक भी मकां नहीं है
बहुत खोजा एक भी न मिला अक्खड़
होंगे तो हों तुम जैसा एक भी यहां नहीं है

कोई टिप्पणी नहीं: