बुधवार, 2 नवंबर 2016

सपने में आकर एक दिन
कहने लगा यूं रावण
धरती पर आकर फिर से
करना चाहता हूं भ्रमण
मैंने कहा, रावण तुम महान थे
बुद्धि के सागर और गुणों की खान थे
यह बैठे-बिठाए क्या सूझी तुमको
वो दिन कुछ और थे सपनों के सोपान थे
राम का भले ही अनुयायी था
विभीषण फिर भी तुम्हारा भाई था
हित तुम्हारा ही चाहा था
सच्ची राह दिखाई थी
आज के भाई
लंका पर नजर गड़ाएंगे
लक्ष्मण काटें न काटें
खानदान की नाक कटाएंगे
(केंद्रीय विद्यालय, आईटीआई मनकापुर में कक्षा 11 की पढ़ाई के दौरान की गई तुकबंदी अचानक याद आई...पूरी याद नहीं... जिस दिन पुरानी डाय़री मिली इसे पूरा कर दूंगा...)

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