बुधवार, 2 नवंबर 2016

बिहार में मिड-डे मील खाकर हमेशा को सो गए नौनिहालों को समर्पित
तेरे हाथों में सौंपे थे ललन अपने
कैसे कर डाला तुमने सितम इतने
बाद मुद्दत के आती चमक इनमें
देखो सूख गए फूल चमन के कितने
अरमां मिट गए, मिट गए सभी सपने
वे तो भूल गए थे सब धरम जितने
अंगना के बिरवा उजड़ गए क्यों
सबके सब रहनुमा ये किया जिनने
जब भी रोया हूं समझाया मेरे मन ने
चुप होता नहीं क्या लगा तू गुनने
लौट आएगा न तेरी आंखों का नूर
ये करम थे तेरे जो किये तुमने
अब चुभते नहीं दर्द जो दिये रब ने
दिल माने नहीं जो कहा सबने
आंसू सूखे नहीं क्या करूं अब जतन
कैसे कह दूं कि सब हो तुम्हीं फितने
एक दिन आयेगा वह भी करम गिनने
बचकर जायेगा तब तू कहां छिपने
इंसा होगा तो इंसाफ इसी जग में
जब भी पूछा तो बोला यही दिल ने
(रचना खो सी गई थी, आज मिली तो..)
हर शहर में हर बार एक मकां ढूंढ़ता हूं
हमारे गांव में तो कभी ऐसा नहीं होता
वहां हर घर का दरवाजा खुला रहता है
रहने को यहां कोई कमरा नहीं होता
बहुत दिलदार हैं मेरे गांव की गलियां
कोई मोहल्ला वहां उदास नहीं होता
यह शहरों की कैसी रवायत बन गई
कोई भी चेहरा खुशमिजाज नहीं होता
रंग-ओ-बू में लिपटा हुआ इंसा ऐसा
कोई किसी का अपना नहीं होता
याद आता है वह बूढ़ा बरगद अपना
यहां दरख्तों पर कोई परिंदा नहीं होता
मेरी किस्मत मां से दूर भटकता हूं
यहां कोई बोसा लेने वाला नहीं होता
चलो आज तुम्हें सुनाते हैं
जज्बातों की एक कहानी
इसमें न कोई राजा है
और न ही है कोई रानी
मन का बंधन
दिल की धड़कन
सांसों की महक
अहसासों की खनक
इतनी सी है
इसकी रवानी
चलो आज तुम्हें सुनाते हैं
जज्बातों की एक कहानी
इसमें न कोई राजा है
और न ही है कोई रानी
गंगा सी निर्मलता
मासूम एक निश्छलता
गोधूलि की बयार
हारे दिल की पुकार
राधा जैसी वो
केशव की दीवानी
चलो आज तुम्हें सुनाते हैं
जज्बातों की एक कहानी
इसमें न कोई राजा है
और न ही है कोई रानी
सपने में आकर एक दिन
कहने लगा यूं रावण
धरती पर आकर फिर से
करना चाहता हूं भ्रमण
मैंने कहा, रावण तुम महान थे
बुद्धि के सागर और गुणों की खान थे
यह बैठे-बिठाए क्या सूझी तुमको
वो दिन कुछ और थे सपनों के सोपान थे
राम का भले ही अनुयायी था
विभीषण फिर भी तुम्हारा भाई था
हित तुम्हारा ही चाहा था
सच्ची राह दिखाई थी
आज के भाई
लंका पर नजर गड़ाएंगे
लक्ष्मण काटें न काटें
खानदान की नाक कटाएंगे
(केंद्रीय विद्यालय, आईटीआई मनकापुर में कक्षा 11 की पढ़ाई के दौरान की गई तुकबंदी अचानक याद आई...पूरी याद नहीं... जिस दिन पुरानी डाय़री मिली इसे पूरा कर दूंगा...)
वह महज सात साल की है
मां से कहती है
करती क्या हो मेरे लिए
बस इतना ही तो
सुबह स्कूल जाने के लिए
जगा दिया
टिफिन में मेरे पसंद का
खाना रख दिया
जाते-जाते दे दीं
दो-चार नसीहतें
थाली परोस दी
लौटने पर मुंह धुलते
फिर चिंता करने लगीं
मेरे होमवर्क की
लग गईं शाम से
मेरे साथ ही
और भूल गईं अपनी पसंद
का खाना पकाना
फोन पर कह दिया पापा से
तुम खाकर ही घर आना
परीक्षा मेरी थी पर
रात भर तुम सोईं नहीं
जब तक घर न लौटी
प्रार्थना में ही खोई रहीं
तो..तो इसमें क्या
कौन सी मां है जो
यह सब नहीं करती
तु्म ही कैसे हो
उनमें अनूठी
सब सुनकर भी
मां चुप रही
मंद-मंद मुस्काती
आंसू पीती रही
फिर बोली, हां यह सच है
मैं बिल्कुल नहीं हूं अनूठी
अपने बच्चे के लिए इतना ही कर देना
जब तुम मां बनना मेरी बेटी...
(विशाल शुक्ल अक्खड़ 27-10-15)
कभी हमें अपना बनाया तो होता
एक बार सही आजमाया तो होता
आ गए दुनिया के बहकावे में तुम
झूठा ही सही हक जताया तो होता
बहुत दिनों बाद एक बार फिर से....
ख्वाहिशें बहुत हैं मगर आसमां नहीं है
आसाइशें बहुत हैं मगर यहां मां नहीं है
चांद-सितारों तुम क्या जानो क्या कमी है
रोशनी आये जिससे वह रोशनदां नहीं है
गुल खिलते हैं यहां हर घर के गमले में
अम्मां का खिलाया वह गुलिस्तां नहीं है
पतंगा कितना ही तड़पे जान देने को
जल जाए हवा के झोंके से शमां नहीं है
क्या सुनाऊंगा मुनिया को मैं कहानी
ऐसी तो कोई भी अपनी दास्तां नहीं है
चलो जाओ सूरज अब तुम यहां से
छांव दे तुम्हारे तेज से दरख्तां नहीं है
समा ले गर्मजोशी से अपने आगोश में
कभी होगा अब ऐसा कोई जहां नहीं है
ले चलो दूर हमको इस भरी दुनिया से
इसमें अपने लिए एक भी मकां नहीं है
बहुत खोजा एक भी न मिला अक्खड़
होंगे तो हों तुम जैसा एक भी यहां नहीं है
तुमने हमें ठोकर जो मारी न होती
नशीली गजल यह हमारी न होती
अमवा पर बौर खुब आय गयव रे
होली मा बुढ़ऊ बौराय गयव रे
रंग लिहिन मूंछ खिजाब लगाय के
धोती से पैंट मा आय गयव रे
छोड़ दिहिन लाठी देह सिधाय के
कमरियव मा लचक आय गयव रे
सांझ सबेरे कन घुसेड़ू सजाय के
फिल्मी धुन पर रिझाय गयव रे
चल दिहिन ससुरे झोरा उठाय के
रस्ता मा चक्कर खाय गयव रे
गोरी का मेकअप नजर लाय के
बूढ़ा कय गठरी भुलाय गयव रे
चाल ढाल मा बदलाव पाय के
बूढ़व के ताव आय गयव रे
उठाय लिहिन झाड़ू चश्मा लगाय के
बुढ़ऊ का फागुन भुलाय गयव रे
विशाल शुक्ल अक्खड़
बहुत दिनों बाद फिर आईं अम्मां
मकां को घर बनाईं अम्मां
रात पहर जब बीत गई
याद बहुत फिर आईं अम्मां
आओ हम तुम कुछ बात करें
साझा दिल के जज्बात करें
फिर लौट आएं बिसरे दिन
मिलकर ऐसे कुछ हालात करें
हर ओर सन्नाटा पसरा है हर ओर उदासी छायी है
भोर पहर जैसे चेहरों पर रैना घिर-घिर आयी है
पल भर की यह माया है पल भर का ही यह मेला है
आनी-जानी दुनिया में रुत कौन सी ऐसी आयी है
आशा और निराशा में पल-पल डूबूंगा उतराऊंगा
दुख की गंगा में बहकर सुखसागर में मिल जाऊंगा
कहते हैं जो कहते रहें मैं उनकी बातें क्यों मानूं
मां के कदमों में गिरकर फिर बचपन सा खिल जाऊंगा
मैं हंसता हूं
वह हंसती है
मैं रोता हूं
वह रोती है
मैं पिता हूं
वह बेटी है
मैं सेंकता हूं
वह सिंकती है
मैं खाता हूं
वह घुलती है
मैं याचक हूं
वह रोटी है
मैं सजता हूं
वह सजती है
मैं हर्षित हूं
वह मुदित है
मैं आदम हूं
वह धोती है
मैं सिसका हूं
वह सिसकी है
मैं बिलखा हूं
वह बिलखी है
मैं विद्यार्थी हूं
वह सोंटी है
मैं बढ़ता हूं
वह रुकती है
मैं चढ़ता हूं
वह गिरती है
मैं किस्मत हूं
वह खोटी है
-विशाल शुक्ल
‘अक्खड़’
हां मेरे भी दो चेहरे हैं
दुनिया से हंस हंस कर
बातें करना
बिना वजह खुद को
हाजिरजवाब दिखाना
पर असली चेहरे से
केवल तुम वाकिफ हो
है न...
क्योंकि तुम्हारे ही
आंचल में तो ढलके हैं
दुनिया के दिए आंसू
तुम्हारे ही कदमों में
झुका है गलती से
लबरेज यह चेहरा
तुम पर ही तो
उतरा है जमाने
भर का गुस्सा
और यह दुनिया
कहती है
मैं तुम्हारे ही सबसे करीब हूं
मेरा सबसे अच्छा चेहरा
तुम्हारे लिए है...
विशाल शुक्ल अक्खड़
अपने गिरेबां में झांक
ऐ मेरे रहगुजर
साथ चलना है तो चल
ऐ मेरे हमसफर
चाल चलता ही जा तू
रात-ओ-दिन दोपहर
जीत इंसां की होगी
याद रख ले मगर
इल्म तुझको भी है
है तुझे यह खबर
एक झटके में होगा
जहां से बदर
शांति दूत हैं तो
हैं हम जहर
बचके रहना जरा
न रह बेखबर
और नहीं सुन सकता अब कोरी उन हुंकारों को
और नहीं सुन सकता अब सोई उन चीत्कारों को
एक के बदले दस मारो अब 56 इंची सीने वालों
चुन-चुन के उन्हें उद्धारों उन शेरों के हत्यारों को