बुधवार, 10 अगस्त 2016

जरा याद इन्हें भी कर लोः आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही

हम भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ मना रहे हैं, हम स्वाधीनता दिवस मनाने की तैयारी कर रहे हैं। आजादी के दीवानों को कुछ खास मौकों पर याद करने की परंपरा सालों से चली आ रही है। यह हमारा दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि कुछ ऐसा करें, जिससे इन सबकी जरूरत ही न हो और हम पितृ ऋण से भी मुक्त हो सकें। पिछले साल हिन्दी दिवस से पहले तीन दिन हिन्दुस्तान, कानपुर के लिए कानपुर और आस-पास के जिलों के हिन्दी साहित्य के पितृों पर काम करने का अवसर मिला। अगले महीने फिर हिन्दी दिवस है। सो मन किया कि इन पितृों से अगली पीढ़ी को परिचित कराया जाए। सो इनके बारे में उपलब्ध सामग्री अंतरजाल (इंटरनेट) पर डालने का विचार आया। इसी कड़ी में पहली बार आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही के बारे में सूक्ष्म जानकारी।


आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही

हड़हा गांव में स्थापित सनेही जी की प्रतिमा

जन्म: 21 अगस्त 1883
निधन: 20 मई 1972
हड़हा गांव, जिला उन्नाव, उत्तरप्रदेश

आचार्य गया प्रसाद शुक्ल दो उपनामों से लिखते थे, त्रिशूल और सनेही। इन्हें हिन्दी कवि सम्मेलनों का स्थापना करने का श्रेय जाता है।

कुछ प्रमुख कृतियांः प्रेम-पचीसी, गप्पाष्टक, कुसुमांजलि, त्रिशूल तरंग तथा कृषक-क्रन्दन, राष्ट्रीय मन्त्र, संजीवनी, राष्ट्रीय वीणा, कलामे त्रिशूल, करुणा कादम्बिनी।

छह भाषाओं के जानकार, राष्ट्रीय स्तर के रचनाकार और आजादी के बाद गांव के प्रधान, ये विशेषण हैं गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ के। आज का प्रधान होता तो शायद परिवार की वह स्थिति नहीं होती जो है। पर इसका क्या कि कवि हृदय सनेही जी आजादी के दीवानगी समझते थे और उसी दौर में निर्विरोध प्रधान चुने गए। श्रमदान करके अचलगंज से हड़हा तक तीन किलोमीटर कच्चा मार्ग निर्माण कराया। यह मार्ग अब उन्हीं के नाम से प्रचलित है। हड़हा गांव में सनेही स्मारक भी है। उसमें 1994 में पुस्तकालय और वाचनालय बना। 25 अगस्त 2006 को मूर्ति भी स्थापित करवाई गई। पुस्तकालय की किताबों के लिए तीन लाख रुपए आवंटित हुए, पर सारे प्रयास बेकार। अब न तो किताबें हैं और न उनके परिवार का साथ देने वाला कोई। गांव में उनके वंशज नरेन्द्र मोहन शुक्ल रह रहे हैं। परिवार आर्थिक विपन्नताओं से जूझ रहा है। शासन से कोई लाभ नहीं मिला। सनेही जी का पूरा भवन खंडहर हो चुका था, उनके वंशजों ने भूमि बेचकर घर बनवाया। खेती ही परिवार की आजीविका का साधन है। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत का डटकर विरोध किया। कविताओं के माध्यम से युवाओं के अंदर राष्ट्र भक्ति का जज्बा भरने का कार्य किया।  यहां के राघव शरण कहते हैं, हमने उनके साथ खासा समय व्यतीत किया है। सनेही के पास पहुंचने वाली फरियादियों के साथ किए गए न्याय बहुत अच्छे रहते थे।  युवा रंजीत अवस्थी कहते हैं कि कविता में मिली-जुली भाषा के प्रयोग से बहुत कुछ सीखने को मिलता है।  



प्रकाशकों ने कीमत ही नहीं दीः सनेही जी के प्रपौत्र शैलेन्द्र मोहन शुक्ल बताते हैं, सनेही जी की जो पुस्तकें प्रकाशित की गईं, प्रकाशकों ने उनकी कीमती नहीं दी। सनेही साहित्य को आगे बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखने की सोच रहा हूं।  सनेही स्मारक को साहित्यकारों का संग्रहालय बनाना चाहता हूं। सनेही की कविताओं को युवाओं को जरूर पढ़ाना चाहिए। उनसे कई भाषाओं का बेहतर ज्ञान प्राप्त होता है।

सोमवार, 8 अगस्त 2016

सच कहता हूं बात बड़ी है बचपन की यह आस खरी है इंसा बनना इतना मुश्किल कहकर मुझसे रोज लड़ी है शुक्ल अक्खड़

रविवार, 7 अगस्त 2016

सबको खुश करता रहा
खुद में खुद घुलता रहा
अंधेरा घना था बहुत
दीपक सा मैं जलता रहा

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

हां मेरे भी दो चेहरे हैं
दुनिया से हंस हंस कर
बातें करना
बिना वजह खुद को
हाजिरजवाब दिखाना
पर असली चेहरे से
केवल तुम वाकिफ हो
है न...
क्योंकि तुम्हारे ही
आंचल में तो ढलके हैं
दुनिया के दिए आंसू
तुम्हारे ही कदमों में
झुका है 

गलती से लबरेज 
यह चेहरा
तुम पर ही तो
उतरा है 

जमाने भर का 
गुस्सा
और यह दुनिया
कहती है
मैं तुम्हारे ही सबसे करीब हूं
मेरा सबसे अच्छा चेहरा
तुम्हारे लिए है...
विशाल शुक्ल अक्खड़