शनिवार, 30 जुलाई 2016

यह कभी नहीं लिखना चाहा

जाति, धर्म, सांप्रदायिकता, दलित, पिछड़ा, मुस्लिम, अल्पसंख्यक, हिन्दू और ऐसे न जाने कितने शब्द जबसे होश संभाला सुनता-पढ़ता चला आ रहा हूं। कभी नहीं सोचा था कि इन शब्दों को लेकर कभी कुछ लिखूंगा। स्कूल में टिफिन खोलता था तो सारे सहपाठी टूट पड़ते थे अरुई (घुइया) का भरता (भरता क्या था, उबली घुइया, हरी मिर्च, नमक और कड़वा तेल का मिश्रण हुआ करता था) खाने के लिए। मुझे भी बहुत पसंद था और है। रहेगा या नहीं, पता नहीं। हां, तो मैं कह रहा था कि उन सहपाठियों में दलित, मुस्लिम, पिछड़े और पता नहीं कौन-कौन किस-किस जाति का होता था। मैं पारंपरिक ब्राह्मण घर का, पर कोई फर्क कभी पड़ा ही नहीं। विशुद्ध ब्राह्मणवादी यह पढ़कर शायद मुझसे नाराज हो जाएं, दक्षिणपंथी मेरी आलोचना करें, कॉमरेड और धर्मनिरपेक्षता के पुरोधा अपना समर्थक मानने लगें, पर होंगे सब गलत। मियां मैं शुद्ध इनसान बने रहने की कोशिश करता हूं। हद पार न हो जाए तो किसी से ऊंची आवाज में बात करना पसंद नहीं करता। गुटखा खाकर सड़क पर थूकना मुझे पसंद नहीं। सड़क पर कभी घर का कचरा नहीं फेंका। आज मोदीजी जिस शौचालय की बात कर रहे हैं, वह हमारे गांव के घर में बचपन से प्रयोग करता आया हूं। मोटरसाइकिल चलाते समय हर किसी को आगे निकलने देने की बड़ी पुरानी अदा है मेरी, फिर पीछे से हॉर्न भी बजा देता हूं खुशी में। तो कहने का मतलब यह कि पत्रकारिता जैसे पेशे में होने के बावजूद कभी अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं, पसंद, नापसंद या यूं कहें कि अपने आप पर ये सारे शब्द भारी नहीं पड़ने दिए, तब भी नहीं जब पहली बार मतदान किया था और तब भी नहीं जब आखिरी बार केवल इसलिए मतदान के दौरान गांव नहीं गया क्योंकि उस उम्मीदवार को वोट देना पड़ता, जिसे मैं देना नहीं चाहता था। इसलिए दिया भी नहीं। तो बस इतनी बक-बक का मतलब सिर्फ एक सवाल पूछना था -क्या ऐसा नहीं लगता कि चुनाव से पहले ये सारे शब्द बरसाती कुकुरमुत्ते की तरह इधर-उधर उगा दिए जाते हैं....? 

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