शनिवार, 9 अप्रैल 2016

सितम का हद से बढ़ जाना तबाही की निशानी

दंभ तो बड़ा भरते हो तुम कि सच पसंद है, स्पष्टवादी हो। कितने झूठे हो। क्या लगता है तुमको मैं सच कहूंगा, तुम मुझे दबाते रहोगे, मैं सहता रहूंगा और एक दिन बदल जाऊंगा... भ्रम में मत रहो। झुकना तो सीखा ही नहीं। तोड़ पाओगे नहीं। विधाता ने भाग्य दिया ही नहीं। ऐसे में जितना करूंगा उतना ही भरूंगा। मेरा भाग्य विधाता नहीं बन पाओगे। निकलो अपने अहंकार से, पूछो अपने अंतरमन से कि आखिर इसकी गलती क्या है। इसलिए नहीं कह रहा कि मैं डरता हूं या कुछ मांग रहा हूं, इसलिए कि इनसान अच्छे हो। किसी की बातों में आकर कुछ मत करो। अपनी राय खुद बनाओ। मेरा क्या, मैं तो सिर्फ इतना जानता हूं कि सितम का हद से बढ़ जाना तबाही की निशानी है (किसने कहा, पता नहीं।)।

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