रविवार, 10 अप्रैल 2016

अमिष त्रिपाठी के साथ

शायद 2012 के आखिर का महीना था, कानपुर से कोलकाता जाते वक्त सेंट्रल स्टेशन पर बुक स्टॉल वाले से कोई अच्छी किताब दिखाने को कहा। उसने अमिष त्रिपाठी की इमोर्टल्स ऑफ मेलुहा दे दी। अमिष को तब तक मैं जानता भी नहीं था। किताब मेरी जेब के हिसाब से महंगी थी, फिर भी ले ली। कोलकाता पहुंचने तक किताब खत्म हो चुकी थी। कुछ महीने बाद एक बार फिर कोलकाता गया। इस बार वापसी में ओथ ऑफ वायुुपुत्र खत्म की और कुछ ही दिनों में सिक्रेट्स ऑफ नागाज भी हाथ में थी। अब तो काफी दिन हो गए तीनों पुस्तकें पढ़े। हालांकि इक्ष्वाकु वंश पर आधारित एक और पुस्तक आ चुकी है, जिसे खरीदने की आर्थिक ताकत नहीं जुटा पाया, पर उम्मीद है जल्द ही पढ़ूंगा। आज के युवाओं को भारतीयता से परिचित कराने की अमिष की इस कहानी से जिसने प्रेरणा ली, उसका बेड़ा पार। वही अमिष नौ अप्रैल को हिन्दुस्तान कानपुर के ऑफिस में थे। तभी का एक चित्र...

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