शनिवार, 26 मार्च 2016

चलो कुछ लिखते हैं...

लिखना है कुछ, पर क्या...यह पता नहीं। तो बस यूं ही कुछ भी क्यों लिख दें। कोई वजह तो होनी चाहिए कुछ लिखने की। क्या कहा... अरे नहीं बाबा, मैं वह नहीं लिख सकता जो तुम चाहते हो। राजनीति पर मेरी कलम नहीं चलती। उफ, फिर वही...। अरे भाई मैं मोदी समर्थकों को बुरा-भला क्यों कहूं। न-न कांग्रेसियों से भी मेरी अदावत नहीं। नहीं भाई, किसी भी राजनीतिक दल के बारे में कुछ बुरा नहीं लिख सकता, होली के मौके पर भी नहीं। अखलाख और डॉ. नारंग का मुद्दा विशुद्ध कानून-व्यवस्था का मामला है, इसे राजनीति की तराजू पर मैं क्यों तौलूं। हटो जी... कानून को अपना काम करने दो। क्या... छोड़िए न सब जानते हैं कि दंगे क्यों और कैसे होते हैं, वहां मगजमारी का कोई फायदा नहीं। ये सब छोड़िए, बस इतना जान लीजिए कि जब भी लिखूंगा, अपनी लिखूंगा, अपने घर की लिखूंगा, अपने समाज और देश की लिखूंगा। पूरे विश्व की लिखूंगा पर क्या लिखूंगा...सोचते हैं...।

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