गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

फर्ज निभाया, कर्ज बाकी

कहकर गए थे जल्दी लौट आने को
तिरंगे में लिपटे चले आए घर को
जरा भी न सोचा क्या हमारा होगा
सिसकने को छोड़ गए हमें पल-पल को

सैकड़ों सुहाग बचाए गोदें न होने दीं सूनी
कलाइयां दे गए अनगिनत राखियों को
मां भारती के लाल तुम कर्ज चुका गए
अगली बारी फिर भूल न जाना हमको

नन्ही मुनिया सहमा छोटू याद करेंगे
वक्त ने जो हम पर ढाया सितम को
बिटिया की विदाई बेटे के सेहरे का कर्ज
है अभी बाकी कि लौटना होगा तुमको


(उत्तराखण्ड में आई आपदा के दौरान चौबेपुर-कानपुर के रहने वाले जवान नित्यानंद लोगों को बचाते हुए हेलीकॉप्टर क्रैश होने से शहीद हो गए थे। उसी दौरान ये पंक्तियां अनायास कही थीं और हिन्दुस्तान कानपुर ने प्रकाशित भी की थीं। आज अचानक वह पेज मिला तो फिर से...)

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

नोटबंदी 5

आपकी सोच के सब ही कायल हुए
नोट की चोट से सब ही घायल हुए
चल जाए कहीं न सितम वक्त का
तब न कहना सजन वे ही पागल हुए
चूड़ी बोली कंगन से सजन तुम मेरे
सांस मैं हूं तुम्हारी बदन तुम मेरे
संग रहना है नीयति हमारी तुम्हारी
यूं ही देखा है तुमको नयन तुम मेरे

रविवार, 25 दिसंबर 2016

मौत की खबर पर मेरी वह आया है
मैय्यत को मेरी कहां देख पाया है

वो आईना बनकर बैठे हैं मेरी मजार पर
सूरत संवारने का यह कैसा हुनर पाया है


शनिवार, 24 दिसंबर 2016

कैश हुआ अब लेस खीस निपोरो बउआजी
कैशलेस बचा शेष खीस निपोरो बउआजी
खाद-पानी, दाना-सानी सब पर लग गई रोक
बगुला धरो तब वेश खीस निपोरो बउआजी

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

बुक डिपो संजोए है वंशीधर शैदा की यादें

वंशीधर शैदा
जन्म: 20 जुलाई 1904
निधन:15 नवंबर 1988
जन्म स्थान: ग्राम कक्योली तहसील कायमगंज, जनपद फर्रुखाबाद 



फर्रुखाबाद की माटी में जन्मे वंशीधर शैदा की यादें उनके द्वारा स्थापित किया गया बुक डिपो संजोए हुए है। पड़ोसियों ने भले ही शैदा को नहीं देखा मगर वे उनकी शख्शियत के बारे में काफी कुछ जानते हैं। उनका घर अब काफी पुराना और जर्जर हो चुका है। यहीं पर उनके बेटे और परिवार के अन्य सदस्य रहते हैं। हालांकि उनके नाम को और जीवंत रखने के लिए शासन स्तर से कोई गंभीर प्रयास नहीं किए गए। 7 जुलाई 1927 को वंशीधर शैदा ने लोहाई रोड पर शैदा बुक डिपो की स्थापना की थी और यहीं पर रामायण प्रेस भी चलाते थे। उनकी क ई पुस्तकें ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर उनके प्रकाशन पर रोक लगा दी थी। वर्ष 1932 में शैदा के मित्र कृष्णगोपाल चतुर्वेदी ने वाल्मीकि रामायण को तुलसीकृत रामायण की तरह दोहा चौपाइयों में रचने की इच्छा प्रकट की। उसके तुरंत बाद से ही शैदा ने रामायण की रचना प्रारंभ कर दी। शैदा की रचित पुस्तकें देश में ही नहीं बल्कि फिजी, कनाडा, बहरीन, ओमान, आस्ट्रेलिया आदि देशों में पढ़ी जाती थीं। शैदा के बड़े पुत्र ओमप्रकाश सक्सेना कहते हैं, पिताजी का देश प्रेम उनकी रचनाओं में झलकता है। आठ वर्ष की आयु मे ही जब गुरुदेव माधौदास के पास एक महात्मा बाबा मनीरामदास जी गीता पढ़ने आया करते थे तब सुनकर ही वे श्लोकों को कंठस्थ कर लेते थे। लोहाई रोड पर आज भी शैदाजी की यादों को संजोते हुए रामायण प्रेस और बुक डिपो है। मुख्य बाजार में बुक डिपो की अपनी पहचान है। यहां पर ज्यादातर धार्मिक साहित्य मिलता है। साथ ही शैदाजी की संकलित कृतियां भी यहां पर मिलती हैं। अपने गांव नवाबगंज के कक्योली से शैदाजी वर्ष 1927 में फ र्रुखाबाद आए थे। शैदाजी के नाम पर बुक डिपो से उनकी यादें जरूर जुड़ी हैं। मगर उनके नाम पर किसी तरह के पुस्तकालय अथवा अन्य किसी स्थान का नाम नहीं किया गया है।

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

उनके घोटालों ने किया बंटाधार हो
तुमने लाके छोड़ा बीच मंझधार हो
इनकी उनकी सबकी नैया फंसी
अब कौन लगाए इनका बेड़ापार हो 

नोटबंदी 4

तुम जो करते हो करते हो करते रहो
स्वांग नित ही नया यूं ही भरते रहो
सीधे-सीधे बता दो पर हमको सनम
तुम तो मरते थे मरते हो मरते रहो
  

नोटबंदी 3

अब तो एटीएम भी नखरे दिखाने लगी
औकात हमको ही प्रतिपल बताने लगी
ढाई हजार से ज्यादा इजाजत नहीं
ऐसे संदेश दे देकर हमको चिढ़ाने लगी  

नोटबंदी 2

पहले पिंकी से उलझन बढ़ाते गए
फिर नौटंकी से धड़कन बढ़ाते गए
नियम लागू होगा कि नया ये नहीं
साहब हर दिन हमें समझाते गए

नोटबंदी 1

नोट पर चोट पल पल लगाते चले
दिलासा वह हर दिन दिलाते चले
हमको झोंका उन्होंने ही लाइन में है
मन की बातों से चूना लगाते चले

एक ने चुपचाप काट ली जेब हमारी
दूसरा बोल बोल के काट रहा है
कब होगा कैसे होगा विकास पैदा
अक्खड़ अब तक रास्ता ताक रहा है

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

जरा याद इन्हें भी कर लोः बाबू केदारनाथ अग्रवाल

अगस्त में भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ के मौके पर हिन्दुस्तान, कानपुर के लिए कानपुर और आस-पास के जिलों के हिन्दी साहित्य के पितृों पर किए गए काम की श्रृंखला प्रकाशित करने की शुरुआत की। किसी कारणवश यह कई महीने रुका रहा। अब फिर से कोशिश...।


अपनों ने ही मिटा दीं बाबू केदारनाथ अग्रवाल की यादें 


राख की मुर्दा तहों के बहुत नीचे,
नींद की काली गुफाओं के अंधेरे में तिरोहित,
मृत्यु के भुज-बंधनों में चेतनाहत
जो अंगारे खो गए थे,
पूर्वी जन-क्रांति के भूकम्प ने उनको उभारा।
बाबू केदारनाथ अग्रवाल ने 1948 में जब यह कविता लिखी थी तब उन्हें क्या पता था कि पीढि़यां उनकी क्रांतिकारी चेतना को इतनी जल्दी भुला देंगी। भले ही उनके जीवन और उनकी कृतियों पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में सैकड़ों शोध किए गए हैं। उनकी रचनाओं को पढ़ने से मन के तार झंकृत हो जाते हों लेकिन बुन्देलखण्ड के कलम के इस जादूगर की यादों को संजोने वाला बांदा में कोई नहीं है। यहां तक कि जिस स्थान पर बैठकर उन्होंने दर्जनों रचनाएं कीं, उस स्थान को भी बेच दिया गया। अब न तो उनके घर का खंडहर बचा और न ही उनसे जुड़ी कोई याद। इस महान व्यक्तित्व की स्मृति में शासन और प्रशासन की ओर से कोई काम नहीं किया गया। केदारनाथ अग्रवाल की बहू चेन्नई में अपने बच्चों के साथ रहती है। वह पेशे से प्रतिष्ठित अधिवक्ता भी थे। हाल ही में उनकी बहू ने केदारनाथ जी के उस घर को बेच दिया जहां वह रहते थे। उनकी स्मृति में रेलवे के एक अधिकारी ने बांदा स्टेशन पर एक शिलापट्ट लिखवाया है। इसी के सहारे उन्हें याद किया जा सकता है। बांदा के जिस इलाके में केदारनाथ अग्रवाल जी रहते थे, उसे अब डीसीडीएफ कॉलोनी के नाम से जाना जाता है। डीसीडीएफ के अध्यक्ष और केदारनाथ अग्रवाल के समर्थक सुधीर सिंह का कहना है कि सरकार की ओर से इस महान विभूति की यादों को संजोने के लिए कोई पहल नहीं की गई। भले ही इनकी कृतियां देश-विदेश में पढ़ी जाती हैं लेकिन सरकारों की उदासीनता की वजह से आज बांदा का नाम चमकाने वाले केदारनाथ अग्रवाल गुमनामी में चले गए। 

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

नोटबंदी...

बाजार से नोट घटे, मेरे पेज के लाइक... कहीं विरोधियों का हाथ तो नहीं...
तब मैं हर रोज बड़ा होना चाहता था
अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता था
अब हर क्षण हर दिन पछता रहा हूं
बचपन में फिर लौट जाना चाहता हूं
माला से आज एक और मनका टूट गया
बस यह जानो एक और 'मन का' रूठ गया

बुधवार, 2 नवंबर 2016

बिहार में मिड-डे मील खाकर हमेशा को सो गए नौनिहालों को समर्पित
तेरे हाथों में सौंपे थे ललन अपने
कैसे कर डाला तुमने सितम इतने
बाद मुद्दत के आती चमक इनमें
देखो सूख गए फूल चमन के कितने
अरमां मिट गए, मिट गए सभी सपने
वे तो भूल गए थे सब धरम जितने
अंगना के बिरवा उजड़ गए क्यों
सबके सब रहनुमा ये किया जिनने
जब भी रोया हूं समझाया मेरे मन ने
चुप होता नहीं क्या लगा तू गुनने
लौट आएगा न तेरी आंखों का नूर
ये करम थे तेरे जो किये तुमने
अब चुभते नहीं दर्द जो दिये रब ने
दिल माने नहीं जो कहा सबने
आंसू सूखे नहीं क्या करूं अब जतन
कैसे कह दूं कि सब हो तुम्हीं फितने
एक दिन आयेगा वह भी करम गिनने
बचकर जायेगा तब तू कहां छिपने
इंसा होगा तो इंसाफ इसी जग में
जब भी पूछा तो बोला यही दिल ने
(रचना खो सी गई थी, आज मिली तो..)
हर शहर में हर बार एक मकां ढूंढ़ता हूं
हमारे गांव में तो कभी ऐसा नहीं होता
वहां हर घर का दरवाजा खुला रहता है
रहने को यहां कोई कमरा नहीं होता
बहुत दिलदार हैं मेरे गांव की गलियां
कोई मोहल्ला वहां उदास नहीं होता
यह शहरों की कैसी रवायत बन गई
कोई भी चेहरा खुशमिजाज नहीं होता
रंग-ओ-बू में लिपटा हुआ इंसा ऐसा
कोई किसी का अपना नहीं होता
याद आता है वह बूढ़ा बरगद अपना
यहां दरख्तों पर कोई परिंदा नहीं होता
मेरी किस्मत मां से दूर भटकता हूं
यहां कोई बोसा लेने वाला नहीं होता
चलो आज तुम्हें सुनाते हैं
जज्बातों की एक कहानी
इसमें न कोई राजा है
और न ही है कोई रानी
मन का बंधन
दिल की धड़कन
सांसों की महक
अहसासों की खनक
इतनी सी है
इसकी रवानी
चलो आज तुम्हें सुनाते हैं
जज्बातों की एक कहानी
इसमें न कोई राजा है
और न ही है कोई रानी
गंगा सी निर्मलता
मासूम एक निश्छलता
गोधूलि की बयार
हारे दिल की पुकार
राधा जैसी वो
केशव की दीवानी
चलो आज तुम्हें सुनाते हैं
जज्बातों की एक कहानी
इसमें न कोई राजा है
और न ही है कोई रानी
सपने में आकर एक दिन
कहने लगा यूं रावण
धरती पर आकर फिर से
करना चाहता हूं भ्रमण
मैंने कहा, रावण तुम महान थे
बुद्धि के सागर और गुणों की खान थे
यह बैठे-बिठाए क्या सूझी तुमको
वो दिन कुछ और थे सपनों के सोपान थे
राम का भले ही अनुयायी था
विभीषण फिर भी तुम्हारा भाई था
हित तुम्हारा ही चाहा था
सच्ची राह दिखाई थी
आज के भाई
लंका पर नजर गड़ाएंगे
लक्ष्मण काटें न काटें
खानदान की नाक कटाएंगे
(केंद्रीय विद्यालय, आईटीआई मनकापुर में कक्षा 11 की पढ़ाई के दौरान की गई तुकबंदी अचानक याद आई...पूरी याद नहीं... जिस दिन पुरानी डाय़री मिली इसे पूरा कर दूंगा...)
वह महज सात साल की है
मां से कहती है
करती क्या हो मेरे लिए
बस इतना ही तो
सुबह स्कूल जाने के लिए
जगा दिया
टिफिन में मेरे पसंद का
खाना रख दिया
जाते-जाते दे दीं
दो-चार नसीहतें
थाली परोस दी
लौटने पर मुंह धुलते
फिर चिंता करने लगीं
मेरे होमवर्क की
लग गईं शाम से
मेरे साथ ही
और भूल गईं अपनी पसंद
का खाना पकाना
फोन पर कह दिया पापा से
तुम खाकर ही घर आना
परीक्षा मेरी थी पर
रात भर तुम सोईं नहीं
जब तक घर न लौटी
प्रार्थना में ही खोई रहीं
तो..तो इसमें क्या
कौन सी मां है जो
यह सब नहीं करती
तु्म ही कैसे हो
उनमें अनूठी
सब सुनकर भी
मां चुप रही
मंद-मंद मुस्काती
आंसू पीती रही
फिर बोली, हां यह सच है
मैं बिल्कुल नहीं हूं अनूठी
अपने बच्चे के लिए इतना ही कर देना
जब तुम मां बनना मेरी बेटी...
(विशाल शुक्ल अक्खड़ 27-10-15)
कभी हमें अपना बनाया तो होता
एक बार सही आजमाया तो होता
आ गए दुनिया के बहकावे में तुम
झूठा ही सही हक जताया तो होता
बहुत दिनों बाद एक बार फिर से....
ख्वाहिशें बहुत हैं मगर आसमां नहीं है
आसाइशें बहुत हैं मगर यहां मां नहीं है
चांद-सितारों तुम क्या जानो क्या कमी है
रोशनी आये जिससे वह रोशनदां नहीं है
गुल खिलते हैं यहां हर घर के गमले में
अम्मां का खिलाया वह गुलिस्तां नहीं है
पतंगा कितना ही तड़पे जान देने को
जल जाए हवा के झोंके से शमां नहीं है
क्या सुनाऊंगा मुनिया को मैं कहानी
ऐसी तो कोई भी अपनी दास्तां नहीं है
चलो जाओ सूरज अब तुम यहां से
छांव दे तुम्हारे तेज से दरख्तां नहीं है
समा ले गर्मजोशी से अपने आगोश में
कभी होगा अब ऐसा कोई जहां नहीं है
ले चलो दूर हमको इस भरी दुनिया से
इसमें अपने लिए एक भी मकां नहीं है
बहुत खोजा एक भी न मिला अक्खड़
होंगे तो हों तुम जैसा एक भी यहां नहीं है
तुमने हमें ठोकर जो मारी न होती
नशीली गजल यह हमारी न होती
अमवा पर बौर खुब आय गयव रे
होली मा बुढ़ऊ बौराय गयव रे
रंग लिहिन मूंछ खिजाब लगाय के
धोती से पैंट मा आय गयव रे
छोड़ दिहिन लाठी देह सिधाय के
कमरियव मा लचक आय गयव रे
सांझ सबेरे कन घुसेड़ू सजाय के
फिल्मी धुन पर रिझाय गयव रे
चल दिहिन ससुरे झोरा उठाय के
रस्ता मा चक्कर खाय गयव रे
गोरी का मेकअप नजर लाय के
बूढ़ा कय गठरी भुलाय गयव रे
चाल ढाल मा बदलाव पाय के
बूढ़व के ताव आय गयव रे
उठाय लिहिन झाड़ू चश्मा लगाय के
बुढ़ऊ का फागुन भुलाय गयव रे
विशाल शुक्ल अक्खड़
बहुत दिनों बाद फिर आईं अम्मां
मकां को घर बनाईं अम्मां
रात पहर जब बीत गई
याद बहुत फिर आईं अम्मां
आओ हम तुम कुछ बात करें
साझा दिल के जज्बात करें
फिर लौट आएं बिसरे दिन
मिलकर ऐसे कुछ हालात करें
हर ओर सन्नाटा पसरा है हर ओर उदासी छायी है
भोर पहर जैसे चेहरों पर रैना घिर-घिर आयी है
पल भर की यह माया है पल भर का ही यह मेला है
आनी-जानी दुनिया में रुत कौन सी ऐसी आयी है
आशा और निराशा में पल-पल डूबूंगा उतराऊंगा
दुख की गंगा में बहकर सुखसागर में मिल जाऊंगा
कहते हैं जो कहते रहें मैं उनकी बातें क्यों मानूं
मां के कदमों में गिरकर फिर बचपन सा खिल जाऊंगा
मैं हंसता हूं
वह हंसती है
मैं रोता हूं
वह रोती है
मैं पिता हूं
वह बेटी है
मैं सेंकता हूं
वह सिंकती है
मैं खाता हूं
वह घुलती है
मैं याचक हूं
वह रोटी है
मैं सजता हूं
वह सजती है
मैं हर्षित हूं
वह मुदित है
मैं आदम हूं
वह धोती है
मैं सिसका हूं
वह सिसकी है
मैं बिलखा हूं
वह बिलखी है
मैं विद्यार्थी हूं
वह सोंटी है
मैं बढ़ता हूं
वह रुकती है
मैं चढ़ता हूं
वह गिरती है
मैं किस्मत हूं
वह खोटी है
-विशाल शुक्ल
‘अक्खड़’
हां मेरे भी दो चेहरे हैं
दुनिया से हंस हंस कर
बातें करना
बिना वजह खुद को
हाजिरजवाब दिखाना
पर असली चेहरे से
केवल तुम वाकिफ हो
है न...
क्योंकि तुम्हारे ही
आंचल में तो ढलके हैं
दुनिया के दिए आंसू
तुम्हारे ही कदमों में
झुका है गलती से
लबरेज यह चेहरा
तुम पर ही तो
उतरा है जमाने
भर का गुस्सा
और यह दुनिया
कहती है
मैं तुम्हारे ही सबसे करीब हूं
मेरा सबसे अच्छा चेहरा
तुम्हारे लिए है...
विशाल शुक्ल अक्खड़
अपने गिरेबां में झांक
ऐ मेरे रहगुजर
साथ चलना है तो चल
ऐ मेरे हमसफर
चाल चलता ही जा तू
रात-ओ-दिन दोपहर
जीत इंसां की होगी
याद रख ले मगर
इल्म तुझको भी है
है तुझे यह खबर
एक झटके में होगा
जहां से बदर
शांति दूत हैं तो
हैं हम जहर
बचके रहना जरा
न रह बेखबर
और नहीं सुन सकता अब कोरी उन हुंकारों को
और नहीं सुन सकता अब सोई उन चीत्कारों को
एक के बदले दस मारो अब 56 इंची सीने वालों
चुन-चुन के उन्हें उद्धारों उन शेरों के हत्यारों को

बुधवार, 10 अगस्त 2016

जरा याद इन्हें भी कर लोः आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही

हम भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ मना रहे हैं, हम स्वाधीनता दिवस मनाने की तैयारी कर रहे हैं। आजादी के दीवानों को कुछ खास मौकों पर याद करने की परंपरा सालों से चली आ रही है। यह हमारा दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि कुछ ऐसा करें, जिससे इन सबकी जरूरत ही न हो और हम पितृ ऋण से भी मुक्त हो सकें। पिछले साल हिन्दी दिवस से पहले तीन दिन हिन्दुस्तान, कानपुर के लिए कानपुर और आस-पास के जिलों के हिन्दी साहित्य के पितृों पर काम करने का अवसर मिला। अगले महीने फिर हिन्दी दिवस है। सो मन किया कि इन पितृों से अगली पीढ़ी को परिचित कराया जाए। सो इनके बारे में उपलब्ध सामग्री अंतरजाल (इंटरनेट) पर डालने का विचार आया। इसी कड़ी में पहली बार आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही के बारे में सूक्ष्म जानकारी।


आचार्य गया प्रसाद शुक्ल सनेही

हड़हा गांव में स्थापित सनेही जी की प्रतिमा

जन्म: 21 अगस्त 1883
निधन: 20 मई 1972
हड़हा गांव, जिला उन्नाव, उत्तरप्रदेश

आचार्य गया प्रसाद शुक्ल दो उपनामों से लिखते थे, त्रिशूल और सनेही। इन्हें हिन्दी कवि सम्मेलनों का स्थापना करने का श्रेय जाता है।

कुछ प्रमुख कृतियांः प्रेम-पचीसी, गप्पाष्टक, कुसुमांजलि, त्रिशूल तरंग तथा कृषक-क्रन्दन, राष्ट्रीय मन्त्र, संजीवनी, राष्ट्रीय वीणा, कलामे त्रिशूल, करुणा कादम्बिनी।

छह भाषाओं के जानकार, राष्ट्रीय स्तर के रचनाकार और आजादी के बाद गांव के प्रधान, ये विशेषण हैं गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ के। आज का प्रधान होता तो शायद परिवार की वह स्थिति नहीं होती जो है। पर इसका क्या कि कवि हृदय सनेही जी आजादी के दीवानगी समझते थे और उसी दौर में निर्विरोध प्रधान चुने गए। श्रमदान करके अचलगंज से हड़हा तक तीन किलोमीटर कच्चा मार्ग निर्माण कराया। यह मार्ग अब उन्हीं के नाम से प्रचलित है। हड़हा गांव में सनेही स्मारक भी है। उसमें 1994 में पुस्तकालय और वाचनालय बना। 25 अगस्त 2006 को मूर्ति भी स्थापित करवाई गई। पुस्तकालय की किताबों के लिए तीन लाख रुपए आवंटित हुए, पर सारे प्रयास बेकार। अब न तो किताबें हैं और न उनके परिवार का साथ देने वाला कोई। गांव में उनके वंशज नरेन्द्र मोहन शुक्ल रह रहे हैं। परिवार आर्थिक विपन्नताओं से जूझ रहा है। शासन से कोई लाभ नहीं मिला। सनेही जी का पूरा भवन खंडहर हो चुका था, उनके वंशजों ने भूमि बेचकर घर बनवाया। खेती ही परिवार की आजीविका का साधन है। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत का डटकर विरोध किया। कविताओं के माध्यम से युवाओं के अंदर राष्ट्र भक्ति का जज्बा भरने का कार्य किया।  यहां के राघव शरण कहते हैं, हमने उनके साथ खासा समय व्यतीत किया है। सनेही के पास पहुंचने वाली फरियादियों के साथ किए गए न्याय बहुत अच्छे रहते थे।  युवा रंजीत अवस्थी कहते हैं कि कविता में मिली-जुली भाषा के प्रयोग से बहुत कुछ सीखने को मिलता है।  



प्रकाशकों ने कीमत ही नहीं दीः सनेही जी के प्रपौत्र शैलेन्द्र मोहन शुक्ल बताते हैं, सनेही जी की जो पुस्तकें प्रकाशित की गईं, प्रकाशकों ने उनकी कीमती नहीं दी। सनेही साहित्य को आगे बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखने की सोच रहा हूं।  सनेही स्मारक को साहित्यकारों का संग्रहालय बनाना चाहता हूं। सनेही की कविताओं को युवाओं को जरूर पढ़ाना चाहिए। उनसे कई भाषाओं का बेहतर ज्ञान प्राप्त होता है।

सोमवार, 8 अगस्त 2016

सच कहता हूं बात बड़ी है बचपन की यह आस खरी है इंसा बनना इतना मुश्किल कहकर मुझसे रोज लड़ी है शुक्ल अक्खड़

रविवार, 7 अगस्त 2016

सबको खुश करता रहा
खुद में खुद घुलता रहा
अंधेरा घना था बहुत
दीपक सा मैं जलता रहा

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

हां मेरे भी दो चेहरे हैं
दुनिया से हंस हंस कर
बातें करना
बिना वजह खुद को
हाजिरजवाब दिखाना
पर असली चेहरे से
केवल तुम वाकिफ हो
है न...
क्योंकि तुम्हारे ही
आंचल में तो ढलके हैं
दुनिया के दिए आंसू
तुम्हारे ही कदमों में
झुका है 

गलती से लबरेज 
यह चेहरा
तुम पर ही तो
उतरा है 

जमाने भर का 
गुस्सा
और यह दुनिया
कहती है
मैं तुम्हारे ही सबसे करीब हूं
मेरा सबसे अच्छा चेहरा
तुम्हारे लिए है...
विशाल शुक्ल अक्खड़

शनिवार, 30 जुलाई 2016

मैं हंसता हूं
वह हंसती है
मैं रोता हूं
वह रोती है
मैं पिता हूं
वह बेटी है
मैं सेंकता हूं
वह सिंकती है
मैं खाता हूं
वह घुलती है
मैं याचक हूं
वह रोटी है
मैं सजता हूं
वह सजती है
मैं हर्षित हूं
वह मुदित है
मैं आदम हूं
वह धोती है
मैं सिसका हूं
वह सिसकी है
मैं बिलखा हूं
वह बिलखी है
मैं विद्यार्थी हूं
वह सोंटी है
मैं बढ़ता हूं
वह रुकती है
मैं चढ़ता हूं
वह गिरती है
मैं किस्मत हूं
जो खोटी है
-विशाल शुक्ल
‘अक्खड़’
वो कमजर्फ निगहबां को भूल जाते हैं
कमबख्त कैसे बागबां को भूल जाते हैं
बचकर रहना इन बेमौसमी बादलों से
खुदगर्जी में आसमां को भूल जाते हैं

यह कभी नहीं लिखना चाहा

जाति, धर्म, सांप्रदायिकता, दलित, पिछड़ा, मुस्लिम, अल्पसंख्यक, हिन्दू और ऐसे न जाने कितने शब्द जबसे होश संभाला सुनता-पढ़ता चला आ रहा हूं। कभी नहीं सोचा था कि इन शब्दों को लेकर कभी कुछ लिखूंगा। स्कूल में टिफिन खोलता था तो सारे सहपाठी टूट पड़ते थे अरुई (घुइया) का भरता (भरता क्या था, उबली घुइया, हरी मिर्च, नमक और कड़वा तेल का मिश्रण हुआ करता था) खाने के लिए। मुझे भी बहुत पसंद था और है। रहेगा या नहीं, पता नहीं। हां, तो मैं कह रहा था कि उन सहपाठियों में दलित, मुस्लिम, पिछड़े और पता नहीं कौन-कौन किस-किस जाति का होता था। मैं पारंपरिक ब्राह्मण घर का, पर कोई फर्क कभी पड़ा ही नहीं। विशुद्ध ब्राह्मणवादी यह पढ़कर शायद मुझसे नाराज हो जाएं, दक्षिणपंथी मेरी आलोचना करें, कॉमरेड और धर्मनिरपेक्षता के पुरोधा अपना समर्थक मानने लगें, पर होंगे सब गलत। मियां मैं शुद्ध इनसान बने रहने की कोशिश करता हूं। हद पार न हो जाए तो किसी से ऊंची आवाज में बात करना पसंद नहीं करता। गुटखा खाकर सड़क पर थूकना मुझे पसंद नहीं। सड़क पर कभी घर का कचरा नहीं फेंका। आज मोदीजी जिस शौचालय की बात कर रहे हैं, वह हमारे गांव के घर में बचपन से प्रयोग करता आया हूं। मोटरसाइकिल चलाते समय हर किसी को आगे निकलने देने की बड़ी पुरानी अदा है मेरी, फिर पीछे से हॉर्न भी बजा देता हूं खुशी में। तो कहने का मतलब यह कि पत्रकारिता जैसे पेशे में होने के बावजूद कभी अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं, पसंद, नापसंद या यूं कहें कि अपने आप पर ये सारे शब्द भारी नहीं पड़ने दिए, तब भी नहीं जब पहली बार मतदान किया था और तब भी नहीं जब आखिरी बार केवल इसलिए मतदान के दौरान गांव नहीं गया क्योंकि उस उम्मीदवार को वोट देना पड़ता, जिसे मैं देना नहीं चाहता था। इसलिए दिया भी नहीं। तो बस इतनी बक-बक का मतलब सिर्फ एक सवाल पूछना था -क्या ऐसा नहीं लगता कि चुनाव से पहले ये सारे शब्द बरसाती कुकुरमुत्ते की तरह इधर-उधर उगा दिए जाते हैं....? 

बुधवार, 22 जून 2016

आशा और निराशा में पल-पल डूबूंगा उतराऊंगा
दुख की गंगा में बहकर सुखसागर में मिल जाऊंगा
कहते हैं जो कहते रहें मैं उनकी बातें क्यों मानूं
मां के कदमों में गिरकर फिर बचपन सा खिल जाऊंगा

सोमवार, 23 मई 2016

याद बहुत फिर आईं अम्मां

बहुत दिनों बाद फिर आईं अम्मां
मकां को घर बनाईं अम्मां
रात पहर जब बीत गई
याद बहुत फिर आईं अम्मां

शनिवार, 7 मई 2016

मां तुझे सलाम

मां ने बड़े जतन से गांव से भेजा है
डिब्बे में घी का कुछ कतरा अब भी है
जानता हूं वह मेरी मां है, सब जानती है
याद मेरे दूध न पीने का नखरा अब भी है
साथ भेज दी हैं भुनी हुई मूंगफलियां भी
मेरी सेहत पर लगता उसे खतरा अब भी है

रविवार, 10 अप्रैल 2016

अमिष त्रिपाठी के साथ

शायद 2012 के आखिर का महीना था, कानपुर से कोलकाता जाते वक्त सेंट्रल स्टेशन पर बुक स्टॉल वाले से कोई अच्छी किताब दिखाने को कहा। उसने अमिष त्रिपाठी की इमोर्टल्स ऑफ मेलुहा दे दी। अमिष को तब तक मैं जानता भी नहीं था। किताब मेरी जेब के हिसाब से महंगी थी, फिर भी ले ली। कोलकाता पहुंचने तक किताब खत्म हो चुकी थी। कुछ महीने बाद एक बार फिर कोलकाता गया। इस बार वापसी में ओथ ऑफ वायुुपुत्र खत्म की और कुछ ही दिनों में सिक्रेट्स ऑफ नागाज भी हाथ में थी। अब तो काफी दिन हो गए तीनों पुस्तकें पढ़े। हालांकि इक्ष्वाकु वंश पर आधारित एक और पुस्तक आ चुकी है, जिसे खरीदने की आर्थिक ताकत नहीं जुटा पाया, पर उम्मीद है जल्द ही पढ़ूंगा। आज के युवाओं को भारतीयता से परिचित कराने की अमिष की इस कहानी से जिसने प्रेरणा ली, उसका बेड़ा पार। वही अमिष नौ अप्रैल को हिन्दुस्तान कानपुर के ऑफिस में थे। तभी का एक चित्र...

कुछ दिल की: सितम का हद से बढ़ जाना तबाही की निशानी

कुछ दिल की: सितम का हद से बढ़ जाना तबाही की निशानी

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

सितम का हद से बढ़ जाना तबाही की निशानी

दंभ तो बड़ा भरते हो तुम कि सच पसंद है, स्पष्टवादी हो। कितने झूठे हो। क्या लगता है तुमको मैं सच कहूंगा, तुम मुझे दबाते रहोगे, मैं सहता रहूंगा और एक दिन बदल जाऊंगा... भ्रम में मत रहो। झुकना तो सीखा ही नहीं। तोड़ पाओगे नहीं। विधाता ने भाग्य दिया ही नहीं। ऐसे में जितना करूंगा उतना ही भरूंगा। मेरा भाग्य विधाता नहीं बन पाओगे। निकलो अपने अहंकार से, पूछो अपने अंतरमन से कि आखिर इसकी गलती क्या है। इसलिए नहीं कह रहा कि मैं डरता हूं या कुछ मांग रहा हूं, इसलिए कि इनसान अच्छे हो। किसी की बातों में आकर कुछ मत करो। अपनी राय खुद बनाओ। मेरा क्या, मैं तो सिर्फ इतना जानता हूं कि सितम का हद से बढ़ जाना तबाही की निशानी है (किसने कहा, पता नहीं।)।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

वाह पानी, आह पानी

कभी सोचा भी नहीं था कि पानी को लेकर इतना हल्ला मचेगा। गांव में पैदा हुआ तो चहुंओर पानी ही पानी था। 11-12 ऐसे तालाब थे जिनमें ऊपर-नीच खड़े करने पर कम से कम तीन हाथी डूब जाएं। और ये (अब वे कहना ज्यादा ठीक होगा) तालाब वर्ष भर लबालब रहते थे। बारिश में तो गांव की गलियों और लोगों के दरवाजे पर इनका पानी भरा रहता था। छोटे ताल-तलैया की गिनती ही नहीं थी। न कभी जानवर प्यासे रहते और न इंसान। आज जब दफ्तर में चर्चा करता हूं तो कई साथी मानने को ही तैयार नहीं होते कि कभी हमारे गांव में 10-12 फुट नीचे साफ पानी मिल जाता था। तब कई सारी दिक्कतें थीं, पर पानी की नहीं। सड़क नहीं थी, पानी की टंकी नहीं थी, बिजली नहीं थी, पर पानी था और भरपूर था। अब और सब है, साथ में पानी की किल्लत भी। 40-50 फुट नीचे पानी है, पर पीने लायक नहीं। सिंचाई के लिए की गई 100-150 फुट गहरी बोरिंग भी फेल हो रही है, क्योंकि एक सीमित दायरे में 10-10 पम्पिंग सेट लगे हैं। तब एक-आध होते थे। कई लोग तो बड़का तालाब से ही अपने खेत सींच लेते थे। (बड़का तालाबः इतना बड़ा तालाब था गांव के बाहर कि बारिश में पानी उफनाने पर तीन-चार गांव समाने की नौबत आ जाती थी, इस पानी को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने तालाब से नदी तक नाला खुदवाया, पर आज  इसकी जरूरत ही नहीं, क्योंकि तालाब सिमटकर तलैया हो गया और पानी के नाम पर बारिश में सिर्फ थोड़ा कीचड़ दिखता है )। गांव के सारे तालाब या तो पक्के घरों में तब्दील हो गए हैं या फिर होने के कगार पर हैं। ताल-तलैया में टर्र-टर्र करते मेंढकों की धुन सुनना अब सिर्फ सपना है। बारिश में निकलने वाले पीले-धानी मेंढक पकड़ने के बारे में बताने पर भी बिटिया मानने को तैयार नहीं होती कि ऐसा होता रहा होगा। बिना जहर वाले पानी वाले पतले-छोटे सांप पकड़कर जेब में रख लेते थे और डरपोक लोगों को और डराते थे। अब वह रोमांच कहां से लाऊं, हे पानी दूसरा भगीरथ कहां से लाऊं...।

शनिवार, 26 मार्च 2016

चलो कुछ लिखते हैं...

लिखना है कुछ, पर क्या...यह पता नहीं। तो बस यूं ही कुछ भी क्यों लिख दें। कोई वजह तो होनी चाहिए कुछ लिखने की। क्या कहा... अरे नहीं बाबा, मैं वह नहीं लिख सकता जो तुम चाहते हो। राजनीति पर मेरी कलम नहीं चलती। उफ, फिर वही...। अरे भाई मैं मोदी समर्थकों को बुरा-भला क्यों कहूं। न-न कांग्रेसियों से भी मेरी अदावत नहीं। नहीं भाई, किसी भी राजनीतिक दल के बारे में कुछ बुरा नहीं लिख सकता, होली के मौके पर भी नहीं। अखलाख और डॉ. नारंग का मुद्दा विशुद्ध कानून-व्यवस्था का मामला है, इसे राजनीति की तराजू पर मैं क्यों तौलूं। हटो जी... कानून को अपना काम करने दो। क्या... छोड़िए न सब जानते हैं कि दंगे क्यों और कैसे होते हैं, वहां मगजमारी का कोई फायदा नहीं। ये सब छोड़िए, बस इतना जान लीजिए कि जब भी लिखूंगा, अपनी लिखूंगा, अपने घर की लिखूंगा, अपने समाज और देश की लिखूंगा। पूरे विश्व की लिखूंगा पर क्या लिखूंगा...सोचते हैं...।

मंगलवार, 22 मार्च 2016

अमवा पर बौर खुब आय गयव रे


अमवा पर बौर खुब आय गयव रे
होली मा बुढ़ऊ बौराय गयव रे

रंग लिहिन मूंछ खिजाब लगाय के
धोती से पैंट मा आय गयव रे

छोड़ दिहिन लाठी देह सिधाय के
कमरियव मा लचक आय गयव रे

सांझ सबेरे कन घुसेड़ू सजाय के
फिल्मी धुन पर रिझाय गयव रे

चल दिहिन ससुरे झोरा उठाय के
रस्ता मा चक्कर खाय गयव रे

गोरी का मेकअप नजर लाय के
बूढ़ा कय गठरी भुलाय गयव रे

चाल ढाल मा बदलाव पाय के
बूढ़व के ताव आय गयव रे

उठाय लिहिन झाड़ू चश्मा लगाय के
बुढ़ऊ का फागुन भुलाय गयव रे
विशाल शुक्ल अक्खड़

शनिवार, 19 मार्च 2016

https://www.youtube.com/watch?v=9IjWKZTd6bk

जा पोटली झाड़, पुरस्कार छांट और मीडिया को बुला...

(26 अक्तूबर 2015 को हिन्दुस्तान कानपुर के जमूरे जी कहिन कॉलम में प्रकाशित)

का रे जमूरे! तनिक पोटलिया तो खंगाल...।
कौन सी हुजूर? प... वाली की द... वाली?
का बताएं हम तुहंय...बकलोल कय बकलोल रहिगेव। द अक्षर हम सीखेन हैं का...? प वाली...और उहव सरकारी प वाली..., जेम्मा सब सरकारी प हों। देख कउनव प है जौने का ल किया जाय...?
हुजूर, अब यह ल... क्या है? प माने अब तक मिले पुरस्कार। द का मतलब देने से है। ई ल क्या है?
अरे जमूरे... ल माने लौटावय वाले पुरस्कार। देख कउनव पुरस्कार झाड़-पोंछ कय लौटावा जाय सकत है का? सब पड़े-पड़े सड़त हैं। जवन सबसे पुराना होय गा हो, वहका निकाल, साफ कर...मीडिया का बुला। दुनिया का पता तव चलय कि हम्मय पुरस्कार मिला रहा। कउनव यादय नाही राखत कि हमहूं का पुरस्कार मिला रहा। यही आंधी मा गांधी बन जाव बच्चा।
अच्छा, तो आप भी सांप्रदायिक हवा के खिलाफ हैं हुजूर। पहले तो कभी जिक्र नहीं किए। इतने दिन से मैं आपके साथ हूं, पर कभी लगा ही नहीं कि धर्म-सांप्रदायिकता जैसे शब्द आपके लिए कोई मतलब रखते हैं। जिससे मिले हंसकर मिले। फिर अचानक आपको भी माहौल में सांप्रदायिकता की बू कैसे आने लगी?
धत्त जमूरे...। हम तो अबहूं मुतमइन हूं कि हमारे देश का ई सब छोटी-मोटी घटना से कउनव फरक नाही पड़ी। हम तो मौका देख रहेन। हवा बही है, तो साथ-साथ फायदा लूट लियव आउर कुछ नाही।
अब देखव जमूरे...। इतना लोगन का साहित्य अकादमी मिला, पर केहू का याद नाही रहा। धड़ाधड़ सब लौटावय शुरू किहिन तव पूरी-पूरी लिस्ट अखबारन मा छपय लाग। चैनल वाले धड़ाधड़ मुंह मा माइक घुसेड़ रहे। जेतना पब्लिसिटी तब नाही मिली रही जब पुरस्कार मिला रहा, वोहसे जादा तव अब मिलत है। फिर हींग लगे न फिटकिरी रंग चोखा आ ही जाई, पुरस्कार के साथ मिला पइसवा थोड़य न लौटाइब हम। अब जादा बकर-बकर न कर... जा पोटली झाड़, पुरस्कार छांट और मीडिया का बुला। तब तक हम तनी तानकर सो लें...।
-विशाल शुक्ल ‘अक्खड़’ 

उतरा है समाजवाद विधायक निवास में...

(29 जून 2015 को हिन्दुस्तान कानपुर में जमूरे जी कहिन कॉलम में प्रकाशित)

सुनो...सुनो...सुनो
देश की सुनो...परदेस की सुनो
इनकी सुनो...उनकी सुनो
सब सुनाने आया है जमूरा...।

का रे जमूरे!
जी, हुजूर।
ई सब का हो रहा समाजवाद मा?
अरे हुजूर! समाजवाद मा तौ सब चकाचक हय। बच्चा लोग अब आउर समय से पहिले बड़ा होय रहा हैं। लैपटाप मिलत है, टैबलेट कय लालीपाप भी थमाय दीन गा है। बिजुली आवय चाहे नाही, लैपटपवा चार्ज करावय बाजार पहुंच जात हैं, फिलमी गाना सुनत हैं औ पता नाही काव खिटिर-पिटिर करत हैं कि देश-दुनिया कै खबर बताय दियत हैं। कहत हैं कउनव गूग्गल महाराज हैं वम्मा जे सबकुछ जानत हैं। आउर तौ आउर तमाम जन कां पिंसिन मिलति है। छोटके बच्चन का तौ स्कुलवा मा दूधव दीन जाय लाग है। आउर का चाही हुजूर।
जमूरे!
तोहरे दिमाग मा तौ भूसा भरा है।
अरे नाही हुजूर...कहूं अदम गोण्डवी वाले समाजवाद कय चर्चा तव नाही करत हव...उनकय तव अलगय राग रहा। कहत रहे,
काजू भुनी प्लेट में, व्हिस्की गिलास में
उतरा

है समाजवाद विधायक निवास में
धत्त जमूरे...ई तौ बहुत पुरान बात है। हम आज कय बात करित है...अरे, कुछ आगे कय सोचव... देश-दुनिया कय नाही तौ कम से कम अपने प्रदेस कय तौ खबर राखा करौ। देखव ई समाजवाद मा का होत है। कहत हैं कि मीडिया लोकतंत्र कय चौथा पावा है... यक-यक कय यहिका उखारय मा लाग हैं सब। ऊ कउनव मंत्री जी हैं भइया... सब कहत हैं कि पत्रकरवा का जरवावय मा वही कय हाथ रहा... तू हव कि कुछ समझतय-बूझत नाही। असली समाजवाद तौ इहै है... कुछ न देखव, कुछ न सुनव, कुछ न बोलव। जवन होत है सब बढि़या... जब समाजवादय आय गा है तौ आउर कौनौ बुराई भला कसत रहि सकत है... ऊ पत्रकारवा पता नाही कहां से बुराई खोज लावा रहा...। अब भला समाजवाद औ बुराई कय कौनौ संबंधय नाही तव फिर ऊ जरावा गवा हुवय इहव नाही होय सकत। ई सब समाजवाद का बदनाम करय के खातिर झूठय फैलाय दीन गा है..., समझे...।
जी, हुजूर...।
-विशाल शुक्ल अक्खड़ 

अथश्री चहचहाहट कथा...यह कथा है इनकी, उनकी, सबकी...

(06 जुलाई 2015 को हिन्दुस्तान कानपुर में प्रकाशित)
चीं चीं...चीं चीं
चीं चीं...चीं चीं
अरे हुजूर!
यह क्या हाल बना रखा है, चहचहा क्यों रहे हैं? अच्छे-खासे इनसान हैं, चिडि़या बने क्यों घूम रहे हैं?
उफ जमूरे! रह गए जमूरे के जमूरे ही।
इस चहचहाहट में बड़े-बड़े गुण। निर्गुण, सगुण, दुर्गुण...सारे गुण इसमें समाए हैं। जब भी लगे कि आसमां में तुम्हारे नाम का चांद डूबने लगा है, दन्न से एक बार चहचहा दो...। जैसे बीट करने से पहले पक्षी नहीं देखते कि गंदगी किस पर गिरेगी, वैसी ही इनसान की चहचहाहट होनी चाहिए। इसके बड़े फायदे हैं।
कौन दुनिया की बात कर रहे हुजूर! हमारे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा...?
यही तो खास बात है इस चहचहाहट में जमूरे। किसी के कुछ समझ में नहीं आता। चहचहाने वाला चहचहा देता है और लोग जूझ मरते हैं। और तो और जो लोग बयान बहादुर बनकर इस चहचहाहट पर ताल ठोंकते हैं उनके भी समझ में नहीं आता कि आखिर किस बात पर कट-मर रहे हैं। उस बात का कोई मतलब है भी कि नहीं। वह बात किसके खिलाफ जा रही है।
हुजूर! कुछ पल्ले पड़े उसके पहले यह बताइए कि यह चहचहाहट है किस बला का नाम?
तो सुनो हे जमूरे! आधुनिक काल में चार अमेरिकियों ने मिलकर इंटरनेट पर अपनी भावना व्यक्त करने के लिए लोगों को एक मंच दिया। यहां अधिकतम 140 शब्दों में अपनी बात कही जा सकती है। इसी बात को इन अमेरिकियों ने नाम दिया ट्वीट (चहचहाना)। अब इन चारों अमेरिकियों का भले ही जो उद्देश्य रहा हो, अपने यहां इसका जमकर सदुपयोग किया जा रहा है, खासकर किसी पर कीचड़ उछालने के लिए।
हुजूर! तो ऐसा कहिए न...कि आप ट्वीट की बात कर रहे हैं। इसको तो हम अच्छे से जानते हैं। इसका सबसे बढि़या उपयोग तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते हैं और करते आए हैं। अपने मन की बात वह या तो रेडियो पर करते हैं या फिर ट्वीट करते हैं।
हां जमूरे...सही पकड़े...वही वाला चहचहाहट...। पर, आज-कल इसका सबसे बढि़या उपयोग एक दूसरा ही मोदी कर रहा, भगोड़ा मोदी। भइया... ऐसा छाया है कि कुछ पूछो मत। खुद तो लंदन में छिपकर बैठा है पट्ठा। और रोज एक बार चहचहा भर देता है... कि फलां ने उसे लंदन भागने में मदद की। ढिमका ने उसे थाईलैंड का वीजा दिलाया। इसने लंदन में कॉफी पी तो उसने चाची से मदद दिलाने की कोशिश की। इसके बाद पट्ठा फिर गायब हो जाता। यहां अपने देश में मचता है बवाल... बयान पर बयान, हम नंगे पर देखो तुम हमसे ज्यादा नंगे...। इस्तीफे की मांग... कुर्सी छोड़ो-कुर्सी छोड़ो तुमने ज्यादा खाया कुर्सी छोड़ो। किसिम-किसिम के कीचड़, कुछ इम्पोर्टेड कीचड़ तो कुछ देशी...सब खूब उछाले जा रहे। बड़ा मजा आ रहा है...खासकर मीडिया को।
कई साल हो गए भगोड़े मोदी को देश छोड़े, पर देश है कि उसका पीछा ही नहीं छोड़ रहा। ये इन्टरव्यू, ओ इन्टरव्यू... पुराने फुटेज, नया चेहरा...पता नहीं कौन-कौन सा क्रीम-पाउडर पोतकर टीवी पर उसको दिखाया जा रहा। एकदम नारद बन गया है ई भगोड़ा मोदी...। एक बात देवताओं की सभा में उछाली...दूसरी असुरों की सभा में... दोनों लड़-मर रहे। ई दूर खड़ा होकर कह रहा...नारायण...नारायण...।
मान गए हुजूर... ई तो बड़े ही काम की चहचहाहट है...चलिए हम भी शुरू हो जाते हैं...।
(इतिश्री चहचहाहट कथा)
-विशाल शुक्ल ‘अक्खड़’ 

तुमने हमें ठोकर जो मारी न होती

तुमने हमें ठोकर जो मारी न होती
नशीली गजल यह हमारी न होती
चलन है जहां का बड़ा ही निराला
जो ये यूं न होता तो तू यूं न होती
मोहब्बत की ऐसी अदा पर फिदा
मैं तुझमें न होता तू मुझमें न होती
मिलन को हमारे चूनर रंगा कर
गगन यूं न होता धरा यूं न होती