सोमवार, 30 मार्च 2015

नहीं करता हूं ऐसा काम कि मैं आम हो जाऊं
झूठ को सच कह नहीं पाता भले बदनाम हो जाऊं
कोशिश कर जीभर मेरे रकीब मुझे डुबाने की
तेरे सदके ही सही अक्खड़ से गुलफाम हो जाऊं
किसी को भूल से भी भूल में न रहना चाहिए
वक्त का हर शख्स गुलाम याद रखना चाहिए
आज मेरी बारी है कल तेरी होगी मेरे दोस्त
हुस्न तेरा हो न हो जहां में इश्क रहना चाहिए
कभी सोचा है तुम्हें सबसे शिकायत क्यों रहती
दूसरों की मिटाने से अपनी लकीर लंबी नहीं होती
हरे भरे को ठूंठ लिखूं
कैसे इतना झूठ लिखूं
सागर बन फिरता रहा नदियों ने राहें मोड़ लीं
बादल बन बरसा दिल जब सखियों ने बाहें छोड़ दीं
मिलन की बेला में भी न आया मुझको करार
आंसू बन निकले अरमां अपनों ने उम्मीदें तोड़ दीं
नहीं करता हूं ऐसा काम कि मैं आम हो जाऊं
झूठ को सच कह नहीं पाता भले बदनाम हो जाऊं
कोशिश कर जीभर मेरे रकीब मुझे डुबाने की
तेरे सदके ही सही अक्खड़ से गुलफाम हो जाऊं
ताऱीफ कैसे करूं तेरी उस अदा की
लाखों का दिल तोड़ करोड़ों की ओर बढ़ी

एक शेर

उफ ये अदा तेरी गैरों से दिल लगाने की
यूं ही कह देते दुआ क्यूं की मेरे मर जाने की

एक शेर

जबसे हमने बिजलियां गिराना छोड़ दिया
लोग समझते हैं हमारे जिगर में आग नहीं

एक शेर

खेल कर मेरे अरमानों से 
वह अनजान बने फिरते हैं
इतने भी नावाकिफ नहीं हम 
दिल में तूफान लिए फिरते हैं

एक शेर

वाह तो नहीं मांगी थी टूटे दिल के साज पर
यह सदा बुलंद होगी उनके इस अंदाज पर