मंगलवार, 25 मार्च 2014

होली खेलब न कन्हाई

होली खेलब न कन्हाई घर जाइब कइसे
सासू पुछिहैं दस सवाल समझाइब कइसे
होली खेलब न कन्हाई...

रंग-बिरंगा देख ससुरजी होइ जइहैं नाराज
रामजी मोरे कछु न बोलिहैं मुंह लेहैं घुमाय
अपने मन कय घनी खुशी बताइब कइसे
होली खेलब न कन्हाई...

ननद हमरी बड़ी सयानी कइदी यहर-वहर
बात-बात पर ताना मारी होई जियब दूभर
दुसरे कय चिंता नाही, मन का बहलाइब कइसे
होली खेलब न कन्हाई....

फागुन मा देवर बन घूमयं टोला कय सब बुढ़वय
रंगयक बहाने करिहैं छेड़खानी उम्र न देखिहैं वय
पड़िगेन बीचेम जव हम उनके जिव बचाइब कइसे
होली खेलब न कन्हाई...

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