मंगलवार, 25 मार्च 2014

महंगाई

उफ यह महंगाई, हाय ये महंगाई
एक ही दिन में खा गई सारी कमाई

ठोंक बजा कर हर सामान चुनतीं
पत्नी जी तोड़-तोड़ कर अरमान बुनतीं
सूची से कम जरूरी सामान खारिज करतीं
फिर याद आ गई अचानक ही दवाई
उफ यह महंगाई, हाय ये महंगाई...

बर्तन की दुकान हो कपड़े की दुकान
बड़ी हसरत से हर सामान देखतीं
उठातीं जग फिर कप खरीद लेतीं
बिटिया की साइकिल पर न आई
उफ यह महंगाई....

चुन-चुन कर हर एक दीया रखतीं
घूम-घूम कर जिया को तकतीं
कहीं भारी न पड़ जाए बजट गुनतीं
घट गई गणेश-लक्ष्मी की लंबाई
उफ यह महंगाई....

 हीरा तकतीं चांदी उठातीं
मोलभाव कर लौटा देतीं
याद आ जाता आलू-टमाटर
सोच-समझकर गृहस्थी सजाई
उफ ये महंगाई.....
(जिया बिटिया का नाम है...)

कोई टिप्पणी नहीं: