शनिवार, 18 जनवरी 2014

बिटिया का दर्द

बिटिया का दर्द

धरा धरी तो मइया रोई
बाप कलेजा चाक हुआ
देख खिलौना भैया से
हर दिन दो-दो हाथ हुआ

सजी चुनरिया मुझ पर सोहे
दुनिया की आंखों में गड़ गई
जब-जब निकली घर से बाहर
कुछ ठिठकी, कुछ सहम गई

यह है मेरी शंका अपनी
या है इन नजरों का दोष
नहीं, नहीं यह सच है मेरा
स्वप्न नहीं, पूरा है होश

रिश्ते-नाते बड़े करीबी
पर सबकी आंखें कुछ बोलें
जब भी देखें मेरी जानिब
यहां-वहां ऐसे ही डोलें

क्यूं ऐसी है उलझन मेरी
कहां गए रक्षा के वादे
कैसे उड़ूं खुले में अब मैं
सबने इतने बोझ हैं लादे

बोझ उठाती, कुचली जाती
राह सुझा मंजिल दिखलाती
सड़क सी किस्मत वाली हूं मैं
अपनी ही धुन में खोई रहती

किसी से जुड़ी किसी से कटती
कुछ ऐसी है मेरी हस्ती
नवजीवन की नींव रखूं में
रिश्ते के हर फेर में पिसती

वो गुरफा में बैठे हैं दीदार-ए-यार को

वो गुरफा में बैठे हैं दीदार-ए-यार को
पहुंचा दो कोई हाल-ए-दिल दिलदार को

हसरत मिलने की हसरत ही रह गई
सरनिगूं बना दिया नगमा निगार को

दर्द-ए-दिल दिया दवा भी तो दे देते
यतीम क्यूं छोड़ दिया अपने निजार को

नीयत बदल गई निशाना बदल गया
रुसवा करूं कैसे उस जां-निसार को

नुक्स था मुझमें या आंखें खराब थीं
बेदर कर दिया घर के पहरेदार को

कल तक झूमे वो

कल तक झूमे वो खत ओ किताबों में
आज आये यूं मेहमां बनके ख्वाबों में

रोशन जहां था जिनका मेरी इक मुस्कान पे
कहने लगे, बाकी रहा न तेल अब इन चरागों में

दर-ओ-दीवार के दीदार को रहते थे बेकरार
मोड़ लिया मुंह हमसे रहने लगे हिजाबों में

वो छत की दीवार से कोहनी टिका के रखना
डूब गया सूरज गम के अंधियारे बागों में

देख के आती है लबों पे मुस्कान कटीली
सोच लो अक्खड़ न डूब जाना शराबों में

सर्द मौसम की बदरी

सर्द मौसम की बदरी सितम ढा रही है
शाल ओढ़े सनम तू किधर जा रही है

बूंदे गिरने लगी हैं जरा सा ठहर जाओ
संभल कर चल लो कहीं न फिसल जाओ
सांसों की गर्मी दे दो सदा आ रही है
सर्द मौसम की बदरी सितम ढा रही है

भूल से भी न तुम भूल ऐसी करो
हवाओं का रुख देख कर ही चलो
जुल्फों पर ऐसा क्यों कहर ढा रही है
सर्द मौसम की बदरी सितम ढा रही है

छोड़ो बहाने चले आओ हमदम
हमसे न रंजिश दिखाओ यूं प्रियतम
दिल की हर धड़कन सिहर जा रही है
सर्द मौसम की बदरी सितम ढा रही है

आओ जरा शबाब पे

आओ जरा शबाब पे आओ तो हुजूर
रुख से जरा नकाब हटाओ तो हुजूर

बदरी में छिप के बैठा है चांद क्यूं मेरा
लब से जरा शराब छलकाओ तो हुजूर

चोरी-चोरी तकना मुस्का के छिप जाना
जुल्म है अदा कोई बताओ तो हुजूर

मुझसे अच्छा कैसे उस छत का है नसीब
अदाओं से अपनी न दिल जलाओ तो हुजूर

कहता है अक्खड़ जो सुनना जरा ध्यान से
अब तो दरियादिल बनके दिखाओ तो हुजूर

कोई दियो बताय

पोथी लिखने बैठा पंक्ति लिखी न जाय
ऐसी भीषण ठिठुरन में अंग-अंग थर्राय
कलम बौराई सर्दी से, चलने से घबराई
कैसे लिखूं बातें दिल की कोई दियो बताय

कह दो...

कह दो छुप के यूं न देखा करें
दिल में हलचल यूं न पैदा करें

सदाएं दिल की जुबां पर ले आएं
निगाहें मिला के यूं न हटाया करें

गैरों से मिलते दिखाते अदाएं
हमसे किया यूं न पर्दा करें

जमाना है ये कुछ तो कहेगा
अहसासों को यूं न रुसवा करें

हिम्मत है तो हिम्मत दिखाएं
हाल-ए-दिल का यूं न सौदा करें

बिटिया

ऐ चांद तू इतना भी क्यूं इतराया करता है
इक चांद मेरे आंगन में भी खेला करता है
चार दिन की तेरी चांदनी होगी तो अच्छी
मेरी चंदा बिटिया से जहां महका करता है