बुधवार, 15 मई 2013

तब यह जाना मैंने

अम्मां की आंचल से निकला तब यह जाना मैंने
धूप-बारिश, गलन-तपन भी दुनिया में ही होती है

भूख-प्यास, दुख-बीमारी, सोना-जगना और रोना
अम्मां के साये में भला जगह कहां इनको मिलती है

अम्मां को मैंने कभी कहां चैन से सोते देखा है
मुस्कान भरी नींद बच्चे की हो तो वह भी सोती है

जब भी रोया हूं अम्मां मन ही मन बहुत रोई है
आपाधापी खींचातानी में भी वह पास हमारे होती है

ममता उसकी अटल सत्य बाकी सब हवाहवाई है
तब जाना दुनिया क्यों मां के जाने पर इतना रोती है

यहां मां नहीं है

ख्वाहिशें बहुत हैं मगर आसमां नहीं है
आसाइशें बहुत हैं मगर यहां मां नहीं है

चांद-सितारों तुम क्या जानो क्या कमी है
रोशनी आये जिससे वह रोशनदां नहीं है

गुल खिलते हैं यहां हर घर के गमले में
अम्मां का खिलाया वह गुलिस्तां नहीं है

पतंगा कितना ही तड़पे जान देने को
जल जाए हवा के झोंके से शमां नहीं है

क्या सुनाऊंगा मुनिया को मैं कहानी
ऐसी तो कोई भी अपनी दास्तां नहीं है

चलो जाओ सूरज अब तुम यहां से
छांव दे तुम्हारे तेज से दरख्तां नहीं है

समा ले गर्मजोशी से अपने आगोश में
कभी होगा अब ऐसा कोई जहां नहीं है

ले चलो दूर हमको इस भरी दुनिया से
इसमें अपने लिए एक भी मकां नहीं है

बहुत खोजा एक भी न मिला अक्खड़
होंगे तो हों तुम जैसा एक भी यहां नहीं है