शनिवार, 27 अप्रैल 2013

मौका

चलो एक बार और मुलाकात का मौका दे दो
हकीकत में न सही ख्वाब में ही तोहफा दे दो

चलन है जमाने का तुम भी तो एक राही हो
कुछ कहने कुछ सुनने का यह सौदा ही कर लो

अधूरी रह गई थीं तब बातें कुछ हमारे बीच में
यह आरजू है उतना ही गुनने का हौसला दे दो

न मांगेंगे कोई हिसाब हम अपने जख्मों का
इतनी इल्तजा तो अब ऐ दर्द-ए-दिल सुन लो

न दुआ-सलाम होगी न ही पूछेंगे हाल तुम्हारा
पर ऐसा न हो आने को कहके फिर धोखा दे दो

कोई टिप्पणी नहीं: