शनिवार, 27 अप्रैल 2013

गंवार मन

मैं गांव से निकलकर शहर आ गया
बस यहीं पर खुद पे सितम ढा गया

वह बीड़ी का सुट्टा पीछे जो छूटा
सिगार के बहाने अहम आ गया

शहरों की रौनक यह दौलत ही दौलत
गंवार का दिल अब जखम खा गया

रिश्तों से बेईमानी हमसे न होगी
आड़े हमेशा अपना धरम आ गया

जब भी निकला सड़क पर ऐ दिल
सामने आंखों के सनम आ गया

गांव चलने की बेला लगता है आई
समझ में अब शहर का मरम आ गया

लौट चलो अब भी समय है विशाल
मिट्टी में मिलने का करम आ गया