सोमवार, 29 अप्रैल 2013

हस्र-ए-शोहरत

शोहरत तुम्हारी है बहुतों को हसरत तुम्हारी है
नशे में चूर हो तुम तो इतनी ही गैरत तुम्हारी है

हज़म होती नहीं तुमको यह गज़ल तो हमारी है
राज खुल गया सब पर वजह-ए-हैरत तुम्हारी है

खुश कर सकूं तुमको नहीं मुझमें दिलदारी है
कह रहा हूं मैं शेर अब यह भी रहमत तुम्हारी है

खुदा की ये तो नेमत है नहीं जागीरदारी है
अश्क हैं आंखों में बस यही उजरत तुम्हारी है

हथेलियां खुल नहीं पातीं लबों पे राजदारी है
दे सके दाद किसी को कहां आदत तुम्हारी है

कैसे बैठोगे महफिल में भले ही ये तुम्हारी है
सुन सको नज्म जो मेरी भला जुर्रत तुम्हारी है

मशरूफ यूं ही रहते हो सदा ये कैसी नागवारी है
सदा-ए-दिल छिपा लेते हो ऐसी उल्फत तुम्हारी है

आवाज़ गूंजे भी तो कैसे क्या हालत तुम्हारी है
बता सको हाल-ए-दिल कहां हिम्मत तुम्हारी है

अभी भी सोच लो जी भर यह दुनिया में शुमारी है
समा लो आगोश में इसको नहीं गुरबत तुम्हारी है

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