रविवार, 28 अप्रैल 2013

ये बीमारी नहीं अच्छी

इतनी बेकरारी नहीं अच्छी ये ग़मख्वारी नहीं अच्छी
भूल जाना कहकर आने को ये अदा तुम्हारी नहीं अच्छी

खल्वत ही बख्स देते तोहफे में इन्तजार तो न देते
हफ्ता गुज़र जाता है ये शाम-ए-इतवारी नहीं अच्छी

जानता हूं मुस्कुराते हो तुम मेरे हालात जानकर
मत करो ऐसा हर बार ये कारगुजारी नहीं अच्छी

गम-ए- हिज्र दे जाते हो हर बार दीदार के बदले
वो बेरुखी ही अच्छी थी ये कलाकारी नहीं अच्छी

अब भी नहीं समझे अक्खड़ तो खुदा क्या करे
यूं ही रातें गुज़र जाती हैं ये बीमारी नहीं अच्छी

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