शनिवार, 27 अप्रैल 2013

अम्मां की याद

सोता ही नहीं यह मन कहीं खोता भी नहीं यह मन
मेरी इस बात पर मत हंसना यूं ही रोता नहीं यह मन

बात तो है और खास भी है अम्मां की आई याद बहुत है
तड़पा है बिखरा भी है बस कुछ कहता नहीं यह मन

रातें बीतीं यूं ही गिनते-गिनते दिन भी सब बीत गए
आंचल छूटा जो अम्मां का चैन नहीं पाता यह मन

उबटन होली वाला छूटा काली हो चली दिवाली है
यहां की गुझिया और पकौड़ी खा ही नहीं पाता यह मन

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