सोमवार, 29 अप्रैल 2013

हस्र-ए-शोहरत

शोहरत तुम्हारी है बहुतों को हसरत तुम्हारी है
नशे में चूर हो तुम तो इतनी ही गैरत तुम्हारी है

हज़म होती नहीं तुमको यह गज़ल तो हमारी है
राज खुल गया सब पर वजह-ए-हैरत तुम्हारी है

खुश कर सकूं तुमको नहीं मुझमें दिलदारी है
कह रहा हूं मैं शेर अब यह भी रहमत तुम्हारी है

खुदा की ये तो नेमत है नहीं जागीरदारी है
अश्क हैं आंखों में बस यही उजरत तुम्हारी है

हथेलियां खुल नहीं पातीं लबों पे राजदारी है
दे सके दाद किसी को कहां आदत तुम्हारी है

कैसे बैठोगे महफिल में भले ही ये तुम्हारी है
सुन सको नज्म जो मेरी भला जुर्रत तुम्हारी है

मशरूफ यूं ही रहते हो सदा ये कैसी नागवारी है
सदा-ए-दिल छिपा लेते हो ऐसी उल्फत तुम्हारी है

आवाज़ गूंजे भी तो कैसे क्या हालत तुम्हारी है
बता सको हाल-ए-दिल कहां हिम्मत तुम्हारी है

अभी भी सोच लो जी भर यह दुनिया में शुमारी है
समा लो आगोश में इसको नहीं गुरबत तुम्हारी है

रविवार, 28 अप्रैल 2013

मां का प्यार

मां ने बड़े जतन से गांव से भेजा है
डिब्बे में घी का कुछ कतरा अब भी है

जानता हूं वह मेरी मां है, सब जानती है
याद मेरे दूध न पीने का नखरा अब भी है

साथ भेज दी हैं भुनी हुई मूंगफलियां भी
मेरी सेहत पर लगता उसे खतरा अब भी है

ये बीमारी नहीं अच्छी

इतनी बेकरारी नहीं अच्छी ये ग़मख्वारी नहीं अच्छी
भूल जाना कहकर आने को ये अदा तुम्हारी नहीं अच्छी

खल्वत ही बख्स देते तोहफे में इन्तजार तो न देते
हफ्ता गुज़र जाता है ये शाम-ए-इतवारी नहीं अच्छी

जानता हूं मुस्कुराते हो तुम मेरे हालात जानकर
मत करो ऐसा हर बार ये कारगुजारी नहीं अच्छी

गम-ए- हिज्र दे जाते हो हर बार दीदार के बदले
वो बेरुखी ही अच्छी थी ये कलाकारी नहीं अच्छी

अब भी नहीं समझे अक्खड़ तो खुदा क्या करे
यूं ही रातें गुज़र जाती हैं ये बीमारी नहीं अच्छी

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

गंवार मन

मैं गांव से निकलकर शहर आ गया
बस यहीं पर खुद पे सितम ढा गया

वह बीड़ी का सुट्टा पीछे जो छूटा
सिगार के बहाने अहम आ गया

शहरों की रौनक यह दौलत ही दौलत
गंवार का दिल अब जखम खा गया

रिश्तों से बेईमानी हमसे न होगी
आड़े हमेशा अपना धरम आ गया

जब भी निकला सड़क पर ऐ दिल
सामने आंखों के सनम आ गया

गांव चलने की बेला लगता है आई
समझ में अब शहर का मरम आ गया

लौट चलो अब भी समय है विशाल
मिट्टी में मिलने का करम आ गया

अम्मां की याद

सोता ही नहीं यह मन कहीं खोता भी नहीं यह मन
मेरी इस बात पर मत हंसना यूं ही रोता नहीं यह मन

बात तो है और खास भी है अम्मां की आई याद बहुत है
तड़पा है बिखरा भी है बस कुछ कहता नहीं यह मन

रातें बीतीं यूं ही गिनते-गिनते दिन भी सब बीत गए
आंचल छूटा जो अम्मां का चैन नहीं पाता यह मन

उबटन होली वाला छूटा काली हो चली दिवाली है
यहां की गुझिया और पकौड़ी खा ही नहीं पाता यह मन

साली

आज तुम्हारी आयी है कभी हमारी भी आती थी
आज तुम्हारी भायी है कभी हमारी भी भाती थी

कोई कहता भोली है कोई शर्मीली बताती थी
जब भी वह आती थी खुशबू सी भर जाती थी

जीजा-जीजा कहती आगे-पीछे डोला करती थी
साली अकेली हूं आपकी हर पल याद दिलाती थी

अच्छा है पत्नी से इस पर रार हमेशा होती थी
उसको लेकर हममें तो तकरार हमेशा होती थी

वह भी खुश तुम भी खुश अब क्यों शर्माती हो
यह करो वह मत करो तुम्हीं तो टोका करती थी

मौका

चलो एक बार और मुलाकात का मौका दे दो
हकीकत में न सही ख्वाब में ही तोहफा दे दो

चलन है जमाने का तुम भी तो एक राही हो
कुछ कहने कुछ सुनने का यह सौदा ही कर लो

अधूरी रह गई थीं तब बातें कुछ हमारे बीच में
यह आरजू है उतना ही गुनने का हौसला दे दो

न मांगेंगे कोई हिसाब हम अपने जख्मों का
इतनी इल्तजा तो अब ऐ दर्द-ए-दिल सुन लो

न दुआ-सलाम होगी न ही पूछेंगे हाल तुम्हारा
पर ऐसा न हो आने को कहके फिर धोखा दे दो

प्यासे को पानी दे मौला

चाहे समंदर छीन ले प्यासे को पानी दे मेरे मौला
चाहे बवंडर छीन ले मरते को सांसें दे मेरे मौला

छीन ले बादल सभी आसमां के और नमी भर दे
सूरज की तपिश हटा बूंदों को बारिश दे मेरे मौला

छीन ले चांद की चांदनी घर के आंगन से सभी
आंखों में रोशनी दिल में उजाले भर दे मेरे मौला

छीन ले सारे हुनर काबिलियत मेरी तकदीर के
आदमियत बाकी रहे ऐसे जज्बे दे मेरे मौला

छीन ले भले ही तू इस जहां की सारी नेमतें
कुर्बान होऊं वतन पर ऐसी हिम्मत दे मेरे मौला

वह दोस्त नहीं हो तुम

गर्दिश में जिसे याद करूं वह दोस्त नहीं हो तुम
तुम न जानो इरादे इतने मदहोश नहीं हो तुम

फिर क्यों चले आते हो दोस्ती का दामन थामे
अपना दर्द कैसे दिखाऊं होश में नहीं हो तुम 

हुस्न का गुरूर है तुमको तो अपने पास रहने दो
जी न सकूं जिसके बिन वो महबूब नहीं हो तुम

दिल है यह मेरा किसी कबाड़ी की दुकान नहीं
खरीद लूं फिर भी इतने पशेमां नहीं हो तुम

खुद्दारी

बड़े खुशफहम हो तुम शर्म मगर आती है मुझको
कभी इस दर-ओ-दीवार पर सिर्फ राज तुम्हारा था

घरौंदे बनाए थे हमने रेत से समंदर के किनारे
मैं कहां था बस तुम थे और आफताब तुम्हारा था

गीत मेरे थे गज़ल मेरी थी छंद का हर बंद मेरा था
झूम उठी दुनिया जिस पर बस वो साज तुम्हारा था

फकत इस वास्ते कि सुन न पाएं लोग मुझको
लुटा दिया तुमने हर वह असबाब तुम्हारा था

सितम तो देखो वक्त ने कैसा ढाया है तुमपर
गीत गा रहा हूं मैं अब यह अश्फाक हमारा है

(अश्फाक-सहारा)

गज़ल से इल्तज़ा

ऐ गज़ल मेरी कसम है तुझको 
जब भी जी चाहे घर चली आना

सो रहा होऊं अगर उस वक्त मैं
थपकियां दे मुझे झटपट जगाना

गज़ल जब भी बने चांदनी रातों में
नींद मेरी तू जरा देर से आना

यह दिल तेरा जज्बात तेरे हैं
यहां आने में तुझे क्यों शर्माना

तारों तुम उसे राह भी बता देना
बेसबब न हो तु्म्हारा टिमटिमाना

आफ़ताब मेरे जरा सा ठहर जाना
गज़ल आ जाए उसके बाद आ जाना