सोमवार, 31 दिसंबर 2012

निःशब्द हूं, स्तब्ध हूं, मैं भी एक दामिनी का बाप हूं....

कल तलक फलक पर चमक रही थी दामिनी
आज देखो मां की गोद में चैन से पड़ी है सोई, 
उद्विग्न हूं कि उसके ऐसे जाने का विधान न था
वहशियों की भेंट चढ़ेगी काल को भी गुमान न था
किसकी दोषी थी वह, क्यों उस पर अत्याचार हुआ
गांधी-गौतम की धरती पर क्यों उससे व्यभिचार हुआ
उम्मीदें खाक हो गईं, सपने सब बेईमानी निकले
बाप, भाई, बेटा, सारे रिश्ते ही अभिमानी निकले
बेटी-बहना-मां की इज्जत पर छाया एक अभिशाप हूं
निःशब्द हूं, स्तब्ध हूं, मैं भी एक दामिनी का बाप हूं...

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