सोमवार, 31 दिसंबर 2012

कभी किसी पर भरोसा न करो, कभी किसी का भरोसा न तोड़ा
सोचो शायद कोई इम्तहान ले रहा है, समय का यही दस्तूर है

इस दीवार को तोड़ दो

ये जो दीवार है, इस बड़ी सी दीवार को तोड़ दो
अपने अस्तित्व पर हो रहे हर वार को मोड़ दो।


संसद और सड़क के बीच तकरार होनी चाहिए,
रहनुमाओं की बनाई हर तलवार तोड़ दो।


जो आए आंच किसी दामिनी के दामन पर,
जुल्मी अपने हों या पराए जवाब मुंहतोड़ दो।

आ गया है जोश जो देखो अब न दबने पाए,
मन में हमारे व्याप्त है आक्रोश न सोने पाए।

चुन-चुन निकालो भड़ास हर एक दरिंदे पर
हमारी जमीं पर कोई मदहोश न रहने पाए।

रह गए जुल्म सहते गर अपने समय का
आने वाला वक्त कहीं गर्दिश में न बीत जाए।


कल तलक थी जो रात काली और भयावह
वह रात यूं ही अपनी आभा में न बीतने पाए।

बिना शीर्षक

मेरी रचना में आज बैठा हुआ आक्रोश है
हर तरफ फैला हुआ यह कैसा विद्वेष है।
अदम की जुर्रत आ गई है मुझमें
या कोई और नया मेरा यह रूप है।
विधायक, सांसद और मंत्री जी
कोई तो बताए कैसी नयी यह धूप है।


यह वक्त का सितम नहीं, अपनों ने लगाई आग है
चलो उठ जाओ राजू, बब्लू, पप्पू, छोटू और चिंटू
अब भी सोते रहना भविष्य के लिए अपराध है।

आज भी सोते रह गए जो पीढ़ियां माफ नहीं करेंगी
उठ जाओ नन्हकी, बब्ली, सिम्मी, डिंपी और जिया
वसुंधरा पर आज उतरा नया एक और अभिशाप है।

निःशब्द हूं, स्तब्ध हूं, मैं भी एक दामिनी का बाप हूं....

कल तलक फलक पर चमक रही थी दामिनी
आज देखो मां की गोद में चैन से पड़ी है सोई, 
उद्विग्न हूं कि उसके ऐसे जाने का विधान न था
वहशियों की भेंट चढ़ेगी काल को भी गुमान न था
किसकी दोषी थी वह, क्यों उस पर अत्याचार हुआ
गांधी-गौतम की धरती पर क्यों उससे व्यभिचार हुआ
उम्मीदें खाक हो गईं, सपने सब बेईमानी निकले
बाप, भाई, बेटा, सारे रिश्ते ही अभिमानी निकले
बेटी-बहना-मां की इज्जत पर छाया एक अभिशाप हूं
निःशब्द हूं, स्तब्ध हूं, मैं भी एक दामिनी का बाप हूं...

हर दरिया के सीने में एक आग जलनी चाहिए

हंगामों के बल कहां कब कौन जीता है जहां में
हर दरिया के सीने में एक आग जलनी चाहिए

कल तलक बैठे थे जो लाश बनकर अपने घर में
उन लाशों के सीने में भी अब हलचल होनी चाहिए

आज नहीं कोई दुष्यंत यहां झकझोरने को गजलों से
कर हकीकत गजल को उन्हें तो इज्जत देनी चाहिए

अदम भी तो रहे नहीं अब कौन कहे हमारी पीड़ा
आक्रोश में ही सही अदम की आवाज होनी चाहिए

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

बेदर्द जमाना

अक्स उनका था आईने में या तस्वीर मेरी थी, 
जो भी था, वह चेहरा बड़ा ही भयावह दिखा।

तुम में तो खुद का अक्स देखा करता था,
अब अक्स ने ही हमसे बेवफाई कर डाली।

यह मुकद्दर का सितम नहीं, अपने ही हरजाई हैं,
वरना औकात क्या थी इस दुश्मन ए जहां की।

रविवार, 21 अक्तूबर 2012

मैं शब्द बेचता हूं

मैं शब्द बेचता हूं, हर लम्हा, हर वक्त बेचता हूं
खरीदार एक भी नहीं, फिर भी बेसब्र बेचता हूं,
उम्मीद है जहां में कोई खरीदार मिल जाएगा
एक बार बिका तो बार-बार बिकता जाएगा।

मैं सपने भी बेचता हूं, सब अपने बेचता हूं
सभी के दर्द बेचता हूं, अपने सब्र बेचता हूं
उम्मीद है कोई तो जगनिवार मिल जाएगा
एक बार मिला तो फिर कहीं न जा पाएगा।

किसी की आह लेने की चाहत नहीं रही,
दिल के हर दर्द बिकाऊ हैं सिर्फ यहां पर
कोई और खरीदे न खरीदे मैं खरीद लूंगा
उस दर्द के सहारे मेरा भी दर्द खिल जाएगा।

बड़ी खूबसूरत है मेरी जाने बहार

बड़ी खूबसूरत है मेरी जाने बहार
बड़ी मासूमियत से करती मनुहार
साइकिल है लेनी पर बाद में लूंगी
आप जल्दी फिर आना तब खेलूंगी
बार-बार करती है मुझसे यही इजहार
बड़ी खूबसूरत है मेरी जाने बहार।
तोतली जुबां में है किस्से सुनाती
घर और स्कूल की हैं बातें बताती
मां को भी नहीं देती इसका अधिकार
फोन पर करती है है वह बातें हजार
बड़ी खूबसूरत है मेरी जाने बहार।

किससे कहूं दिल का हाल

हर बात हर किसी से कही नहीं जाती
हर बात हर किसी की सुनी नहीं जाती,
उसकी भी न सुनूं ऐसा हो नहीं सकता
उसकी आंखों की नमी देखी नहीं जाती।

दिन आयेंगे बहार के है उसी का इंतजार
इस रात की सुबह स्वर्णिम नशीली होगी,
विश्वास करो मेरा, विश्वास रखो मुझ पर
यह विषैली हवा कभी मुझे तोड़ नहीं सकती।

तुम कहो दिल की हर वक्त समय है साथ
ईमान की है रोटी, ईमान की ही है धोती,
किसी के कहने से किसी का हो नहीं सकता
उनके कहने से क्या, कयामत यूं आ नहीं सकती