गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

हम कितने भ्रष्ट?

भ्रष्टाचार यानी वह व्यवहार, आचरण, जो सही न हो. अगर मैं ठीकठाक समझ पा रहा हूं, तो यही मतलब है भ्रष्टाचार का. यानी सामाजिक ताने-बाने में बुने नियमों को तोड़ने-मरोड़ने की प्रक्रिया को भ्रष्टाचार माना जा सकता है. ऐसे में हमें आत्ममंथन की जरूरत है. मंथन इस बात का कि क्या हम दैनिक जीवन में भ्रष्टाचार में लिप्त तो नहीं हैं? हां, बहुत ऊपर जाने की जरूरत नहीं. दरवाजे की घंटी बजी. बाप ने बेटे से कहा, कोई भी होकह देना मैं घर पर नहीं हूं. क्या यह भ्रष्टाचार नहीं? तो फिर आत्ममंथन शुरू किया जाये. देखें, हम कितने भ्रष्ट हैं?

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