सोमवार, 20 सितंबर 2010

तेरी, मेरी, उसकी...आखिर किसकी अयोध्या

...बचपन से ही घर में सुबह-सुबह उनींदी आंखो¨ के बीच मधुर स्वर में गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस की चौपाई...अवध पुरी मम पुरी सुहावन, उत्तर दिस सरजू बह पावन...सुनता आ रहा हूं. बड़के भइया (बड़े पापा के लड़के या यूं कहें बड़की अम्मा के भइया और हम सबके बड़के भइया) स्कूल में पढ़ाते हैं. सुबह उठ कर स्नान ध्यान करते थे. इसमें दादी का उन्हें पूरा सहयोग मिलता था. दोनो¨ में से कोई भी नहाता अवध पुरी... की स्वर लहरी घर में जरूर गूंजती. उस समय अवध पुरी (अयोध्या) की एक निराली ही छटा मन में बसी थी, जो आज भी कायम है. सालो¨ साल यह सिलसिला चलता रहा...आज भी जारी है. दादी के जाने और बड़े भइया के सामने बने नये मकान में चले जाने के बाद भी. भइया आज भी स्कूल जाने से पहले नहाते समय उसी सुर में अवध पुरी मम पुरी...गाते हैं. हालांकि अब उम्र और तबियत साथ नहीं देते, पर उनकी वाणी में किसी भी प्रकार की कमी नहीं झलकती, वह भी तब जब रामचरित मानस में से कुछ गा रहे हो¨. स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद बाबा भोलेनाथ की नगरी बनारस के बीएचयू से स्नातक करने का मौका मिला. अब तो आये दिन अयोध्या के दर्शन होने लगे. अयोध्या होकर ही बनारस आना-जाना होता था. हालांकि इसके पहले भी अयोध्या आना-जाना लगातार लगा रहता था. पर, कभी भी धार्मिक पूजा-पाठ या मंदिरो¨ में दर्शन या सरयू में स्नान के लिए नहीं, बल्कि पिताजी के बनारस और बड़े भइया के कोलकाता में रहने के कारण. दोनो¨ अयोध्या होकर ही आते-जाते थे. गांव से करीब 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अयोध्या स्टेशन का रोयां-रोयां (अगर होता है, तो) शायद अब तक हमारी गंध से हमें पहचान लेता होगा. हम भी अयोध्या को उसी तरह से पहचानते हैं, जानते हैं. पर, जब भाजपा ने भगवान राम की जन्मभूमि को राजनीतिक मुद्दा बनाया, तब लगा था कि अयोध्या में कोई और ही हवा बहेगी, पर वैसा हुआ नहीं. सारी आशंका निर्मूल साबित हुई. अयोध्या के लोग, अयोध्या के बंदर, अयोध्या की गायें, अयोध्या की गलियां, अयोध्या की गंदगी, कुछ भी तो नहीं बदला. तब भी इनमें कोई बदलाव नहीं आया, जब तत्कालीन मुख्‌यमंत्री मुलायम सिंह ने कार सेवको¨ पर गोलियां चलवायीं और तब भी नहीं, जब विवादित ढांचा गिराये जाने के बाद पूरा देश दहशत और अलगाव की आग में जल रहा था. अयोध्या की फिजां में नफरत नहीं घुल पायी. आज भी नहीं घुली है और ईश्वर ने चाहा, तो पुरुषोत्तम राम की नगरी, कई शायरो¨ की जन्मस्थली, नवाबो¨ का नगर और मंदिरो¨ का शहर अयोध्या में 24 सितंबर के फैसले के बाद भी किसी तरह की बाहरी आबोहवा इसे विचलित कर पायेगी. हां, बीच-बीच में कुछ बाहरी उन्मादियो¨ ने अयोध्या के लोगो¨ के पेट पर जम कर लात जरूर मारी है. जब भी हमारी अयोध्या (ध्यान रहे अवध के नवाबो¨ की भाषा हैः कभी मैं का प्रयोग नहीं होगा अवध में. पढ़े-लिखे लोग भी मैं की जगह हम का ही प्रयोग करते हैं) पर कोई आफत आयी है, तो आम लोग ही उसमें फंसे हैं. देश-दुनिया से आये सैलानियो¨ को अयोध्या घुमानेवालो¨ में ज्‌यादातर गैर हिंदू मिलेंगी. सेंदुर (सिंदूर), बिंदी, माला, रामचरितमानस, गीता, पीढ़ा-बेलन और खड़ाऊं बेचनेवाले भी सभी हिंदू नहीं हैं. मंदिरो¨ के लिए पत्थर तैयार करनेवाले भी हिंदू नहीं हैं. पर, कभी भी अयोध्या को इनसे शिकायत नहीं हुई. फिर अयोध्या से बाहर के लोग इतने बेचैन हैं, आखिर क्‌यूं...? क्‌यूं 24 सितंबर के फैसले के बाद उन्माद फैलने की आशंका को हवा दी जा रही, जबकि अयोध्या के लोग शांत हैं? फिर जब भगवान कण-कण में बसे हैं, तो एक अयोध्या को ही निशाना क्‌यूं बनाया जा रहा है...और जब निशाना बनाया ही जा रहा है, तो अयोध्या के नाम पर राजनीति की रोटियां सेंकनेवालो¨ को वहां की गंदगी क्‌यो¨ नहीं दिखती. विश्व के नक्‌शे में स्थान रखनेवाली अयोध्या के रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद से ही नाक में घुसनेवाली बदबू क्‌या कभी इन रहनुमाओं ने महसूस नहीं की? अयोध्या स्टेशन के यात्रियो¨ के लिए पेयजल और बाथरूम की समुचित व्‌यवस्था नहीं होने की जिम्मेदारी कौन लेगा...अयोध्या के लोगो¨ के मुंह से निवाला छीनने का कोपभाजन कौन बनेगा...? बाबा कल्‌याण सिंह राजनीति की नैया डुबाने के बाद अब फिर से अयोध्या की ओर क्‌यो¨ झांक रहे हैं. राम के इतने ही बड़े भक्त थे, तो उन्हीं मुलायम सिंह का हाथ क्‌यो¨ थाम लिया था, जिन्हो¨ने कारसेवको¨ पर गोलियां चलवायी थीं. और बाबा मुलायम सिंह अब अयोध्या के लोगो¨ को बचाने के लिए आपके पास क्‌या हथियार है? और तो और हे कांग्रेस के पुरोधा...आपको क्‌या लगता है...अखबारो¨ में विज्ञापन छाप कर आप शांति फैला रहे हैं? अरे जाइये...जाकर अयोध्या हो आइये..वातानूकूलित कमरो¨ से निकल...देखिये...अयोध्या को रोटी की जरूरत है, काम की जरूरत है, शिक्षा की जरूरत है, गंदगी से मुक्ति की डरूरत है..अखबारो¨ में विज्ञापन छाप कर उन्माद भड़काने की नहीं. राम जिसके थे, उसके हैं और रहेंगे. पर, अवध की शामो¨ की रोशनी छीनने की कोशिश मत कीजिए. अयोध्या के स्थानीय पत्रकार मित्रो¨ से फोन पर बातचीत में अकसर उनका दर्द उभर आता है. वह कहते हैं ः क्‌या भाई क्‌या बतायें...पता नहीं कैसे बाहर से आये इलेक्‌ट्रॉनिक और प्रिंट के साथियो¨ को अयोध्या में उन्माद दिख रहा है. बल्कि इन लोगो¨ की खबरो¨ के प्रसारण-प्रकाशन के बाद हम लोगो¨ को डांट पड़ती है कि अयोध्या में इतना कुछ हो रहा है और तुम सो रहे हो. पत्रकार मित्र बड़े कातर स्वर में कहते हैं, भइया आप ही बताइये, जब अयोध्या में कुछ हो ही नहीं रहा, तो भला हम का लिख कर भेज दें. झूठ-मूठ का हमसे नहीं लिखा जायेगा. हां, इतना जरूर है कि अयोध्या में बाहरी पत्रकार मित्रो¨ की बदौलत खौफ जरूर फैलने लगा है. रही-सही कसर सरकार ने बड़ी संख्‌या में सुरक्षा बल के जवानो¨ को तैनात कर पूरी कर दी है. बाहरी पत्रकार मित्र अयोध्या में हालात बिगड़ने की खबर छापते-प्रसारित करते हैं और उनके इस शाश्वत सत्य की पुष्टि सरकार अगले दिन जवानो¨ की संख्‌या बढ़ा कर कर देती है. इसके कारण हमारी अयोध्या खौफजदा है...