सोमवार, 3 मई 2010

किस इज्जत की भेंट चढ़ी निरुपमा ?

आज सुबह की ही बात है. घर में बैठा था. दो साल की बेटी खेल रही थी. कभी मूंछें खींच रही थी, तो कभी कस कर गाल पर थप्पड़ जड़ रही थी, क्योंकि मैं पत्नी से बातचीत में मशगूल था और उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहा था. अचानक पत्नी ने बेटी को डांट दिया, कस कर, कि पापा को कोई मारता है. बेटी रोने लगी. मेरे और पत्नी के बीच ठन गयी. कुछ देर बोलचाल भी बंद रही. थोड़ी ही देर बाद बेटी को चोट लगी, तो पत्नी दौड़ कर मलहम उठाने दौड़ीं. हमारे बीच फिर से बेटी को लेकर बातचीत शुरू हो गयी. उसी बीच अचानक निरुपमा का जिक्र आ गया. पत्रकार निरुपमा पाठक का. मैंने पत्नी को सारी कहानी बतायी. साथ में यह भी कि शायद किसी करीबी ने उसकी हत्या कर दी. क्योंकि तब तक इस मामले में किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया था. सारा मामला जानने के बाद पत्नी बोलीं – आखिर क्यों मारा गया निरुपमा को...सिर्फ इसलिए कि वह विजातीय शादी करना चाहती थी. तब (विजातीय शादी करने से) जो इज्जत जाती घर वालों की, क्या अब वह बची रही. किस इज्जत की दुहाई दे रहे होंगे उसके परिवारवाले. अब जब जमाना बेटी का हत्यारा कह कर पुकारेगा. अब जब निरुपमा के पिता व भाई थाने के चक्कर लगा रहे हैं, तो किस इज्जत की दुहाई दे रहे हैं. पुलिस की गिरफ्त में अपनी मां को देख कर कहीं से देख रही होगी निरुपमा की आत्मा जार-जार रो रही होगी. और पुलिस की हिरासत में उसकी मां आखिर अब कौन सी इज्जत बचायेगी. सच में, बड़ा सवाल है. क्या है इज्जत. आखिर किसके कारण निरुपमा को जान गंवानी पड़ी. यह समाज और इसके बनाये वसूल क्यों किसी की जान के दुश्मन बन जाते हैं. और फिर वह बेटी, जिसके लिए कभी निरुपमा की मां भी मलहम लेकर दौड़ी होगी, उसके पिता ने भी बेटी के बचपन में उसका थप्पड़ सहा होगा, फिर उसी बेटी की जान कैसे ले ली. सिर्फ इज्जत के लिए. यह इज्जत क्या बला है, कोई समझाएगा. कोई बताएगा कि क्यों तमाम निरुपमाएं इस इज्जत की भेंट चढ़ जाती हैं. क्यों नहीं बंद होता इज्जत का यह ढकोसला. क्यों लोगों को जीने की आजादी नहीं दी जाती. कम से कम अब तो जीने का अधिकार दे दो.