मंगलवार, 21 जुलाई 2009

सिटी ऑफ ज्वॉय पर भीड़ की ममता, शक्ति प्रदर्शन का साधन बना शहीद दिवस

शहीद दिवस के नाम हर साल कोलकाता समेत पूरे राज्य में कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. पर ये कार्यक्रम हैं किसलिए, लोगों को परेशान करने, सिटी ऑफ ज्वाय की ऐसी-तैसी करने और किसलिए...राइटर्स अभियान के दौरान मारे गये कार्यकर्ताओं की याद में शहीद दिवस को इस बार दीदी ने ताकत प्रदर्शन का साधन बना दिया. इस मौके पर शहीदों को श्रद्धांजलि कम दी गयी, २०११ में होनेवाले बंगाल विधानसभा चुनाव के बारे में अधिक चर्चा की गयी. यही नहीं ममता दीदी ने तो २०११ विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल की जीत पक्की मान ली है. उन्होंने राइटर्स में बैठी तृणमूल सरकार की प्राथमिकताएं तक गिना डालीं. दूसरी ओर, बेचारी कोलकाता की निरीह जनता, उपनगरों से कोलकाता आनेवाले दैनिक यात्रियों की दुर्दशा पर दीदी ने केवल माफी मांग कर काम चला लिया. मंगलवार को कोलकाता की सड़कों व मेट्रो स्टेशन-ट्रेनों के साथ-साथ सभी दर्शनीय स्थलों पर दीदी की बातें सुनने राज्य भर से आये लोगों का कब्जा था. घर से दफ्तर पहुंचने में मुझे भी लगभग ३.५ घंटे लग गये, वह भी तब, जब मुख्य शहर में रहता हूं. फिर भी बस छोड़ कर लगभग तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, सड़क पर नहीं, सड़क के किनारे कीचड़ में. मजाल थी कि कोई भी सड़क पर कदम रखने की हिमाकत कर दे. हालात बिल्कुल वैसे ही, जैसे वाम मोरचा या माकपा की ब्रिगेड की किसी रैली का दृश्य.हालांकि मेरे समझ में अब भी यह नहीं आ रहा था कि दीदी को ताकत को प्रदर्शन करना ही था, तो शहीद दिवस ही क्यों??? वाम मोरचा और तृणमूल-कांग्रेस की इस ल‍ड़ाई से जनता को बाहर रखने के लिए छुट्टी वाला भी तो कोई दिन चुना जा सकता था. ऐसे में कम से कम दैनिक जनजीवन पर तो आफत नहीं आती, क्यों दीदी...है न...

1 टिप्पणी:

Praveen Bhatt ने कहा…

vishal bhai aapke parichya me padha ki phir prabhat khabar ki g hujuri kar raha hu, yahi sachcahi he dost lala ki naukari har or yahi haal he,
this is praveen kumar bhatt (dehradun)
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