मंगलवार, 27 जनवरी 2009

रियलिटी शो या टीवी का इमोशनल अत्याचार

अगर आप मुंबई महाराष्ट्र की वैशाली को बनाना चाहते हैं संगीत के विश्वयुद्ध का विजेता, तो उन्हें वोट देने के लिए टाइप करें...कोलकाता वेस्ट बंगाल की तोरषा सरकार को इंडियन आइडल बनाने के लिए वोट दें, टाइप करें...और ऐसे ही न जाने कितनी वोट अपील. अब तो आप लोग समझ ही गये होंगे, बात हो रही है आजकल टीवी पर चल रहे रियलिटी शोज की. इनमें डांस और गानों के शो की भरमार है. एक जमाना था, जब टीवी की दुनिया की बेताज बादशाह सास-बहुओं के माध्यम से लोगों पर इमोशनल अत्याचार कर रही थीं, आजकल ये रियलिटी शोज कर रहे हैं. और जिस तरह से ये लोग क्षेत्रीयता को बढ़ावा दे रहे हैं, वह राज ठाकरे की क्षेत्रीयता की भावना से कुछ कम नहीं है. यानी टीवी और फिल्मों के गढ़ मुंबई में रहनेवाले इन लोगों पर भी राज ठाकरे का पूरा-पूरा प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहा है.कोई माने या न माने, जिस तरह से वोट के नाम पर ये लोग क्षेत्रीयता को बढ़ावा दे रहे हैं, वह किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता. हाल ही में जी टीवी का सारेगामापा चैलेंज जीतनेवाली वैशाली की कहानी भी कुछ इसी तरह की है. मैं किसी भी तरह से वैशाली के टैलेंट पर कोई प्रश्न नहीं उठा रहा. पर सवाल उठता है कि जिस तरह से बार-बार वैशाली के गुरु हिमेश रेशमिया ने अपनी बातों से लोगों की भावनाएं भड़कायीं, क्या वह उचित था? फिर संगीत जैसे शो पर उसी प्रांत विशेष के नेताओं को लेकर स्थानीय प्रतिभागियों के लिए वोट की अपील करना, कहां तक न्यायसंगत है. जब पूरे देश ही नहीं विदेश की जनता शो देख रही है, तो वोट की अपील केवल महाराष्ट्र और बंगाल के लोगों से ही क्यों? क्यों नहीं कहा जाता कि भारत की वैशाली को जिताने के लिए वोट करें या भारत के सोमेन और तोरषा अच्छा गाते हैं, तो उन्हें जितायें. बार-बार बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब इत्यादि प्रदेशों के नाम लेकर क्या जताने चाहते हैं ये शोज के एंकर. टीआरपी की अंधी दौड़ में ये लोग क्यों भूल जाते हैं कि टीवी देख रही मासूम जनता पर इनकी बातों का कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. क्यों लोगों की भावनाएं भड़काने की बार-बार कोशिश की जाती है. और अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो क्यों न इस तरह के शोज पर प्रतिबंध लगा दिया जाये. जब राज ठाकरे बिहार-उत्तरप्रदेश के लोगों के खिलाफ कुछ बोलते हैं, तो उनके खिलाफ भावनाएं भड़काने का मुकदमा होता है, तो इन शोज के कर्ता-धर्ताओं के खिलाफ क्यों नहीं??? आखिर हम सब राज्य और क्षेत्रीयता की भावना से ऊपर उठ कर कब भारतीय बनेंगे. आजादी के इतने सालों बाद भी हम नहीं चेते, तो अनर्थ निश्चित है. तो अब टीवी के माध्यम से किये जा रहे इमोशनल अत्याचार पर कब लगेगी रोक

4 टिप्‍पणियां:

indianrj ने कहा…

आपकी बात से सौ प्रतिशत सहमत. टी वी के इन रियलिटी शोज़ में मात्र टैलेंट ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीयतावाद का भी बोलबाला है. इस पर रोक लगनी चाहिए क्योंकि अक्सर ऐसा होता है, फाइनल में कमतर उम्मीदवार जीत जाता है. कारण वोही ये फलां जगह का है तो वहां के लोगों का धर्म बनता है इसको जिताना.

Shamikh Faraz ने कहा…

aik acche article ke lie badai.

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चण्डीदत्त शुक्ल ने कहा…

शुक्ल जी. सब बाज़ार का खेल है. जहां इमोशन नहीं, बस मनी ही मैटर करती है, वहां तो सब कुछ बिकता ही है.

KK Yadav ने कहा…

Bahut sarthak sawak uthaya hai...badhai !!
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