बुधवार, 3 दिसंबर 2008

दीज...पॉलिटिशियंस...

जी हां, यही वे चंद शब्द हैं, जो २६-११ को मुंबई में हुए आतंकी हमलों के बाद उसी रात साढ़े तीन बजे ताज होटल से निकाले गये एक बुजुर्गवार ने व्यक्त किये. उनका पूरा वाक्य अंगरेजी में था. हिंदी में उसका मतलब निकलता है, हमारे पास अच्छे जवान, अच्छी सेना, बेहतर एनएसजी कमांडोज हैं, पर दीज बॉस्टर्ड पॉलिटिशियंस...कहीं न कहीं बुजुर्गवार के मुंह से निकले ये चंद शब्द भारतीय मानस की पीड़ा को दर्शा जाते हैं. आखिर कब तक भारतीय इसी तरह पिसते रहेंगे. आखिर कब तक लचर लोकतंत्र की कीमत हमें चुकानी पड़ेगी. जवाब ढूंढ़ने के लिए अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं है. जवाब हमारे अपने पास मौजूद है. हम तब तक इसी तरह पिसते रहेंगे, जब युवा शक्ति प्रबंधन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और अन्य क्षेत्रों की तरह राजनीति को भी करियर के रूप में नहीं चुनती. क्योंकि अब तक भारत पर सठियाए लोग ही राज करते रहे हैं. जिस उम्र में संन्यास लिया जाना चाहिए, उस उम्र में हमारे राजनीति दां प्रधानमंत्री बनने की चाह पालना शुरू करते हैं. ऐसा होने का एक कारण और भी है. भारत में कोई व्यक्ति जब राजनीति में कदम रखता है, तो भले ही युवा होता है, लेकिन शिखर पर पहुंचने में उसकी सारी उम्र बीत जाती है. सठियाने की उम्र में शिखर पर पहुंचा व्यक्ति अपने सपनों को पूरा करने में लग जाता है और देश चला जाता है रसातल की ओर. चीन जैसे रूढ़िवादी देश के नेता एक उम्र के बाद रिटायरमेंट की घोषणा कर देते हैं और युवाओं को आगे आने के लिए प्रेरित करते हैं. पड़ोसी के इस कदम की न तो हम सराहना करते हैं और न ही अनुकरण. यह जानते हुए भी कि शायद यह उन कारणों में से एक है, जिसके कारण चीन इतनी तेजी से प्रगति कर रहा है. फिर मुंबई में या देश के अलग-अलग हिस्सों में जो कुछ हो रहा है, उससे निबटने के लिए निष्चित तौर पर जोश और होश दोनों की जरूरत है. युवाओं को आगे लाकर हम जोश दिखा सकते हैं. रही होश की बात, तो उसके लिए नेपथ्य में रह कर बुजुर्ग नेता काम कर सकते हैं. पर उसके लिए जरूरत होगी देशप्रेम की भावना की. अपने सपनों को देश के सपनों के सामने कुर्बान करना होगा. तभी होगा एक सशक्त भारत का निर्माण...

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