मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

यह कथा है टीवी की, बीवी की, वोटों की नोटों की...

टीवी वाले भी जब भी मर्जी कुछ भी दिखाने लगते हैं. हाल के दिनों में टीवी चैनलों के टैलेंट हंट शोज ने मेरी रातों की नींद उड़ा दी है. क्या करें मामला टीवी और बीवी का जो ठहरा. रात में घर पहुंचे और न्यूज चैनल देखने की कोशिश करो, तो बीवी टीवी का रिमोट छीन कर उस चैनल पर लगा देती हैं, जिस पर आ रहा होता है टैलेंट हंट शो. यहां सबकुछ होता है, जो पहले सास-बहू छाप ड्रामों में हुआ करता था. रोना-गाना-नाचना और भी बहुत कुछ. एक प्रतिभागी का दूसरे से चल रहा चक्कर तो एंकर सबके बीच में बना हुआ घनचक्कर. फिर बारी आती है वोट मांगने की. नेताओं की तरह ये प्रतिभागी भी मुझ जैसी निरीह जनता से एसएमएस से वोट मांगते हैं. वे तो मांगते हैं वोट और मेरे मोबाइल के घटते हैं नोट. एक-एक वोट की लागत तीन रुपये से कम तो किसी भी हालत में नहीं होती. अब बीवी को कौन बताये कि मेरे मोबाइल से एक रुपये में एसटीडी कॉल हो सकती है, तो फिर एक एसएमएस के लिए तीन रुपये खर्च करने में जान निकल जाती है. पर क्या करें, जब आज तक बड़े-बड़े दिग्गज बीवी के खिलाफ मुंह नहीं खोल पाये, तो मेरी मजाल ही क्या है. खैर जो भी हो मेरी तो जेब ढीली हो ही रही है. कल मेरे एक मित्र पूछने लगे, आपको टैलेंट हंट शोज के बारे में इतनी जानकारी कैसे रहती है. अब मैं उन्हें क्या बताता कि रात भर टीवी पर यही सब देखना मेरी उन सजाओं में शामिल है, जो बीवी ने मेरे लिए तजबीज की होती है. बात कर रहे थे टैलेंट हंट शोज की. यहां भी किसी भी हालत में टैलेंट का हंट तो दिखायी नहीं देता. कुछ दिखता है, तो केवल नौटंकी. लगातार गिरते स्तर के बीच स्तरीय गायक बाहर होते जा रहे हैं औऱ स्तरहीन लोगों को वोट मिल रहे हैं. जय हो भारत की जनता की. शायद इसे लगता है कि वोटों का अधिकार केवल स्तरहीन लोगों का होता है. आज तक एक भी ईमानदार नेता चुनाव में जीता है, जो एक भी बढ़िया गायक टैलेंट हंट शो में जीत दर्ज करा सके. एक शो आता है इंडियन आइडल-४. पिछले तीन हफ्तों में लगातार तीन लड़कियों बनारस की अनन्या मिश्रा, दिल्ली की तुलिका गांगुली और ग्वालियर की शीनी कलविंत को जनता ने वोट आउट कर उनके शहर लौटा दिया. ठीक है भाई इन लड़कियों में टैलेंट जो था. फिर हम लोगों को टैलेंट की जरूरत थोड़े है. हमें तो नौटंकी की जरूरत है. जो बाकी बचे हैं, उनमें से टैलेंटेड लोग धीरे-धीरे निकलते जायेंगे और नौटंकीबाज की चांदी रहेगी. और अंत में जीतेगा सबसे बड़ा नौटंकीबाज ही. दूसरी बात, इंडियन आइडल के निर्णायकों की एक तमन्ना पिछले चार सालों से पूरी नहीं हो रही है. वे चाहते हैं कि कोई लड़की इंडियन आइडल का खिताब जीते. अब हम आपको क्या बतायें सोनाली जी, अनु जी, कैलाश जी और जावेद साहब. यह हमारा देश है. सोनाली जी ठीक कहती हैं हम अब भी नहीं बदले. भला लड़कियों को हम ऊंचे मुकाम तक कैसे जाने दे सकते हैं. आज तक ऐसा कभी हमने होने दिया है, जो आज होने देंगे. किरण बेदी को हमने दिल्ली का पुलिस कमिश्नर नहीं बनने दिया, भले ही वह टैलेंटेड और सीनियर थीं. तो फिर इन लड़कियों की क्या मजाल जो इंडियन आइडल बन पायें. सो सोनाली जी अपने सपने को सपने में ही पूरा होते देखिये. हकीकत दूर की बात है.

बुधवार, 3 दिसंबर 2008

दीज...पॉलिटिशियंस...

जी हां, यही वे चंद शब्द हैं, जो २६-११ को मुंबई में हुए आतंकी हमलों के बाद उसी रात साढ़े तीन बजे ताज होटल से निकाले गये एक बुजुर्गवार ने व्यक्त किये. उनका पूरा वाक्य अंगरेजी में था. हिंदी में उसका मतलब निकलता है, हमारे पास अच्छे जवान, अच्छी सेना, बेहतर एनएसजी कमांडोज हैं, पर दीज बॉस्टर्ड पॉलिटिशियंस...कहीं न कहीं बुजुर्गवार के मुंह से निकले ये चंद शब्द भारतीय मानस की पीड़ा को दर्शा जाते हैं. आखिर कब तक भारतीय इसी तरह पिसते रहेंगे. आखिर कब तक लचर लोकतंत्र की कीमत हमें चुकानी पड़ेगी. जवाब ढूंढ़ने के लिए अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं है. जवाब हमारे अपने पास मौजूद है. हम तब तक इसी तरह पिसते रहेंगे, जब युवा शक्ति प्रबंधन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और अन्य क्षेत्रों की तरह राजनीति को भी करियर के रूप में नहीं चुनती. क्योंकि अब तक भारत पर सठियाए लोग ही राज करते रहे हैं. जिस उम्र में संन्यास लिया जाना चाहिए, उस उम्र में हमारे राजनीति दां प्रधानमंत्री बनने की चाह पालना शुरू करते हैं. ऐसा होने का एक कारण और भी है. भारत में कोई व्यक्ति जब राजनीति में कदम रखता है, तो भले ही युवा होता है, लेकिन शिखर पर पहुंचने में उसकी सारी उम्र बीत जाती है. सठियाने की उम्र में शिखर पर पहुंचा व्यक्ति अपने सपनों को पूरा करने में लग जाता है और देश चला जाता है रसातल की ओर. चीन जैसे रूढ़िवादी देश के नेता एक उम्र के बाद रिटायरमेंट की घोषणा कर देते हैं और युवाओं को आगे आने के लिए प्रेरित करते हैं. पड़ोसी के इस कदम की न तो हम सराहना करते हैं और न ही अनुकरण. यह जानते हुए भी कि शायद यह उन कारणों में से एक है, जिसके कारण चीन इतनी तेजी से प्रगति कर रहा है. फिर मुंबई में या देश के अलग-अलग हिस्सों में जो कुछ हो रहा है, उससे निबटने के लिए निष्चित तौर पर जोश और होश दोनों की जरूरत है. युवाओं को आगे लाकर हम जोश दिखा सकते हैं. रही होश की बात, तो उसके लिए नेपथ्य में रह कर बुजुर्ग नेता काम कर सकते हैं. पर उसके लिए जरूरत होगी देशप्रेम की भावना की. अपने सपनों को देश के सपनों के सामने कुर्बान करना होगा. तभी होगा एक सशक्त भारत का निर्माण...