मंगलवार, 22 जुलाई 2008

चलो नेता बनें

नेता तरह-तरह के होते हैं. कुछ छोटे, कुछ बड़े, तो कुछ सिर्फ नेता होते हैं. वे क्यों होते हैं, क्या करते हैं, इसका कुछ पता नहीं. वे बस होते हैं. कुछ केवल नाम के होते हैं. जैसे हर गांव में (विशेषकर उत्तरप्रदेश और बिहार के गावों में कई सारे थानेदार, जिलेदार, हवलदार, तालुकरदार केवल नाम के होते हैं) वे ही कुछ नेता होते हैं, बस नाम के. मेरे गांव में (उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले के एक गांव, नाम-सिसवा) भी ऐसे तमाम नेता हैं. कुछ की बानगी पेश है ः आग्याराम नेता. इनका काम एक जमाने में सरकार के हर फैसले के खिलाफ गांव से तीन किलोमीटर दूर झिलाही बाजार की रेलवे क्रासिंग के किनारे अनशन पर बैठना था. खुद को विनोबा भावे का शिष्य मानते हैं और अब गांव में एक गौशाला बना लिये हैं. सरकारी और व्यक्तिगत स्तर पर काफी मदद मिली और ३० लाख रुयये लगभग हाथ में आये. अब सरकार के किसी फैसले पर इन्हें ऐतराज नहीं होता. आराम से ५ लाख रुपये से बनी इमारत में रहते हैं. जेनरेटर, मोबाइल, फोन, टीवी और पीने के लिए गायों का दूध व खाने के लिए चारा. अब बात करते हैं आदित्य नेता की. पूरा नाम आदित्य प्रसाद शुक्ल पुत्र स्व तिलकराम शुक्ल. काम ः उत्तरप्रदेश पुलिस में होमगाडॆ. एक जमाने में गालियां देने और लोगों के सुख-दुख में काम आने के लिए (विशेषकर जिस घर में कुछ खूबसूरत लोग हों) मशहूर थे, आजकल लोगों की बुराई करने का ठेका लेते हैं. इधर की उधर करना फुट कर काम है. एक और हैं, जिनका नाम ही नेता है (असली नाम मुझे भी नहीं पता). यह सबसे अच्छे हैं. गांव में कम पाये जाते हैं. लुधियाना के किसी सिनेमा हाल में काम करते हैं और परिवार का भरण-पोषण में लगे हैं. है न अच्छी बात. काम का काम और फिल्मों की फिल्में. किसी तरह की चांय-भांय नहीं. एक हमारे पड़ोसी हैं राममणि नेता. किसी जमाने में रुपया कमाने दिल्ली गये थे. जमींदार के पोते थे, सो चाकरी कैसे करते. गांव लौटे, गन्ना विभाग में साइकिलिस्ट हो गये और आजीवन बने रहे. आजकल रिटायर हैं इसलिए खाली हैं. खाली हैं, तो कुछ करना चाहिए. करते हैं. शाम को बाजार जरूर जाते हैं. वहां अच्छी-अच्छी बातें, राजनीति की बातें, पड़ोस की बातें, गांव की बातें ....चाय और समोसे के साथ ढेर सारी बातें करते हैं. ऐसे कई और नेता हैं मेरे गांव में. पर आज संसद में जो कुछ हुआ, वह देख कर गांव के नेताओं पर अंगुली उठाने की हिम्मत नहीं रही. पता नहीं कब, कौन गांव की जमीन बेच कर रुपया इकट्ठा कर ले और भरे बाजार ले जाकर कहे कि मैंने उसे दिये थे, प्रधान के पक्ष या खिलाफ वोट देने के लिए. तो भैया आज मैं बाल-बाल बचा, जो तीन-चार नेताओं तक ही पहुंचा. हालांकि फायदा बहुत है नेतागीरी में. डॉ रूपेश भैया ने आलोक की एक पोस्ट पर कमेंट दिया है कि भड़ासियों को पॉलिटिकल पार्टी बना लेनी चाहिए. मैं पहले तो सोचता था कि नेता भ्रष्ट होते हैं, पर आज पता चला नहीं उनके पास बहुत पैसा होता है. इतना कि देश की अंतरात्मा संसद तक में लहरा सकें. औऱ शर्म तो इन्हें आती ही नहीं. तो भाई हम भड़ासी भी तो बेशर्म टाइप के लोग हैं. क्यों रोज संपादक जी की झिड़की खायें, अब उठिये, चलिये, एक पोलिटिकल पार्टी बनायें...

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