मंगलवार, 24 जून 2008

मां रोती क्यों है

उत्तरप्रदेश के अधिकांश हिस्सों में एक प्रथा है. शादी के लिए बेटे की बारात बिदा करते समय,हर मां आखिरी बार बेटे को दूध पिलाती है.उस दौरान अधिकतर मांओं को मैंने रोते हुए देखा है. मेरी मां ने भी शादी के समय मुझे दूध पिलाया था. मैंने देखा कि उसकी आंखें नम थीं. इसका कारण आज तक ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा हूं.हर मां अपने बेटे को दूल्हा बने देखना चाहती है. उसकी खुशियां चाहती है. संतान को जरा सी तकलीफ होने पर रोने लगती है. उसकी खुशी के लिए कुछ भी करने के लिए हर समय तैयार रहती है. पर जब बेटा जवान होकर दुल्हनियां लाने चलता है, तो मां रोती क्यों है? क्या इसलिए कि उस दिन उसका बेटा पराया हो जाता है. या फिर इसलिए कि उस दिन मां सबसे अधिक खुश होती है. या फिर इसलिए कि वह यह सोचती है कि जो बेटा कल तक उसकी गोद में खेलता था, कितनी जल्दी बड़ा हो गया. कारण जो भी हो, मां आखिर रोती क्यों है???????????????

शनिवार, 21 जून 2008

प्रभात खबर के मुख्य संपादक को पहला सप्रे अवार्ड

शनिवार को भोपाल में एक कार्यक्रम आयोजित कर प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंशजी को पहले माधवराव सप्रे अवार्ड से सम्मानित किया गया. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें २१ हजार रुपये, श्रीफल व स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया. मौके पर मीडिया के कई दिग्गज व मध्यप्रदेश सरकार के तमाम मंत्री भी उपस्थित थे. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि स्वस्थ आलोचना की भूमिका में मीडिया मित्र है.

बुधवार, 18 जून 2008

मीडिया आंदोलन नहीं करता

इस समय जिस अखबार में मैं काम करता हूं, उसका नारा है अखबार नहीं आंदोलन. सवाल इस नारे पर नहीं है. सवाल मन में भी नहीं है. सवाल उठा था उस दिन जब कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद में एक समारोह के दौरान प्रभात खबर के मुख्य संपादक हरिवंशजी ने कहा कि अखबार आंदोलन नहीं करते. उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया था कि हमारे अखबार का नारा ही अखबार नहीं आंदोलन नहीं है,पर आज अखबार आंदोलन नहीं करते. अधिक गहराई में न जाते हुए उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि अगर दो खबरें हों और आज की तारीख में एक को चुननी हों, तो मन साहित्य या बदलाव की खबर को चुनेगा, लेकिन दिमाग चुनेगा करीना कपूर (या शायद उन्होंने किसी और अभिनेत्री का नाम लिया था) की खबर को. आज अचानक इस विषय पर मन में कुछ भाव जाग्रत हुए, पर क्यों यह पता नहीं. शायद इसलिए कि अनिलजी (अनिल यादव जी, लखनऊ वाले) के ब्लॉग पर एसपी सिंह की बातें पढ़ने को मिलीं इसलिए या शायद तीन-चार सालों से मन में बहुत कुछ चल रहा था, वह सब बाहर आने को तैयार है. पत्रकारिता में आया था, तो धन कमाने की कोई लालसा नहीं थी. कभी धन को लेकर कोई विवाद भी नहीं हुआ. यशवंतजी इस बात के गवाह हैं कि किस तरह एक सब-एडीटर बिना किसी ना-नुकुर के लिए जूनियर सब-एडीटर के रूप में काम करने को तैयार हो जाता है. लालसा केवल एक कि नये जेनरेशन के अखबार में काम करने को मिलेगा. हां, तो बात कर रहा था आंदोलन की. सवाल वही है, क्या अखबार (आज की बात करें, तो मीडिया) आंदोलन कर सकता है. समाज को बदल सकता है. जवाब शायद नहीं ही होगा, पर हम मीडिया से जुड़े लोग इस बात को मानें भी तो कैसे. आखिर समाज को कुछ तो जताना होगा कि हमारा अस्तित्व किस लिए है. नये संस्करणों की आपाधापी, खबरों न छूटने का दबाव, अच्छे से संपादित खबरें, बढ़िया लेआउट, फोटो.............और जाने क्या-क्या. इसी बीच सैलरी...फलाना अखबार बढ़िया सैलरी दे रहा है, कूद पड़ो मैदान में, दूसरा न्यूज एडीटर को लैपटॉप दे रहा है, लपक लो, युवाओं को फलां जगह बेहतर मौके मिल रहे हैं, दौड़ो....इत्यादि.....अब भइया मेरे आंदोलन हो तो कैसे. बुद्धिजीवी तो हम रह नहीं गये...माने बुद्धि की तो खाते ही नहीं. बुद्धि की तब खाते थे, जब खबरें कम, विचार ज्यादा पनपते थे मन में. खबर काटने-छांटने में सारी रात मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी. कुछ पढ़ते-लिखते थे. योग्य होते थे. आज योग्यता के मायने बदल गये हैं. (हिंदी अखबारों में काम कर रहे हैं, तो)हिंदी थोड़ी सी ठीक हो, पेज बनाना (जितनी जल्दी हो सके) जानते हों और सेटिंग आती हो.....तो अब मीडिया वास्तव में एक प्रोफेशन बन गया है???????????????????????????????