रविवार, 13 अप्रैल 2008

सपना

सपना देखा करता था

जब छोटा था, सच्चा था

सपना देखा करता था

जब पढ़ता था, बच्चा था

सपने होते थे अजीबोगरीब

देश के विकास के

भ्रष्टाचार के विनाश के

नेताओं के सुधार के

और सपने होते थे

गांवों के विकास के

आजादी के, इतिहास के

सपने होते थे

गांधी के अरमानों के

भगत जैसे कुरबानों के

सपने होते थे

रानी झांसी मर्दाना के

और सपने होते थे

प्यार के, मुहब्बत के

भाईचारे के और और...और...और

सपने होते थे......

सारे सपने, सपने ही रह गये

भला खुली आंखों से देखा

सपना भी कभी पूरा हुआ

गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

सपने साकार होंगे

धर्मेंद्र भइया ने नया ब्लॉग बनाया, उसके लिए बधाई. नाम भी बड़ा अच्छा रखा है, सपने. बचपन से आज तक इन्होंने कई सपने देखे होंगे. यह उस तरह के लोगों में हैं, जो अपने सपनों को साकार करना जानते हैं. या यूं कहें कि इनमें वह माद्दा है कि अपने सपनों को साकार कर सकें. एक जूनियर के रूप में इनके साथ काम करते हुए बहुत कुछ सीखने का मौका मिला. उनमें एक चीज जो सबसे बढ़िया सीखी, वह यह कि कभी काम और सच के साथ समझौता नहीं करते. शायद यही कारण है कि उनके सपने साकार होते रहते हैं. सुख हो या दुख काम तो काम है. ब्लॉग के माध्यम से हमें और भी बहुत कुछ सिखाते रहेंगे. इसी कामना के साथ अभी बस इतना ही, आगे और भी...