गुरुवार, 6 मार्च 2008

काम का आदमी

मन में बहुत कुछ है, पर लिखूं क्या यही समझ में नहीं आ रहा. दिल कहता है कि जीवन जैसे चल रहा है,चलने दो. दिमाग कहता है कि नहीं, फलाने तुम्हारे बाद इस लाइन में आया और आगे बढ़ गया और तुम वहीं के वहीं बैठे हो. आखिर कब तक समझौते पर समझौता करते जाओगे. और एक हम हैं कि काम से समझौता नहीं करते, करते हैं, तो दाम से. किसी ने कहा हम अभी इतना ही दे पायेंगे, तो सोचा चलो बाद में परफार्मेंस देखने के बाद सबकुछ ठीक हो जायेगा. पर नहीं होता है वही ढाक के तीन पात. कहीं कुछ नहीं. कोई तरक्की नहीं, परफार्मेंस को देखनेवाला कोई नहीं. लोगों (बॉस) को शायद लगता है कि इसके बारे में क्या सोचना, यह तो बेवकूफ है ही, जो भी दोगे ले लेगा और कुछ नहीं बोलेगा. और जब कम पैसे में काबिल (अपने आप को कह रहा हूं, अन्यथा न लें) आदमी मिल जाये, तो अधिक दाम देने की जरूरत ही क्या है. दो बार नौकरी बदली और दोनों बार यही अनुभव हुआ. कहीं सैलरी स्लिप न होने की सजा मिली, तो कहीं संबंधों की भेंट चढ़ गया. ऐसे और कितने दिन बिताओगे शुक्लाजी. बीवी मोबाइल मांग रही है, पर लायें कहां से जेब में तो किराया भी नहीं बचा. महीने का आखिर है, किसी तरह काम चल रहा है. खुद के पास भी एक महीने से मोबाइल नहीं है. एक समय था, जब घर में सबसे नया मोबाइल मेरे पास होता था. मां-बाप के पैसे को निर्दयतापूर्वक उड़ाता था, आज स्थितियां विकट हैं. एक-एक सिक्का खचॆ करने के पहले सोचना पड़ता है. उस पर तुर्रा यह कि अप्रैल के पहले हफ्ते या मई में बाप बननेवाला हूं. अस्पताल का खर्चा, फिर फंक्शन और जाने क्या-क्या. कम से कम ५० हजार रुपये चाहिए. हालांकि घर की बात करें, तो ऐसी कोई परेशानी नहीं है. पर अपना भी तो कुछ फर्ज बनता है. ६५ साल के पिताजी आज भी साल में छह महीने टूर पर रहते हैं, आखिर किसके लिए, हमारे लिए ही तो. और एक हम हैं कि उन्हें आजतक एक मोजा भी अपने पैसे से खरीद कर नहीं दिया. लानत है ऐसी नौकरी और बिना मतलब की ऐंठन पर. जिस तरह से सब नौकरी कर रहे हैं, मैं भी करता तो अब तक सब ठीक होता. मैं भी किसी ऊंची कुर्सी पर बैठ कर लंबा वेतन ऐंठ रहा होता, पर अपनी ही ऐंठन में मारा गया कि काम से समझौता नहीं करूंगा. लड़ जाता हूं, बॉस से सीनियर से या फिर जूनियर से कि अगर कोई काम बेहतर हो सकता था, तो हुआ क्यों नहीं. सब पागल समझते हैं, फिर भी कहते हैं काम का आदमी है. बस, काम का आदमी बन कर रह गया हूं.

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