मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

यह कथा है टीवी की, बीवी की, वोटों की नोटों की...

टीवी वाले भी जब भी मर्जी कुछ भी दिखाने लगते हैं. हाल के दिनों में टीवी चैनलों के टैलेंट हंट शोज ने मेरी रातों की नींद उड़ा दी है. क्या करें मामला टीवी और बीवी का जो ठहरा. रात में घर पहुंचे और न्यूज चैनल देखने की कोशिश करो, तो बीवी टीवी का रिमोट छीन कर उस चैनल पर लगा देती हैं, जिस पर आ रहा होता है टैलेंट हंट शो. यहां सबकुछ होता है, जो पहले सास-बहू छाप ड्रामों में हुआ करता था. रोना-गाना-नाचना और भी बहुत कुछ. एक प्रतिभागी का दूसरे से चल रहा चक्कर तो एंकर सबके बीच में बना हुआ घनचक्कर. फिर बारी आती है वोट मांगने की. नेताओं की तरह ये प्रतिभागी भी मुझ जैसी निरीह जनता से एसएमएस से वोट मांगते हैं. वे तो मांगते हैं वोट और मेरे मोबाइल के घटते हैं नोट. एक-एक वोट की लागत तीन रुपये से कम तो किसी भी हालत में नहीं होती. अब बीवी को कौन बताये कि मेरे मोबाइल से एक रुपये में एसटीडी कॉल हो सकती है, तो फिर एक एसएमएस के लिए तीन रुपये खर्च करने में जान निकल जाती है. पर क्या करें, जब आज तक बड़े-बड़े दिग्गज बीवी के खिलाफ मुंह नहीं खोल पाये, तो मेरी मजाल ही क्या है. खैर जो भी हो मेरी तो जेब ढीली हो ही रही है. कल मेरे एक मित्र पूछने लगे, आपको टैलेंट हंट शोज के बारे में इतनी जानकारी कैसे रहती है. अब मैं उन्हें क्या बताता कि रात भर टीवी पर यही सब देखना मेरी उन सजाओं में शामिल है, जो बीवी ने मेरे लिए तजबीज की होती है. बात कर रहे थे टैलेंट हंट शोज की. यहां भी किसी भी हालत में टैलेंट का हंट तो दिखायी नहीं देता. कुछ दिखता है, तो केवल नौटंकी. लगातार गिरते स्तर के बीच स्तरीय गायक बाहर होते जा रहे हैं औऱ स्तरहीन लोगों को वोट मिल रहे हैं. जय हो भारत की जनता की. शायद इसे लगता है कि वोटों का अधिकार केवल स्तरहीन लोगों का होता है. आज तक एक भी ईमानदार नेता चुनाव में जीता है, जो एक भी बढ़िया गायक टैलेंट हंट शो में जीत दर्ज करा सके. एक शो आता है इंडियन आइडल-४. पिछले तीन हफ्तों में लगातार तीन लड़कियों बनारस की अनन्या मिश्रा, दिल्ली की तुलिका गांगुली और ग्वालियर की शीनी कलविंत को जनता ने वोट आउट कर उनके शहर लौटा दिया. ठीक है भाई इन लड़कियों में टैलेंट जो था. फिर हम लोगों को टैलेंट की जरूरत थोड़े है. हमें तो नौटंकी की जरूरत है. जो बाकी बचे हैं, उनमें से टैलेंटेड लोग धीरे-धीरे निकलते जायेंगे और नौटंकीबाज की चांदी रहेगी. और अंत में जीतेगा सबसे बड़ा नौटंकीबाज ही. दूसरी बात, इंडियन आइडल के निर्णायकों की एक तमन्ना पिछले चार सालों से पूरी नहीं हो रही है. वे चाहते हैं कि कोई लड़की इंडियन आइडल का खिताब जीते. अब हम आपको क्या बतायें सोनाली जी, अनु जी, कैलाश जी और जावेद साहब. यह हमारा देश है. सोनाली जी ठीक कहती हैं हम अब भी नहीं बदले. भला लड़कियों को हम ऊंचे मुकाम तक कैसे जाने दे सकते हैं. आज तक ऐसा कभी हमने होने दिया है, जो आज होने देंगे. किरण बेदी को हमने दिल्ली का पुलिस कमिश्नर नहीं बनने दिया, भले ही वह टैलेंटेड और सीनियर थीं. तो फिर इन लड़कियों की क्या मजाल जो इंडियन आइडल बन पायें. सो सोनाली जी अपने सपने को सपने में ही पूरा होते देखिये. हकीकत दूर की बात है.

बुधवार, 3 दिसंबर 2008

दीज...पॉलिटिशियंस...

जी हां, यही वे चंद शब्द हैं, जो २६-११ को मुंबई में हुए आतंकी हमलों के बाद उसी रात साढ़े तीन बजे ताज होटल से निकाले गये एक बुजुर्गवार ने व्यक्त किये. उनका पूरा वाक्य अंगरेजी में था. हिंदी में उसका मतलब निकलता है, हमारे पास अच्छे जवान, अच्छी सेना, बेहतर एनएसजी कमांडोज हैं, पर दीज बॉस्टर्ड पॉलिटिशियंस...कहीं न कहीं बुजुर्गवार के मुंह से निकले ये चंद शब्द भारतीय मानस की पीड़ा को दर्शा जाते हैं. आखिर कब तक भारतीय इसी तरह पिसते रहेंगे. आखिर कब तक लचर लोकतंत्र की कीमत हमें चुकानी पड़ेगी. जवाब ढूंढ़ने के लिए अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं है. जवाब हमारे अपने पास मौजूद है. हम तब तक इसी तरह पिसते रहेंगे, जब युवा शक्ति प्रबंधन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और अन्य क्षेत्रों की तरह राजनीति को भी करियर के रूप में नहीं चुनती. क्योंकि अब तक भारत पर सठियाए लोग ही राज करते रहे हैं. जिस उम्र में संन्यास लिया जाना चाहिए, उस उम्र में हमारे राजनीति दां प्रधानमंत्री बनने की चाह पालना शुरू करते हैं. ऐसा होने का एक कारण और भी है. भारत में कोई व्यक्ति जब राजनीति में कदम रखता है, तो भले ही युवा होता है, लेकिन शिखर पर पहुंचने में उसकी सारी उम्र बीत जाती है. सठियाने की उम्र में शिखर पर पहुंचा व्यक्ति अपने सपनों को पूरा करने में लग जाता है और देश चला जाता है रसातल की ओर. चीन जैसे रूढ़िवादी देश के नेता एक उम्र के बाद रिटायरमेंट की घोषणा कर देते हैं और युवाओं को आगे आने के लिए प्रेरित करते हैं. पड़ोसी के इस कदम की न तो हम सराहना करते हैं और न ही अनुकरण. यह जानते हुए भी कि शायद यह उन कारणों में से एक है, जिसके कारण चीन इतनी तेजी से प्रगति कर रहा है. फिर मुंबई में या देश के अलग-अलग हिस्सों में जो कुछ हो रहा है, उससे निबटने के लिए निष्चित तौर पर जोश और होश दोनों की जरूरत है. युवाओं को आगे लाकर हम जोश दिखा सकते हैं. रही होश की बात, तो उसके लिए नेपथ्य में रह कर बुजुर्ग नेता काम कर सकते हैं. पर उसके लिए जरूरत होगी देशप्रेम की भावना की. अपने सपनों को देश के सपनों के सामने कुर्बान करना होगा. तभी होगा एक सशक्त भारत का निर्माण...

मंगलवार, 22 जुलाई 2008

चलो नेता बनें

नेता तरह-तरह के होते हैं. कुछ छोटे, कुछ बड़े, तो कुछ सिर्फ नेता होते हैं. वे क्यों होते हैं, क्या करते हैं, इसका कुछ पता नहीं. वे बस होते हैं. कुछ केवल नाम के होते हैं. जैसे हर गांव में (विशेषकर उत्तरप्रदेश और बिहार के गावों में कई सारे थानेदार, जिलेदार, हवलदार, तालुकरदार केवल नाम के होते हैं) वे ही कुछ नेता होते हैं, बस नाम के. मेरे गांव में (उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले के एक गांव, नाम-सिसवा) भी ऐसे तमाम नेता हैं. कुछ की बानगी पेश है ः आग्याराम नेता. इनका काम एक जमाने में सरकार के हर फैसले के खिलाफ गांव से तीन किलोमीटर दूर झिलाही बाजार की रेलवे क्रासिंग के किनारे अनशन पर बैठना था. खुद को विनोबा भावे का शिष्य मानते हैं और अब गांव में एक गौशाला बना लिये हैं. सरकारी और व्यक्तिगत स्तर पर काफी मदद मिली और ३० लाख रुयये लगभग हाथ में आये. अब सरकार के किसी फैसले पर इन्हें ऐतराज नहीं होता. आराम से ५ लाख रुपये से बनी इमारत में रहते हैं. जेनरेटर, मोबाइल, फोन, टीवी और पीने के लिए गायों का दूध व खाने के लिए चारा. अब बात करते हैं आदित्य नेता की. पूरा नाम आदित्य प्रसाद शुक्ल पुत्र स्व तिलकराम शुक्ल. काम ः उत्तरप्रदेश पुलिस में होमगाडॆ. एक जमाने में गालियां देने और लोगों के सुख-दुख में काम आने के लिए (विशेषकर जिस घर में कुछ खूबसूरत लोग हों) मशहूर थे, आजकल लोगों की बुराई करने का ठेका लेते हैं. इधर की उधर करना फुट कर काम है. एक और हैं, जिनका नाम ही नेता है (असली नाम मुझे भी नहीं पता). यह सबसे अच्छे हैं. गांव में कम पाये जाते हैं. लुधियाना के किसी सिनेमा हाल में काम करते हैं और परिवार का भरण-पोषण में लगे हैं. है न अच्छी बात. काम का काम और फिल्मों की फिल्में. किसी तरह की चांय-भांय नहीं. एक हमारे पड़ोसी हैं राममणि नेता. किसी जमाने में रुपया कमाने दिल्ली गये थे. जमींदार के पोते थे, सो चाकरी कैसे करते. गांव लौटे, गन्ना विभाग में साइकिलिस्ट हो गये और आजीवन बने रहे. आजकल रिटायर हैं इसलिए खाली हैं. खाली हैं, तो कुछ करना चाहिए. करते हैं. शाम को बाजार जरूर जाते हैं. वहां अच्छी-अच्छी बातें, राजनीति की बातें, पड़ोस की बातें, गांव की बातें ....चाय और समोसे के साथ ढेर सारी बातें करते हैं. ऐसे कई और नेता हैं मेरे गांव में. पर आज संसद में जो कुछ हुआ, वह देख कर गांव के नेताओं पर अंगुली उठाने की हिम्मत नहीं रही. पता नहीं कब, कौन गांव की जमीन बेच कर रुपया इकट्ठा कर ले और भरे बाजार ले जाकर कहे कि मैंने उसे दिये थे, प्रधान के पक्ष या खिलाफ वोट देने के लिए. तो भैया आज मैं बाल-बाल बचा, जो तीन-चार नेताओं तक ही पहुंचा. हालांकि फायदा बहुत है नेतागीरी में. डॉ रूपेश भैया ने आलोक की एक पोस्ट पर कमेंट दिया है कि भड़ासियों को पॉलिटिकल पार्टी बना लेनी चाहिए. मैं पहले तो सोचता था कि नेता भ्रष्ट होते हैं, पर आज पता चला नहीं उनके पास बहुत पैसा होता है. इतना कि देश की अंतरात्मा संसद तक में लहरा सकें. औऱ शर्म तो इन्हें आती ही नहीं. तो भाई हम भड़ासी भी तो बेशर्म टाइप के लोग हैं. क्यों रोज संपादक जी की झिड़की खायें, अब उठिये, चलिये, एक पोलिटिकल पार्टी बनायें...

रविवार, 20 जुलाई 2008

वे दो रास्ते

घर से दफ्तर आने के दो रास्ते हैं. एक रास्ते का प्रयोग रोज करता हूं. दूसरे रास्ते का प्रयोग केवल रविवार को. जिस बस से रोज कार्यालय आता हूं, वह रविवार को बंद रहती है. दूसरी बस दूसरे रास्ते से आती है. आइये पहले पहले रास्ते की बात करें. पहले रास्ते पर एक फ्लाईओवर पड़ता है. फ्लाईओवर के नीचे से बस आती है. फ्लाईओवर के नीचे दूसरी ओर अन्य बड़े शहरों (लोग कहते हैं, पर कलकत्ता बड़ा शहर बन रहा है, अभी नहीं है) की तरह कुछ लोग रहते हैं. प्लास्टिक की चादरें तान कर बड़े बिंदास अंदाज में सोते दिखते हैं उन घरों के अधिकतर पुरुष. शायद निगम के पानी आपूर्ति के समय की बदौलत जिस समय मेरी बस वहां से गुजरती है, उसी समय वहां लगे नल पर बड़ी संख्या में उन प्लास्टिक के घरों में रहनेवाली कुछ महिलाएं और लड़कियां नहा रही होती हैं. हालांकि वे काफी कोशिश करती हैं कि शरीर का अधिकांश हिस्सा ढका रहे, पर ... पहले मेरी दिलचस्पी उन महिलाओं और लड़कियों में हुआ करती थी. आजकल बस के यात्रियों पर नजर रहती है. देखता हूं कि जैसे कभी मैं उन महिलाओं को घूर-घूर कर ताका करता था, वैसे ही बस के अधिकतर पुरुष यात्री ताकते हैं. बस में सवार महिला यात्री एक बार उधर नजर डालती हैं और फिर नाक-भौं सिकोड़ कर कहीं और देखने लगती हैं.आइये अब बात करें दूसरे रास्ते की. जो लोग दिल्ली के रोज गार्डेन के बारे में जानते हैं, उन्हें कलकत्ता के विक्टोरिया मेमोरियल की बाबत बताने की जरूरत नहीं. कभी महारानी विक्टोरिया के स्वागत के लिए बनायी गयी इस इमारत का पार्क अब प्रेमी जोड़ों के मिलन का या यूं कहें थोड़ी-बहुत शारीरिक गरमी (रोज गार्डेन की स्थिति और दयनीय है, विशेषकर शाम को) दूर करने का अड्डा बन गया है. हां, तो रविवार को मेरी बस उसी विक्टोरिया पार्क के किनारे से गुजरती है. आज देखता हूं कि एकदम सड़क के किनारे पार्क में लगे एक वृक्ष और बाउंड्री के बीच एक जोड़ा खड़ा है. लड़का सड़क की ओर देख कर हिचक रहा था और लड़की उससे सटी जा रही थी..........और बहुत कुछ. बस........

मंगलवार, 24 जून 2008

मां रोती क्यों है

उत्तरप्रदेश के अधिकांश हिस्सों में एक प्रथा है. शादी के लिए बेटे की बारात बिदा करते समय,हर मां आखिरी बार बेटे को दूध पिलाती है.उस दौरान अधिकतर मांओं को मैंने रोते हुए देखा है. मेरी मां ने भी शादी के समय मुझे दूध पिलाया था. मैंने देखा कि उसकी आंखें नम थीं. इसका कारण आज तक ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा हूं.हर मां अपने बेटे को दूल्हा बने देखना चाहती है. उसकी खुशियां चाहती है. संतान को जरा सी तकलीफ होने पर रोने लगती है. उसकी खुशी के लिए कुछ भी करने के लिए हर समय तैयार रहती है. पर जब बेटा जवान होकर दुल्हनियां लाने चलता है, तो मां रोती क्यों है? क्या इसलिए कि उस दिन उसका बेटा पराया हो जाता है. या फिर इसलिए कि उस दिन मां सबसे अधिक खुश होती है. या फिर इसलिए कि वह यह सोचती है कि जो बेटा कल तक उसकी गोद में खेलता था, कितनी जल्दी बड़ा हो गया. कारण जो भी हो, मां आखिर रोती क्यों है???????????????

शनिवार, 21 जून 2008

प्रभात खबर के मुख्य संपादक को पहला सप्रे अवार्ड

शनिवार को भोपाल में एक कार्यक्रम आयोजित कर प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंशजी को पहले माधवराव सप्रे अवार्ड से सम्मानित किया गया. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें २१ हजार रुपये, श्रीफल व स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया. मौके पर मीडिया के कई दिग्गज व मध्यप्रदेश सरकार के तमाम मंत्री भी उपस्थित थे. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि स्वस्थ आलोचना की भूमिका में मीडिया मित्र है.

बुधवार, 18 जून 2008

मीडिया आंदोलन नहीं करता

इस समय जिस अखबार में मैं काम करता हूं, उसका नारा है अखबार नहीं आंदोलन. सवाल इस नारे पर नहीं है. सवाल मन में भी नहीं है. सवाल उठा था उस दिन जब कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद में एक समारोह के दौरान प्रभात खबर के मुख्य संपादक हरिवंशजी ने कहा कि अखबार आंदोलन नहीं करते. उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया था कि हमारे अखबार का नारा ही अखबार नहीं आंदोलन नहीं है,पर आज अखबार आंदोलन नहीं करते. अधिक गहराई में न जाते हुए उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि अगर दो खबरें हों और आज की तारीख में एक को चुननी हों, तो मन साहित्य या बदलाव की खबर को चुनेगा, लेकिन दिमाग चुनेगा करीना कपूर (या शायद उन्होंने किसी और अभिनेत्री का नाम लिया था) की खबर को. आज अचानक इस विषय पर मन में कुछ भाव जाग्रत हुए, पर क्यों यह पता नहीं. शायद इसलिए कि अनिलजी (अनिल यादव जी, लखनऊ वाले) के ब्लॉग पर एसपी सिंह की बातें पढ़ने को मिलीं इसलिए या शायद तीन-चार सालों से मन में बहुत कुछ चल रहा था, वह सब बाहर आने को तैयार है. पत्रकारिता में आया था, तो धन कमाने की कोई लालसा नहीं थी. कभी धन को लेकर कोई विवाद भी नहीं हुआ. यशवंतजी इस बात के गवाह हैं कि किस तरह एक सब-एडीटर बिना किसी ना-नुकुर के लिए जूनियर सब-एडीटर के रूप में काम करने को तैयार हो जाता है. लालसा केवल एक कि नये जेनरेशन के अखबार में काम करने को मिलेगा. हां, तो बात कर रहा था आंदोलन की. सवाल वही है, क्या अखबार (आज की बात करें, तो मीडिया) आंदोलन कर सकता है. समाज को बदल सकता है. जवाब शायद नहीं ही होगा, पर हम मीडिया से जुड़े लोग इस बात को मानें भी तो कैसे. आखिर समाज को कुछ तो जताना होगा कि हमारा अस्तित्व किस लिए है. नये संस्करणों की आपाधापी, खबरों न छूटने का दबाव, अच्छे से संपादित खबरें, बढ़िया लेआउट, फोटो.............और जाने क्या-क्या. इसी बीच सैलरी...फलाना अखबार बढ़िया सैलरी दे रहा है, कूद पड़ो मैदान में, दूसरा न्यूज एडीटर को लैपटॉप दे रहा है, लपक लो, युवाओं को फलां जगह बेहतर मौके मिल रहे हैं, दौड़ो....इत्यादि.....अब भइया मेरे आंदोलन हो तो कैसे. बुद्धिजीवी तो हम रह नहीं गये...माने बुद्धि की तो खाते ही नहीं. बुद्धि की तब खाते थे, जब खबरें कम, विचार ज्यादा पनपते थे मन में. खबर काटने-छांटने में सारी रात मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी. कुछ पढ़ते-लिखते थे. योग्य होते थे. आज योग्यता के मायने बदल गये हैं. (हिंदी अखबारों में काम कर रहे हैं, तो)हिंदी थोड़ी सी ठीक हो, पेज बनाना (जितनी जल्दी हो सके) जानते हों और सेटिंग आती हो.....तो अब मीडिया वास्तव में एक प्रोफेशन बन गया है???????????????????????????????

शनिवार, 10 मई 2008

नेकी कर दरिया में डाल

क्या कभी आपने अपने पड़ोसी की मदद की है। अगर हां, तो आगे से मत कीजिएगा. चौंक गये होंगे कि कल एक अनजान महिला की मदद ना करने पाने पर परेशान होने वाला शख्स आज अचानक इतना उद्वेलित क्यों है. तो आइये आपको एक सच्ची कहानी सुनाता हूं. लगभग ५२ साल पहले की बात है, मेरे पिता श्री राम प्रसाद शुक्ल आठवीं की पढ़ायी के बाद दिल्ली कमाने चले गये. घर में उनके पिताजी (मेरे दादाजी, बुआ और दादी थीं). जमींदारी खत्म हो गयी थी और घर में कमानेवाला कोई नहीं था. दिल्ली में उन्हें शायद ३० रुपये महीने या १६ रुपये (पिताजी से पूछ कर बताऊंगा)की नौकरी मिल गयी. दिन भर काम करते और रात में पढ़ाई. इस तरह १०वीं तक पढ़ भी लिया. हालांकि अनुभव ने उन्हें इतना सिखाया है कि जिस कंपनी में काम करते हैं, उसका सीए भी उनसे घबराता है. हां, तो पिताजी धीरे-धीरे प्रगति करते गये और हम पांच भाई-बहनों को पढ़ाया-लिखाया और किसी काबिल बनाया. इस बीच उन्होंने गांव और रिश्तेदारी के लगभग ५० लोगों को काम दिलाया. इन्हीं लोगों में एक हैं राममणि शुक्ल, जो मेरे ताऊ लगते हैं. मेरे घर के ठीक सामने इनका घर है. पिताजी ने ताऊ जी को नौकरी दिलायी, नहीं कर पाये. उनके बड़े बेटे अशोक शुक्ल को नौकरी दिलायी, नहीं कर पाये. मंझले बेटे मनोज शुक्ल (अब इस दुनिया में नहीं) को नौकरी दिलायी, नहीं कर पाये. छोटे बेटे रामखेलावन उफॆ हवलदार को नौकरी दिलायी, जो आज भी कर रहा है. उसकी बदौलत ताऊजी का घर बना. घर बनाते समय किसी पंडित ने बताया कि जहां हमारा रास्ता है, वहां उनका घर बनता है. अब वह लगे गिड़गिड़ाने. इस पर एक समझौता हुआ कि घर के पीछे से हमें रास्ता देंगे और सामने वह मकान बनवा लें. उनका मकान बन गया, लेकिन पीछे जो पुराना मकान था, उसका एक कच्चा कमरा अब भी खड़ा है. बार-बार आग्रह और कुछ धन लेने के बावजूद अब तक उन्होंने रास्ता नहीं दिया. १६ अप्रैल को ताऊजी के पोते की शादी थी, जिसके लिए पिताजी हजारों रुपया खचॆ करके पहुंचे, टूर रास्ते में छोड़ कर. चार मई को गांव में रहनेवाले मेरे बड़े भाई विकास ने हवलदार को बुला कर एक बार फिर आग्रह किया कि रास्ते के लिए जगह छोड़ दें. बताते चलें कि मेरे घर तक साइकिल व मोटरसाइकिल जा सकती है, कोई अन्य वाहन नहीं. हां, तो भाई के आग्रह के बाद, पता नहीं किस भावना के वशीभूत होकर (भाई ने किसी तरह की जोरजबदॆस्ती की बात नहीं की) उन लोगों ने स्व. मनोज की पत्नी नीलम देवी के नाम से पुलिस अधीक्षक, गोंडा के यहां लिखित शिकायत कर दी कि विकास ने उन्हें गाली दी है. यहां एक बात और स्पष्ट कर दूं कि विकास भैया को गाली से भारी चिढ़ है. एक बार स्व. मनोज ने उन्हें गाली दी थी, तो उनका सिर फोड़ दिया था. अब आप लोग बतायें कि हम क्या करें. बता दूं कि जिस कंपनी में हवलदार काम करते हैं, पिताजी उसी में बड़े अधिकारी हैं. तो क्या हवलदार को नौकरी से चलता कर देना चाहिए???? यहां यह भी बता दूं कि यह महज एक उदाहरण है. हमने उस परिवार से हजारों गालियां खायी हैं. हमेशा उसने हमारे रास्ते में गड्ढा खोदा है, पर पिताजी की वजह से हमेशा बच गये. पिताजी का एक ही सिद्धांत रहा है कि हमारे कारण कोई दुखी या परेशान न हो. रात-बिरात जब भी जरूरत पड़ी हम उनके साथ रहे. आज उन्होंने ही भाई के खिलाफ एसपी से शिकायत की है. उनके घर में धन आने का एकमात्र रास्त हवलदार की नौकरी है. वहीं बंद करवा दें?????????? न रहेगा बांस, न रहेगी बांसुरी. जो काम आपस में बैठ कर समझ-बूझ कर बिना किसी विवाद के लिए हो सकता है, क्या अब उसके लिए हम अग्रेसिव होकर मुकदमा करें और अपना हक लेते हुए उस परिवार को बरबादी की कगार पर ढकेल दें. आप लोग क्या कहते हैं???????????? यह पोस्ट सिर्फ इसलिए कि आप बतायें, हम क्या करें? अब भी चुप रहें, तो कायरता होगी???????? कदम उठायें, तो एक परिवार बरबाद होता है?????????? फिर पत्रकार होते हुए जिस पुलिस को आज तक घास नहीं डाली, उसके सामने खड़े हों और ताऊजी की खिलाफत करें????????????इस पोस्ट का कतई मतलब नहीं कि मैं पिताजी या अपने परिवार की बड़ाई के लिए कुछ कह रहा हूं. इसका सिर्फ इतना मतलब है कि भड़ास नामक अपने परिवार से मुझे राय चाहिए, स्पष्ट कर दूं, राय चाहिए, मदद नहीं. अन्य के लिए हम काफी हैं. तो क्या है आप लोगों की राय? मामले की गंभीरता को समझते हुए उचित सलाह दें.

गुरुवार, 8 मई 2008

किस काबिल हूं मैं

आज दोपहर में (हमारे लिये सुबह) घर से आफिस के लिए आ रहा था. रास्ते में एक जगह पर देखा कि एक अद्धॆविक्षिप्त सा युवक एक पूरी तरह से नग्न अधेड़ महिला (शायद उसकी मां रही होगी) को फुटपाथ से गोद में उठाने की कोशिश कर रहा था. कुछ सोच पाता इससे पहले नजर घड़ी पर पड़ गयी. दो बज कर बीस मिनट हो रहे थे और आफिस पहुंचने का टाइम दो बजे का है. काडॆ जो पंच करना होता है. बस उनके लिए कुछ करने की कौन कहे, सरपट आफिस के लिए भाग लिया. बस तभी से आत्मग्लानि से भरा हूं. आखिर वे भी तो इंसान थे. क्यों नहीं मैं उनके लिए कुछ कर पाया. भले ही वह महिला पागल रही हो, क्या मैं उसके लिए एक धोती नहीं खरीद सकता है, जबकि पान मसाला पर दिनभर में कम से कम तीस रुपये खचॆ होते हैं. यही सोच रहा हूं और दिल में रो रहा हूं. आखिर में लौटा और उसी स्थान पर गया, पर वे दोनों नहीं मिले. क्या करूं?????????????????????????

रविवार, 13 अप्रैल 2008

सपना

सपना देखा करता था

जब छोटा था, सच्चा था

सपना देखा करता था

जब पढ़ता था, बच्चा था

सपने होते थे अजीबोगरीब

देश के विकास के

भ्रष्टाचार के विनाश के

नेताओं के सुधार के

और सपने होते थे

गांवों के विकास के

आजादी के, इतिहास के

सपने होते थे

गांधी के अरमानों के

भगत जैसे कुरबानों के

सपने होते थे

रानी झांसी मर्दाना के

और सपने होते थे

प्यार के, मुहब्बत के

भाईचारे के और और...और...और

सपने होते थे......

सारे सपने, सपने ही रह गये

भला खुली आंखों से देखा

सपना भी कभी पूरा हुआ

गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

सपने साकार होंगे

धर्मेंद्र भइया ने नया ब्लॉग बनाया, उसके लिए बधाई. नाम भी बड़ा अच्छा रखा है, सपने. बचपन से आज तक इन्होंने कई सपने देखे होंगे. यह उस तरह के लोगों में हैं, जो अपने सपनों को साकार करना जानते हैं. या यूं कहें कि इनमें वह माद्दा है कि अपने सपनों को साकार कर सकें. एक जूनियर के रूप में इनके साथ काम करते हुए बहुत कुछ सीखने का मौका मिला. उनमें एक चीज जो सबसे बढ़िया सीखी, वह यह कि कभी काम और सच के साथ समझौता नहीं करते. शायद यही कारण है कि उनके सपने साकार होते रहते हैं. सुख हो या दुख काम तो काम है. ब्लॉग के माध्यम से हमें और भी बहुत कुछ सिखाते रहेंगे. इसी कामना के साथ अभी बस इतना ही, आगे और भी...

गुरुवार, 6 मार्च 2008

काम का आदमी

मन में बहुत कुछ है, पर लिखूं क्या यही समझ में नहीं आ रहा. दिल कहता है कि जीवन जैसे चल रहा है,चलने दो. दिमाग कहता है कि नहीं, फलाने तुम्हारे बाद इस लाइन में आया और आगे बढ़ गया और तुम वहीं के वहीं बैठे हो. आखिर कब तक समझौते पर समझौता करते जाओगे. और एक हम हैं कि काम से समझौता नहीं करते, करते हैं, तो दाम से. किसी ने कहा हम अभी इतना ही दे पायेंगे, तो सोचा चलो बाद में परफार्मेंस देखने के बाद सबकुछ ठीक हो जायेगा. पर नहीं होता है वही ढाक के तीन पात. कहीं कुछ नहीं. कोई तरक्की नहीं, परफार्मेंस को देखनेवाला कोई नहीं. लोगों (बॉस) को शायद लगता है कि इसके बारे में क्या सोचना, यह तो बेवकूफ है ही, जो भी दोगे ले लेगा और कुछ नहीं बोलेगा. और जब कम पैसे में काबिल (अपने आप को कह रहा हूं, अन्यथा न लें) आदमी मिल जाये, तो अधिक दाम देने की जरूरत ही क्या है. दो बार नौकरी बदली और दोनों बार यही अनुभव हुआ. कहीं सैलरी स्लिप न होने की सजा मिली, तो कहीं संबंधों की भेंट चढ़ गया. ऐसे और कितने दिन बिताओगे शुक्लाजी. बीवी मोबाइल मांग रही है, पर लायें कहां से जेब में तो किराया भी नहीं बचा. महीने का आखिर है, किसी तरह काम चल रहा है. खुद के पास भी एक महीने से मोबाइल नहीं है. एक समय था, जब घर में सबसे नया मोबाइल मेरे पास होता था. मां-बाप के पैसे को निर्दयतापूर्वक उड़ाता था, आज स्थितियां विकट हैं. एक-एक सिक्का खचॆ करने के पहले सोचना पड़ता है. उस पर तुर्रा यह कि अप्रैल के पहले हफ्ते या मई में बाप बननेवाला हूं. अस्पताल का खर्चा, फिर फंक्शन और जाने क्या-क्या. कम से कम ५० हजार रुपये चाहिए. हालांकि घर की बात करें, तो ऐसी कोई परेशानी नहीं है. पर अपना भी तो कुछ फर्ज बनता है. ६५ साल के पिताजी आज भी साल में छह महीने टूर पर रहते हैं, आखिर किसके लिए, हमारे लिए ही तो. और एक हम हैं कि उन्हें आजतक एक मोजा भी अपने पैसे से खरीद कर नहीं दिया. लानत है ऐसी नौकरी और बिना मतलब की ऐंठन पर. जिस तरह से सब नौकरी कर रहे हैं, मैं भी करता तो अब तक सब ठीक होता. मैं भी किसी ऊंची कुर्सी पर बैठ कर लंबा वेतन ऐंठ रहा होता, पर अपनी ही ऐंठन में मारा गया कि काम से समझौता नहीं करूंगा. लड़ जाता हूं, बॉस से सीनियर से या फिर जूनियर से कि अगर कोई काम बेहतर हो सकता था, तो हुआ क्यों नहीं. सब पागल समझते हैं, फिर भी कहते हैं काम का आदमी है. बस, काम का आदमी बन कर रह गया हूं.

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2008

मेरी बीवी

मेरी बीवी wonderful
मुझको पीटे hunterful
मुझको तोवह रोज़ पीटती
जैसे दावा की डोज़ पीटती
सुबह पीटती शाम पीटती
शाम ढले वह रात पीटती
साला आख़िर saala है
लेकर usaka नाम पीटती
sasura मेरा thanedaar
सासु का अरमान पीटती
अब बच्चे की बारी है
देखें कितने बार पीटती.

रविवार, 27 जनवरी 2008

तुम सब जानती हो अम्मां

तुम सब जानती हो अम्मां
इसीलिए नानी तुमको हीरा कहती थीं
तुम आठों बहनों में सबसे सीधी थीं ना
अब तुम हम पांचों (भाई बहन) के मन
और मतिश्क की हर बात जान जानती हो न
तुम सब जानती हो अम्मां