बृहस्पतिवार, 21 अप्रैल 2011

हम कितने भ्रष्ट?

भ्रष्टाचार यानी वह व्यवहार, आचरण, जो सही न हो. अगर मैं ठीकठाक समझ पा रहा हूं, तो यही मतलब है भ्रष्टाचार का. यानी सामाजिक ताने-बाने में बुने नियमों को तोड़ने-मरोड़ने की प्रक्रिया को भ्रष्टाचार माना जा सकता है. ऐसे में हमें आत्ममंथन की जरूरत है. मंथन इस बात का कि क्या हम दैनिक जीवन में भ्रष्टाचार में लिप्त तो नहीं हैं? हां, बहुत ऊपर जाने की जरूरत नहीं. दरवाजे की घंटी बजी. बाप ने बेटे से कहा, कोई भी होकह देना मैं घर पर नहीं हूं. क्या यह भ्रष्टाचार नहीं? तो फिर आत्ममंथन शुरू किया जाये. देखें, हम कितने भ्रष्ट हैं?

सोमवार, 20 सितम्बर 2010

तेरी, मेरी, उसकी...आखिर किसकी अयोध्या

...बचपन से ही घर में सुबह-सुबह उनींदी आंखो¨ के बीच मधुर स्वर में गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस की चौपाई...अवध पुरी मम पुरी सुहावन, उत्तर दिस सरजू बह पावन...सुनता आ रहा हूं. बड़के भइया (बड़े पापा के लड़के या यूं कहें बड़की अम्मा के भइया और हम सबके बड़के भइया) स्कूल में पढ़ाते हैं. सुबह उठ कर स्नान ध्यान करते थे. इसमें दादी का उन्हें पूरा सहयोग मिलता था. दोनो¨ में से कोई भी नहाता अवध पुरी... की स्वर लहरी घर में जरूर गूंजती. उस समय अवध पुरी (अयोध्या) की एक निराली ही छटा मन में बसी थी, जो आज भी कायम है. सालो¨ साल यह सिलसिला चलता रहा...आज भी जारी है. दादी के जाने और बड़े भइया के सामने बने नये मकान में चले जाने के बाद भी. भइया आज भी स्कूल जाने से पहले नहाते समय उसी सुर में अवध पुरी मम पुरी...गाते हैं. हालांकि अब उम्र और तबियत साथ नहीं देते, पर उनकी वाणी में किसी भी प्रकार की कमी नहीं झलकती, वह भी तब जब रामचरित मानस में से कुछ गा रहे हो¨. स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद बाबा भोलेनाथ की नगरी बनारस के बीएचयू से स्नातक करने का मौका मिला. अब तो आये दिन अयोध्या के दर्शन होने लगे. अयोध्या होकर ही बनारस आना-जाना होता था. हालांकि इसके पहले भी अयोध्या आना-जाना लगातार लगा रहता था. पर, कभी भी धार्मिक पूजा-पाठ या मंदिरो¨ में दर्शन या सरयू में स्नान के लिए नहीं, बल्कि पिताजी के बनारस और बड़े भइया के कोलकाता में रहने के कारण. दोनो¨ अयोध्या होकर ही आते-जाते थे. गांव से करीब 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अयोध्या स्टेशन का रोयां-रोयां (अगर होता है, तो) शायद अब तक हमारी गंध से हमें पहचान लेता होगा. हम भी अयोध्या को उसी तरह से पहचानते हैं, जानते हैं. पर, जब भाजपा ने भगवान राम की जन्मभूमि को राजनीतिक मुद्दा बनाया, तब लगा था कि अयोध्या में कोई और ही हवा बहेगी, पर वैसा हुआ नहीं. सारी आशंका निर्मूल साबित हुई. अयोध्या के लोग, अयोध्या के बंदर, अयोध्या की गायें, अयोध्या की गलियां, अयोध्या की गंदगी, कुछ भी तो नहीं बदला. तब भी इनमें कोई बदलाव नहीं आया, जब तत्कालीन मुख्‌यमंत्री मुलायम सिंह ने कार सेवको¨ पर गोलियां चलवायीं और तब भी नहीं, जब विवादित ढांचा गिराये जाने के बाद पूरा देश दहशत और अलगाव की आग में जल रहा था. अयोध्या की फिजां में नफरत नहीं घुल पायी. आज भी नहीं घुली है और ईश्वर ने चाहा, तो पुरुषोत्तम राम की नगरी, कई शायरो¨ की जन्मस्थली, नवाबो¨ का नगर और मंदिरो¨ का शहर अयोध्या में 24 सितंबर के फैसले के बाद भी किसी तरह की बाहरी आबोहवा इसे विचलित कर पायेगी. हां, बीच-बीच में कुछ बाहरी उन्मादियो¨ ने अयोध्या के लोगो¨ के पेट पर जम कर लात जरूर मारी है. जब भी हमारी अयोध्या (ध्यान रहे अवध के नवाबो¨ की भाषा हैः कभी मैं का प्रयोग नहीं होगा अवध में. पढ़े-लिखे लोग भी मैं की जगह हम का ही प्रयोग करते हैं) पर कोई आफत आयी है, तो आम लोग ही उसमें फंसे हैं. देश-दुनिया से आये सैलानियो¨ को अयोध्या घुमानेवालो¨ में ज्‌यादातर गैर हिंदू मिलेंगी. सेंदुर (सिंदूर), बिंदी, माला, रामचरितमानस, गीता, पीढ़ा-बेलन और खड़ाऊं बेचनेवाले भी सभी हिंदू नहीं हैं. मंदिरो¨ के लिए पत्थर तैयार करनेवाले भी हिंदू नहीं हैं. पर, कभी भी अयोध्या को इनसे शिकायत नहीं हुई. फिर अयोध्या से बाहर के लोग इतने बेचैन हैं, आखिर क्‌यूं...? क्‌यूं 24 सितंबर के फैसले के बाद उन्माद फैलने की आशंका को हवा दी जा रही, जबकि अयोध्या के लोग शांत हैं? फिर जब भगवान कण-कण में बसे हैं, तो एक अयोध्या को ही निशाना क्‌यूं बनाया जा रहा है...और जब निशाना बनाया ही जा रहा है, तो अयोध्या के नाम पर राजनीति की रोटियां सेंकनेवालो¨ को वहां की गंदगी क्‌यो¨ नहीं दिखती. विश्व के नक्‌शे में स्थान रखनेवाली अयोध्या के रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद से ही नाक में घुसनेवाली बदबू क्‌या कभी इन रहनुमाओं ने महसूस नहीं की? अयोध्या स्टेशन के यात्रियो¨ के लिए पेयजल और बाथरूम की समुचित व्‌यवस्था नहीं होने की जिम्मेदारी कौन लेगा...अयोध्या के लोगो¨ के मुंह से निवाला छीनने का कोपभाजन कौन बनेगा...? बाबा कल्‌याण सिंह राजनीति की नैया डुबाने के बाद अब फिर से अयोध्या की ओर क्‌यो¨ झांक रहे हैं. राम के इतने ही बड़े भक्त थे, तो उन्हीं मुलायम सिंह का हाथ क्‌यो¨ थाम लिया था, जिन्हो¨ने कारसेवको¨ पर गोलियां चलवायी थीं. और बाबा मुलायम सिंह अब अयोध्या के लोगो¨ को बचाने के लिए आपके पास क्‌या हथियार है? और तो और हे कांग्रेस के पुरोधा...आपको क्‌या लगता है...अखबारो¨ में विज्ञापन छाप कर आप शांति फैला रहे हैं? अरे जाइये...जाकर अयोध्या हो आइये..वातानूकूलित कमरो¨ से निकल...देखिये...अयोध्या को रोटी की जरूरत है, काम की जरूरत है, शिक्षा की जरूरत है, गंदगी से मुक्ति की डरूरत है..अखबारो¨ में विज्ञापन छाप कर उन्माद भड़काने की नहीं. राम जिसके थे, उसके हैं और रहेंगे. पर, अवध की शामो¨ की रोशनी छीनने की कोशिश मत कीजिए. अयोध्या के स्थानीय पत्रकार मित्रो¨ से फोन पर बातचीत में अकसर उनका दर्द उभर आता है. वह कहते हैं ः क्‌या भाई क्‌या बतायें...पता नहीं कैसे बाहर से आये इलेक्‌ट्रॉनिक और प्रिंट के साथियो¨ को अयोध्या में उन्माद दिख रहा है. बल्कि इन लोगो¨ की खबरो¨ के प्रसारण-प्रकाशन के बाद हम लोगो¨ को डांट पड़ती है कि अयोध्या में इतना कुछ हो रहा है और तुम सो रहे हो. पत्रकार मित्र बड़े कातर स्वर में कहते हैं, भइया आप ही बताइये, जब अयोध्या में कुछ हो ही नहीं रहा, तो भला हम का लिख कर भेज दें. झूठ-मूठ का हमसे नहीं लिखा जायेगा. हां, इतना जरूर है कि अयोध्या में बाहरी पत्रकार मित्रो¨ की बदौलत खौफ जरूर फैलने लगा है. रही-सही कसर सरकार ने बड़ी संख्‌या में सुरक्षा बल के जवानो¨ को तैनात कर पूरी कर दी है. बाहरी पत्रकार मित्र अयोध्या में हालात बिगड़ने की खबर छापते-प्रसारित करते हैं और उनके इस शाश्वत सत्य की पुष्टि सरकार अगले दिन जवानो¨ की संख्‌या बढ़ा कर कर देती है. इसके कारण हमारी अयोध्या खौफजदा है...

सोमवार, 3 मई 2010

किस इज्जत की भेंट चढ़ी निरुपमा ?

आज सुबह की ही बात है. घर में बैठा था. दो साल की बेटी खेल रही थी. कभी मूंछें खींच रही थी, तो कभी कस कर गाल पर थप्पड़ जड़ रही थी, क्योंकि मैं पत्नी से बातचीत में मशगूल था और उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहा था. अचानक पत्नी ने बेटी को डांट दिया, कस कर, कि पापा को कोई मारता है. बेटी रोने लगी. मेरे और पत्नी के बीच ठन गयी. कुछ देर बोलचाल भी बंद रही. थोड़ी ही देर बाद बेटी को चोट लगी, तो पत्नी दौड़ कर मलहम उठाने दौड़ीं. हमारे बीच फिर से बेटी को लेकर बातचीत शुरू हो गयी. उसी बीच अचानक निरुपमा का जिक्र आ गया. पत्रकार निरुपमा पाठक का. मैंने पत्नी को सारी कहानी बतायी. साथ में यह भी कि शायद किसी करीबी ने उसकी हत्या कर दी. क्योंकि तब तक इस मामले में किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया था. सारा मामला जानने के बाद पत्नी बोलीं – आखिर क्यों मारा गया निरुपमा को...सिर्फ इसलिए कि वह विजातीय शादी करना चाहती थी. तब (विजातीय शादी करने से) जो इज्जत जाती घर वालों की, क्या अब वह बची रही. किस इज्जत की दुहाई दे रहे होंगे उसके परिवारवाले. अब जब जमाना बेटी का हत्यारा कह कर पुकारेगा. अब जब निरुपमा के पिता व भाई थाने के चक्कर लगा रहे हैं, तो किस इज्जत की दुहाई दे रहे हैं. पुलिस की गिरफ्त में अपनी मां को देख कर कहीं से देख रही होगी निरुपमा की आत्मा जार-जार रो रही होगी. और पुलिस की हिरासत में उसकी मां आखिर अब कौन सी इज्जत बचायेगी. सच में, बड़ा सवाल है. क्या है इज्जत. आखिर किसके कारण निरुपमा को जान गंवानी पड़ी. यह समाज और इसके बनाये वसूल क्यों किसी की जान के दुश्मन बन जाते हैं. और फिर वह बेटी, जिसके लिए कभी निरुपमा की मां भी मलहम लेकर दौड़ी होगी, उसके पिता ने भी बेटी के बचपन में उसका थप्पड़ सहा होगा, फिर उसी बेटी की जान कैसे ले ली. सिर्फ इज्जत के लिए. यह इज्जत क्या बला है, कोई समझाएगा. कोई बताएगा कि क्यों तमाम निरुपमाएं इस इज्जत की भेंट चढ़ जाती हैं. क्यों नहीं बंद होता इज्जत का यह ढकोसला. क्यों लोगों को जीने की आजादी नहीं दी जाती. कम से कम अब तो जीने का अधिकार दे दो.

मंगलवार, 21 जुलाई 2009

सिटी ऑफ ज्वॉय पर भीड़ की ममता, शक्ति प्रदर्शन का साधन बना शहीद दिवस

शहीद दिवस के नाम हर साल कोलकाता समेत पूरे राज्य में कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. पर ये कार्यक्रम हैं किसलिए, लोगों को परेशान करने, सिटी ऑफ ज्वाय की ऐसी-तैसी करने और किसलिए...राइटर्स अभियान के दौरान मारे गये कार्यकर्ताओं की याद में शहीद दिवस को इस बार दीदी ने ताकत प्रदर्शन का साधन बना दिया. इस मौके पर शहीदों को श्रद्धांजलि कम दी गयी, २०११ में होनेवाले बंगाल विधानसभा चुनाव के बारे में अधिक चर्चा की गयी. यही नहीं ममता दीदी ने तो २०११ विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल की जीत पक्की मान ली है. उन्होंने राइटर्स में बैठी तृणमूल सरकार की प्राथमिकताएं तक गिना डालीं. दूसरी ओर, बेचारी कोलकाता की निरीह जनता, उपनगरों से कोलकाता आनेवाले दैनिक यात्रियों की दुर्दशा पर दीदी ने केवल माफी मांग कर काम चला लिया. मंगलवार को कोलकाता की सड़कों व मेट्रो स्टेशन-ट्रेनों के साथ-साथ सभी दर्शनीय स्थलों पर दीदी की बातें सुनने राज्य भर से आये लोगों का कब्जा था. घर से दफ्तर पहुंचने में मुझे भी लगभग ३.५ घंटे लग गये, वह भी तब, जब मुख्य शहर में रहता हूं. फिर भी बस छोड़ कर लगभग तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, सड़क पर नहीं, सड़क के किनारे कीचड़ में. मजाल थी कि कोई भी सड़क पर कदम रखने की हिमाकत कर दे. हालात बिल्कुल वैसे ही, जैसे वाम मोरचा या माकपा की ब्रिगेड की किसी रैली का दृश्य.हालांकि मेरे समझ में अब भी यह नहीं आ रहा था कि दीदी को ताकत को प्रदर्शन करना ही था, तो शहीद दिवस ही क्यों??? वाम मोरचा और तृणमूल-कांग्रेस की इस ल‍ड़ाई से जनता को बाहर रखने के लिए छुट्टी वाला भी तो कोई दिन चुना जा सकता था. ऐसे में कम से कम दैनिक जनजीवन पर तो आफत नहीं आती, क्यों दीदी...है न...

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

मुद्दों से भटकते हम

भई आजकल जूतों का बाजार गर्म है. ईराकी पत्रकार जैदी ने विश्व के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति पर जूता फेंका, तब से जूतों का भाव ही बढ़ गया है. फिर जूता फेंकने की कई और घटनाएं हुईं. और हालिया घटना हुई गृहमंत्री पी चिदंबरम की प्रेस कांफ्रेंस में. एक समय था जब किसी राज्य की विधानसभा में जूता-चप्पल फेंकने पर मीडिया के लोग (मैं भी) खूब हो-हल्ला मचाते थे. स्थिति कमोबेश आज भी कुछ वैसी ही है. हो-हल्ला खूब मचा. किसी ने जरनैल सिंह (बहुत ही वरिष्ठ हैं मुझसे) के पक्ष में, तो किसी ने उनके तरीके की खिलाफत की. मैं यहां न तो उनके पक्ष में और न ही खिलाफत में कुछ कहना चाहता हूं. मैं तो आत्ममंथन करना चाहता हूं, अपनी दशा और दिशा का. आज-कल कहीं न कहीं हम जैसे लोग ही पत्रकारिता की दशा और दिशा तय करते हैं. ऐसे में आत्ममंथन बहुत ही जरूरी हो जाता है. शुरुआत शुरू से करते हैं. पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए कोई जाता है, तो पहले दिन उसे सिखाया जाता है, कुत्ते ने आदमी को काटा, तो कोई खबर नहीं. आदमी ने कुत्ते को काटा, तो खबर बनती है. पर यहां एक सवाल उठता है कि अगर रोज-रोज आदमी कुत्ते को काटने लगे, तो कितनी बार खबर बनेगी. दूसरी बात मुद्दे की. जरनैल सिंह ने जूता फेंका, तो हर अखबार के पहले पन्ने पर, हर न्यूज चैनल पर २४ घंटे वही खबर चली. असल मुद्दा तो लोग भूल ही गये. श्री सिंह ने जूता नहीं फेंका होता, तो शायद उस दिन खबर कुछ और होती. कांग्रेस की शान में गृहमंत्री ने पढ़े कसीदे. या प्रेस कांफ्रेंस में चिदंबरम ने की यूपीए सरकार की वकालत...या ऐसे ही बहुत कुछ. पर बीच में आ गया जूता. और मौके पर उपस्थित हर पत्रकार, देश भर में टीवी से चिपके पत्रकार, शाम को अखबारों का पहला पन्ना बनानेवाले पत्रकार, सभी असल मुद्दे को भूल गये. गृहमंत्री ने क्या कहा, क्या नहीं...इस विषय से सब दूर हो गये. मौके पर लगायी गयी टीवी चैनलों की ओवी के कैमरे का रुख जरनैल सिंह की ओर हो गया. उन्हें थाने ले जाया गया, उससे पहले ही चैनलों और अखबारों के क्राइम बीट के संवाददाता थाने पहुंच गये. अटकलें लगाने लगे. एंकर और संवाददाताओं के बीच बातचीत में जरनैल सिंह की पीढ़ियों की कहानी का जिक्र होने लगा. चिदंबरम को लोग भूल गये. यह हुआ एक नमूना.दूसरा नमूना...हालांकि दूसरे नमूने से पहले हमें इस बात पर भी चिंतन करना चाहिए कि हमारी स्टोरी (न्यूज) का एंगल क्या होगा, इसका अंदाजा दूसरे लोग (जो मीडिया के नहीं हैं) कैसे लगा लेते हैं. अब आप पूछेंगे कैसे, तो बात जरा विस्तार में करते हैं. फिल्म प्रोड्यूसरों और मल्टीप्लेक्स मालिकों के बीच मुनाफे के बंटवारे को लेकर तनातनी चल रही है. प्रोड्यूसरों ने मल्टीप्लेक्स में फिल्में रिलीज करने से मना कर दिया है. इसी मुद्दे पर प्रोड्यूसरों ने प्रेस कांफ्रेंस बुलायी. उसमें शाहरूख और आमिर खान भी पहुंचे. बस हम भटक गये मुद्दे से. न हमें मल्टीप्लेक्स याद रहे. न ही याद रहीं फिल्में. मौके पर मौजूद अन्य प्रोड्यूसरों को भी हम भूल गये. उनकी बातों से कोई मतलब नहीं रहा. छुट्टियों के इस सीजन में फिल्में न रिलीज करने के प्रोड्यूसरों के फैसले के पीछे के कारणों को भी हम भूल गये. याद रहे, तो सिर्फ शाहरूख और आमिर. यानी की हम मुद्दे से भटक गये. हमने यह नहीं सोचा कि छुट्टियों में इस तरह के विवाद खड़े करने का फायदा प्रोड्यूसर इसलिए उठा रहे हैं, क्योंकि आइपीएल और आम चुनाव के चलते शायद ही कोई दर्शक सिनेमा हाल का रुख करेगा. ऐसे में फिल्में रिलीज हुईं, तो भी पिट जायेंगी. तो प्रोड्यूसरों ने (शायद) सोचा कि चलो इसी बहाने कुछ नया करते हैं. यह हुआ एक पहलू. दूसरा पहलू यह कि दूसरे हमारी स्टोरी का एंगल पहले जानते हैं, कैसे ???? ऐसे...शाहरुख ने प्रेस कांफ्रेंस में बार-बार कहा...आप लोग (संवाददाता) शायद मेरे और आमिर के एक मंच पर उपस्थित होने को बड़ी खबर बनायेंगे. हमारी दोस्ती के किस्से कहेंगे. पर हमारे मुद्दे को मत भूलियेगा. हमारे फिल्में न रिलीज करने के कारण को जरूर हाई लाइट कीजियेगा. और माफ कीजियेगा...हम शाहरुख की आशंका पर बिल्कुल खरे उतरे. हमने बड़े-बड़े अक्षरों में शाहरुख और आमिर के एक मंच पर उपस्थित होने की खबरें छापीं. हमने दोनों पर अलग से प्रोग्राम बनाये...पर मुद्दा, मुद्दा तो हम भूल ही गये. हमने वही किया, जिसकी आशंका शाहरूख को पहले से ही थी. यानी कहीं न कहीं, लोग हमारी मानसिकता को जान गये हैं, पहचान गये हैं. तो क्या अब हमें ऐसी मानसिकता को बदलने की जरूरत नहीं...? कुछ ऐसा करने की जरूरत नहीं, जिससे खबरों में रहने वाले लोग दूसरे दिन की हेडलाइन का अंदाजा पहले से न लगा लें...? जरूरत है चिंतन की...

मंगलवार, 27 जनवरी 2009

रियलिटी शो या टीवी का इमोशनल अत्याचार

अगर आप मुंबई महाराष्ट्र की वैशाली को बनाना चाहते हैं संगीत के विश्वयुद्ध का विजेता, तो उन्हें वोट देने के लिए टाइप करें...कोलकाता वेस्ट बंगाल की तोरषा सरकार को इंडियन आइडल बनाने के लिए वोट दें, टाइप करें...और ऐसे ही न जाने कितनी वोट अपील. अब तो आप लोग समझ ही गये होंगे, बात हो रही है आजकल टीवी पर चल रहे रियलिटी शोज की. इनमें डांस और गानों के शो की भरमार है. एक जमाना था, जब टीवी की दुनिया की बेताज बादशाह सास-बहुओं के माध्यम से लोगों पर इमोशनल अत्याचार कर रही थीं, आजकल ये रियलिटी शोज कर रहे हैं. और जिस तरह से ये लोग क्षेत्रीयता को बढ़ावा दे रहे हैं, वह राज ठाकरे की क्षेत्रीयता की भावना से कुछ कम नहीं है. यानी टीवी और फिल्मों के गढ़ मुंबई में रहनेवाले इन लोगों पर भी राज ठाकरे का पूरा-पूरा प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहा है.कोई माने या न माने, जिस तरह से वोट के नाम पर ये लोग क्षेत्रीयता को बढ़ावा दे रहे हैं, वह किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता. हाल ही में जी टीवी का सारेगामापा चैलेंज जीतनेवाली वैशाली की कहानी भी कुछ इसी तरह की है. मैं किसी भी तरह से वैशाली के टैलेंट पर कोई प्रश्न नहीं उठा रहा. पर सवाल उठता है कि जिस तरह से बार-बार वैशाली के गुरु हिमेश रेशमिया ने अपनी बातों से लोगों की भावनाएं भड़कायीं, क्या वह उचित था? फिर संगीत जैसे शो पर उसी प्रांत विशेष के नेताओं को लेकर स्थानीय प्रतिभागियों के लिए वोट की अपील करना, कहां तक न्यायसंगत है. जब पूरे देश ही नहीं विदेश की जनता शो देख रही है, तो वोट की अपील केवल महाराष्ट्र और बंगाल के लोगों से ही क्यों? क्यों नहीं कहा जाता कि भारत की वैशाली को जिताने के लिए वोट करें या भारत के सोमेन और तोरषा अच्छा गाते हैं, तो उन्हें जितायें. बार-बार बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब इत्यादि प्रदेशों के नाम लेकर क्या जताने चाहते हैं ये शोज के एंकर. टीआरपी की अंधी दौड़ में ये लोग क्यों भूल जाते हैं कि टीवी देख रही मासूम जनता पर इनकी बातों का कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. क्यों लोगों की भावनाएं भड़काने की बार-बार कोशिश की जाती है. और अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो क्यों न इस तरह के शोज पर प्रतिबंध लगा दिया जाये. जब राज ठाकरे बिहार-उत्तरप्रदेश के लोगों के खिलाफ कुछ बोलते हैं, तो उनके खिलाफ भावनाएं भड़काने का मुकदमा होता है, तो इन शोज के कर्ता-धर्ताओं के खिलाफ क्यों नहीं??? आखिर हम सब राज्य और क्षेत्रीयता की भावना से ऊपर उठ कर कब भारतीय बनेंगे. आजादी के इतने सालों बाद भी हम नहीं चेते, तो अनर्थ निश्चित है. तो अब टीवी के माध्यम से किये जा रहे इमोशनल अत्याचार पर कब लगेगी रोक

बुधवार, 14 जनवरी 2009

उदासी

जिंदगी चलते-चलते अचानक ठहर सी जाती है,
तब देखता हूं अपनी ही आंखों में उदासी है।
जिन आंखों में डूबकर लिखता था किस्सा मुहब्बत का,
उन आंखों के कतरों की उदासी भी तो प्यासी है।
तेरी शबनम सी आंहों पर बदल बैठा ये दिल मेरा,
तेरे आगोश में रहकर मचल बैठा ये दिल मेरा।
तेरी एक भूख ने बदल दी तस्वीर ये कैसी है,
जलन दिल की तब जैसी थी, ये वैसी थी ये वैसी है.
मैं हंसता हूं, न रोता हूं मेरी तकदीर कैसी है,
झपट कर फाड़ दी हो जैसे ये तसवीर वैसी है।
तेरे मासूम गुनाहों की सजा, किसी को दे नहीं सकता,
मेरे पागल दिल भला मैं तुझको खो नहीं सकता.